मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

बृहस्पतिवार, 4 मार्च 2010

है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद

है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद,मन के भीतर मच गया है एक द्वन्द ।

वो मेरा जो कुछ भी नहीं तो ऐ दोस्त, याद उसकी आ आ के क्यूँ करती है तंग।

जब भी मैं खींचता हूँ लकीर कागज़ पे,वो हो जाती है पूर्णतया उसमें जीवंत।

लिखता हूँ उसको ख़त जब अपने हाल का,पढ़ के वो कहता है ये सब है मनगढ़ंत।

मेरे लिए तो वो है एक मंदिर प्रेम का,उसके लिए बन बैठा हूँ मैं एक महंत।

पलकें उठायीं तो सुबह ले आती है वो,पलकें झुका ली तो रात उतर आती तुरंत।

उनका चेहरा खिलता हुआ माहताब है,उनकी खुशबु में तर बतर है दिग-दिगंत।

उनसे ही जीवन बना है मधुमास मेरा , उनसे ही पतझड़ में भी छाया है बसंत।

- नीहार

1 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं