रविवार, 21 मार्च 2010

दर्द - ए - राग एवं अन्य गीत / ग़ज़ल / कवितायेँ

जल रहा है दिल में , वो तो बस आग है,
होठों पर मचल रहा दर्द - ए- राग है ।
आँखों में तो अश्क सी हैं यादें पल रहीं,
बन्धनों में बांधे हुए एक विरही नाग है।
जूड़े में उनके मैं कोई फूल टंक ना सका,
मेरे हिस्से आया हुआ काँटों का बाग़ है।
सारे बदन में कोढ़ सा उग गया है जो,
इश्क में खाए हुए सब चोटों का दाग है।
तुमने जिससे चुरायी है रंगत होठों की ,
मेरे खून से सना हुआ दिल का गुलाब है।
तुमने तो मुझसे पूछ डाले हैं कई सवाल,
उन सबका मेरे पास नहीं कोई जवाब है।
-नीहार
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हम आधुनिक सभ्यता में जीते हैं,
गंदगी भी फ़िल्टर की हुयी पीते हैं।
बुद्धिजीवी कहलाने का शौक हो भले,
दिल औ' दिमाग से हम सब रीते हैं।
खुद की पहचान से घबराये हुए हम ,
रोज़ एक नया नकाब हम सीते हैं।
इंसानियत की हद गुज़र गयी है दोस्त,
फिर भी ये क्या कम है की हम जीते हैं।
-नीहार
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हम खुद की पहचान ही खोते रहे हैं,
अपने को अजनबी पा के रोते रहे हैं।
समय तो चलता रहा है अपनी चाल से,
हम हैं की घोड़े बेचकर बस सोते रहे हैं।
उजाले की तलाश में आज तक हम सब,
घुप्प अंधेरों में ही लगाते बस गोते रहे हैं।
इंसानियत की पाठशाला से निकल कर ,
हैवानियत की लाश हम सब ढ़ोते रहे हैं।
कितना भी पढाओ शांति का पाठ तुम हमें,
अशांति मंत्र रटने वाले हम सब तोते रहे हैं।
प्रेम - अंकुरित अँखुओं को नोंच नोंच कर,
घृणा बीज का वृक्ष यहाँ हमसब बोते रहे हैं।
गांधी और ईसा होते नहीं पैदा हर युग में ,
हम जैसे पैदा होते थे और पैदा होते रहे हैं।
-नीहार
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चलो अच्छा है -
तुमने मुझे संबंधों के घेरे से निकाल,
एक चौराहे पर खड़ा कर दिया।
ढूँढ लूँगा मैं ,
अपन रास्ता कोई -
तुम्हारे जुदा होने के बाद।
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फिर दर्द उठा है, दिल के किसी कोने में -
फिर चाँद बादलों में कहीं छिप गया है,
मौत का मंज़र उससे देखा नहीं जाता।
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इतने दिनों बाद ख़त आया - तो क्या आया।
बहुत मुश्किल से पढ़ पाया,
धुधुआती आँखों से।
काश आँखें गल कर आंसुओं में बह जाती,
और,
मेरे हाथ सिर्फ अनपढ़ी चिट्ठियां ही रह जाती।
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शुरू कर दूँ क्या मैं सिगरेट पीना -
जलने के लिए दिल के साथ,
होंठ भी तो जरुरी है।
और यह एहसास भी की,
मेरे दिल की जलन से ज्यादा तेज़ है,
तम्बाकू की जलन (अगन)।
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