मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

शनिवार, 13 मार्च 2010

जब दर्द पल रहा सीने में

जब दर्द पल रहा सीने में,
तब मज़ा आ रहा जीने में ।
खून पानी में तब्दील हुआ ,
बदन गला और बहा पसीने में।
दिल टुकड़े हो कर बिखर गया,
हम जुट गए उसको सीने में।
जब दर्द का दरिया उफन गया ,
तब छेद हो गया है सफीने में।
आंसू को जब से मय है समझा,
मज़ा आ रहा है उसे पीने में।
धडकनों की गर जुबान होती तो,
कहाँ दफन होता दर्द सीने में।
-नीहार
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चोट दिल पे लगी कुछ तो ऐसी,
की जान मेरी निकल सी गयी है।
आईना देख कर यूँ लगा मुझको,
मेरी खुद की सूरत बदल सी गयी।
एक तूफ़ान सा गुज़रा है मुझ पर,
जिसके सदमे से घबडा गया हूँ,
डूबती हुयी सांझ सी सांस मेरी ,
पलकों पे आ के ठहर सी गयी है।
मैं वो सागर हूँ जिसकी सीमा,
बन्धनों में बंधी हुयी सी नहीं है,
सिर्फ लहरें ही लहरें हैं उसमे,
जिनका कोई भी किनारा नहीं है।
वक़्त ने इतना सिखला दिया है,
की छाछ भी फूंक कर पी रहा हूँ,
प्यार की जो एक ईमारत थी मेरी,
भरभरा कर ज़मीन पे जा गिरी है।
मैं तो शायर हूँ बदनाम जिससे,
लोग मिलने से घबराये हुए हैं,
सच कहूँ अब तो लगता है जैसे,
इंसानियत ख़त्म सी हो गयी है।
- नीहार

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