सोमवार, 15 मार्च 2010

कैसे गाऊं प्रेम के गीत

कैसे गाऊं मैं प्रेम के गीत,
बिछुड़ गया मेरा मन मीत ।
अवरुद्ध हो वाणी मेरी सीने के भीतर घुट रही है,
दुनिया मेरी मेरे ही हाथों देखो कैसे लुट रही है,
हार में तब्दील हो गयी जीत,
बिछुड़ गया मेरा मन मीत।
कल तलक जो संग रहने की कसम थे खा रहे,
आज मुझसे रूठ कर वो तो अकेले हैं जा रहे,
प्रेम की ज्वाला हो गयी शीत,
बिछुड़ गया मेरा मन मीत।
उनसे बिछुड़ के हम तो अपने आप को हैं खो रहे,
जिंदगी के बदले हम तो अब मृत्युबीज़ हैं बो रहे,
चहुँ और गूंजे है शोक संगीत ,
बिछुड़ गया मेरा मन मीत।
- नीहार
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चले जाना जरा सा वक़्त को रुक जाने दो,

आसमां को इस ज़मीन पे झुक जाने दो।
दौलत-ए-हुस्न को तो उम्र भर बेचते रहे,
दौलत -ए-दिल को ज़रा सा लुट जाने दो।
भ्रम के बिस्तर पर तो सोते रहे रात भर,
अब तो इस नींद से खुद को जग जाने दो।
सांस लो 'गर तो आग लग जाए दुनिया में,
फिर भला क्यूँ इस सांस को घुट जाने दो।
चलो हम बसायें चाँद तारों की नयी दुनिया,
यहाँ लोगों को शर्म-ओ-हया में छुप जाने दो।
वो सूरज जो कल तलक रौशनी था बांटता,
उसे आज अँधेरे की खोज में जुट जाने दो।
-नीहार
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मैं जानता हूँ - की मेरे शब्द कर देंगे बहरे तुम्हें -
क्यूंकि , मेरी आवाज़ की गूंज, जो प्रतिध्वनित हो रही है -
वह प्रतिध्वनित होती रहेगी।
और, चूंकि प्रतिध्वनियाँ कुछ सुनने नहीं देती -
इसलिए, हर दूसरी आवाज़ के लिए -
तुम्हारे कान बहरे हैं - आवाजों पर शब्दों के पहरे हैं।
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तेरे बगैर अब तो हमें जिया नहीं जाता,
जिंदगी का ज़हर हमसे पिया नहीं जाता।
दिन बेचैन और रात करवटों में है कटती,
तेरे बिन जिंदगी को अर्थ दिया नहीं जाता।
दिन रात बस यूँ ही तेरा ख्याल ही है मुझे,
और कोई काम अब मुझसे नहीं किया जाता।
मेरे होठों पे तो सिर्फ अब तेरा ही नाम रहता है,
दूजा कोई नाम अब मुझसे लिया नहीं जाता।
विरह व्यथा ने मेरे दिल को तार तार कर दिया,
इस चाक जिगर को मुझसे सिया नहीं जाता।
ये आँखें हैं की तेरी याद में रोती ही जा रही,
होंठ हैं की उनसे अश्क अब पिया नहीं जाता।
आओ की आ जाओ की अब आ जाओ तुम भी,
जिंदगी के गीत को अकेले सुर दिया नहीं जाता।
-नीहार
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