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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

बुधवार, 24 मार्च 2010

दिल को दिल की बात सुनाने को दिल करता है

दिल को दिल की बात सुनाने को दिल करता है,
कुछ भूली बिसरी बात सुनाने को दिल करता है।
उनकी जुल्फें बिखरी बिखरी जैसे हों काले बादल,
उनकी चितवन मदहोशी का फैला है जैसे आँचल,
लब उनके ऐसे जैसे पगे हों अमृत रस की धार में,
उन होठों से पीकर खिल जाने को दिल करता है।
उनकी आँखें चंचल चंचल, हों जैसे मृग के दो नैन,
जिन चितवत हो जाए उसे मिले है मन का चैन,
छल छल करती उन आँखों में ठाठें मारे सागर,
सागर के उस गागर में डूब जाने को दिल करता है।
वो चलती हैं तो खिल जाते हैं शत शत नील कमल,
उनके छू लेने से हो जाते हैं कृष्ण भी श्वेत धवल,
पत्थर को छूती हैं तो उनमे जीवन भर जाती हैं,
उनकी राहों में बस बिछ जाने को दिल करता है।
काया उनकी कंचन कंचन बिखराए है स्वर्ण किरण,
रंग दे अपने रंग में सबको ,दे दे मृत को भी जीवन,
चाहूँ उनका साथ मैं हर पल अपने जीवन में हे देव,
हर पल बस उनमे ही अब रम जाने को दिल करता है।
दिल को दिल की बात सुनाने को दिल करता है।
कुछ भूली बिसरी बात सुनाने को दिल करता है।
-नीहार

1 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया निहार जी आपने..."
    amitraghat.blogspot.com
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