रविवार, 7 मार्च 2010

चुप चुप से हो गुमसुम से हो

चुप चुप से हो गुमसुम से हो,मुझसे बातें क्यूँ नहीं करते हो,
इतना दो बता दो मुझको क्या तुम आज भी मुझपर मरते हो।
गर्म हवा सी चलती है और मौसम पतझड़पतझड़ सा होता है,
गुस्से में जब तुम होते हो और फिर लम्बी लम्बी साँसे भरते हो।
प्यार से जब बातें करते हो तो मन में जलतरंग सा बजता है,
और तुम हिम की शिला से निकली गंगा के जल सा झरते हो।
थक सा जाता हूँ भटक भटक कर तेरी खोज में जब भी मैं,
तुम चुप कर आते हो कहीं से और फिर मेरे क्लेश को हरते हो।
मैं नहीं डरता यह कहने से की तुम मेरी हो हर जनम जनम ,
तुम क्यूँ दुनिया को यह बात कहने से फिर हरदम डरते हो।
-नीहार