मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

मुझको मेरी तन्हाईयाँ अक्सर बुलाती हैं

मुझको मेरी तन्हाईयाँ अक्सर बुलाती हैं,

और फिर मुझे तेरी यादों से नहलाती हैं।

वो जो खुशबु का झोंका गुज़रा मेरे पास से ,

तेरी जुल्फों की कैद से छूटी हवा कहलाती हैं।

आँखें खुली रहती हैं तो दिखता नहीं कुछ भी ,

बंद आँखें ही तो मुझे सबकुछ अब दिखलाती हैं।

चीड़ों की चोटी पर बरसे चन्दन जैसी जो चांदनी,

एक आशिक के चेहरे पर माशूक का नूर कहलाती हैं।

जो भी जख्म मिले हैं मुझको तेरे सजदे में जानम,

तुझको छूकर आती हवा उन जख्मों को सहलाती हैं।

भटक रहा हूँ नील गगन में आवारा बादल सा मैं,

तेरी यादें टकरा कर उनको सावन सा बरसाती हैं।

-नीहार

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