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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

बृहस्पतिवार, 18 मार्च 2010

तेरी याद बहुत तड़पाती है ....

तेरी याद बहुत तड़पाती है,सीने में आग लगाती है।
जब कोहरे छत पे टंगने लगे,तब धूप कहाँ रह जाती है,
वह घूंघट में छिप जाती है, सजनी की याद दिलाती है।
तेरी याद बहुत तड़पाती है।
वर्षा जब बरसे वर्षों तक, तब ये तन्हाई क्या गाती है,
गा - गा के मुझे सताती है, सपनो से फिर दुलराती है।
तेरी याद बहुत तड़पाती है।
झूला जब झूले सावन में, तो वह सबके मन हर्षाती है,
पर वह मुझको बहुत रुलाती है,जब याद तुमहरी लाती है।
तेरी याद बहुत तड़पाती है।
कोयल की मीठी तान सखी, मेरे सीने में आग लगाती है,
पर वह आग कहाँ बुझ पाती है,मन को तो राख बनती है।
तेरी याद बहुत तड़पाती है।
क्यूँ याद तुम्हारी आती है?
क्यूँ आके मुझे सताती है?
कभी मुझको यह तड़पाती है,
कभी बारिश बन नहलाती है ,
कभी आँखों में चुभ जाती है ,
कभी साँसों को महकाती है,
कभी आँखों की नींद चुराती है,
कभी सपनो से फिर बहलाती है।
तेरी याद बहुत तड़पाती है...।
-नीहार
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