मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

सोमवार, 1 मार्च 2010

खुलता हूँ तो किताब हो जाता हूँ,पन्नो पे बिखरा गुलाब हो जाता हूँ.

देखो सुरमई सांझ उतर आयी है,लगता है आपने अपनी जुल्फें लहराई है।
मंदिर में बजी जो घंटियों की तरह,सुना है बस आपने पाजेब छनकाई है।
सात सुरों की महफ़िल सजा के बैठे हैं,लोग कहते हैं की वो खिलखिलाई है।
चेहरे से उसने अपनी जुल्फों को हटाया,चांदनी धीरे से धरती पे उतर आयी है।
महक उठा है मेरा वजूद उसकी खुशबु से,हवा में घुली उसकी याद चली आयी है।
वो दबे पांव आ जाता है ख्याल बन कर,उसे याद कर मेरी आँख फिर भर आयी है।
वो इश्क है मेरा वो मेरी मोहब्बत है,वो जान है मेरी जिस पे मैंने जिंदगी लुटाई है।
- नीहार
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खुलता हूँ तो एक किताब हो जाता हूँ,पन्नो पर बिखरा गुलाब हो जाता हूँ।
हरी दूबों पे बिखरे ओस की बूंदों में छुपा, मैं सुबह का आफताब हो जाता हूँ।
सदियों की प्यासी जिंदगी की खातिर, मैं फिर पवित्र गंगा का आब हो जाता हूँ।
मैं आँख की राहत दिलों की चाहत हूँ, मैं तुम्हारे लिए सुनहरा खाब हो जाता हूँ।
तुम्हारे जुल्फों में कैद होकर मैं तो ,पारे से ढलकता हूँ , माहताब हो जाता हूँ।
तुम जो नहीं आती हो कभी ख्याल बन कर,मैं टूटा हुआ एक साज हो जाता हूँ।
जो तुम तो रंग और रूप है जीवन में,तुम नहीं तो हर वक़्त मैं बेताब हो जाता हूँ।
मैं तुम्हारी अंखियों के कटोरों में , छलकता महकता बहेकता शराब हो जाता हूँ।
तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारे लिए अच्छा हूँ , बाकियों के लिए मैं बस ख़राब हो जाता हूँ।
- नीहार

2 टिप्पणियाँ:

  1. वाह भई निहार जी बहुत सुंदर लिखा है आपने.
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  2. होली पर आपको, आपकी बेहतर रचना को, दोनों को हार्दिक शुभकामनाएं........www.sansadji.com
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