( मैं जानता हूँ मेरी चुप्पी किसी को नहीं खली होगी,सिवाय कुछ एक के जिनकी पुकार भी मैंने अनसुनी कर दी....कारण कुछ भी नहीं या यूँ कहूँ की कारण का निराकरण मुझे भी नहीं सूझ रहा था...बस लगा जैसे कुम्भकर्णी नींद सो गया था मैं...अब जगा हूँ तो सोऊंगा नहीं...कोशिश करूँगा की नींद की पलकों पे ख्वाब के फूलों की खुशबु महसूसते हुए शब्दों के रंग में तितलियों की भाषा बोलता रहूँ....इस कृतित्व की डाल पर बस डोलता रहूँ....नए वर्ष की शुभकामना समेत...)
नव वर्ष का शुभ आगमन
नव वर्ष का शुभ आगमन !!
नव वर्ष का शुभ आगमन !!
बीती हुयी हर बात जो दुःख का कारण है बनी ,
बीती हुयी हर याद जो तल्खियों से है सनी,
आने वाले वर्ष में उन सभी का हो हरण !
नव वर्ष का शुभ आगमन !!
आज तक खिलते रहे हम सिर्फ अपने ही लिए,
गंध से भींगे रहे और मकरंद भी खुद ही पिए ,
दूसरों पर भी करें न्योछावर अपना तन औ' मन !
नव वर्ष का शुभ आगमन !!
नदी जंगल पहाड़ सभी प्रदूषित हो गए,
आदमी की भीड़ में हम आदमी ही खो गए,
है ज़रूरी यह की अब स्वच्छ हो पर्यावरण !
नव वर्ष का शुभ आगमन !!
बेईमानी औ' अनाचार के बढ़ते हुए माहौल में ,
आदमी की कीमतों के गिरते हुए माहौल में,
स्वच्छ रख्हें हम सभी अपना अपना आचरण !
नव वर्ष का शुभ आगमन !!
जाति धर्म के नाम पर आदमी सब बँट गए,
कोई इधर से कट गए कोई उधर से छंट गए,
आओ आके डाल दें हम उनकी लाशों पर कफ़न !
नव वर्ष का शुभ आगमन !!
आने वाले वर्ष में हर व्यक्ति का उत्कर्ष हो ,
दुःख का नहीं हो नाम हर जगह बस हर्ष हो,
पतझड़ी जिंदगी में हो बसंत का पुनरागमन !
नव वर्ष का शुभ आगमन !!
नव वर्ष का शुभ आगमन !!
नव वर्ष का शुभ आगमन !!
कुछ कही कुछ अनकही
अपने विषय में क्या कहूँ....लिखना मुझे अच्छा लगता है...लिखता हूँ क्यूंकि जीता हूँ...
मेरे बारे में
- विजय रंजन
- मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...
बुधवार, 25 जनवरी 2012
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
आखरी मुलाकात
वो मुझसे मिल कर घर गया होगा,
और फिर बिस्तर पे गिर गया होगा।
दिल कब से उसका भरा भरा होगा,
उसने रो कर तकिया भिगोया होगा।
ये मुलाकात आखरी मुलाकात हो शायद ,
यह सोच कर वो चुप हो गया होगा ।
वो जानता है की उसके बिन शायद,
ये शख्स बिलकुल ही मर गया होगा।
देखता रहता है रात दिन उसकी तस्वीर,
उसकी जुल्फों में वो बादल हो गया होगा।
उसके होठों पे रख के उँगलियाँ अपनी,
वो खामोशियों में उसको सुन रहा होगा।
उसे उसकी आदत हो चुकी है अब हर पल,
आवारा सा हर जगह उसे ढूंढ रहा होगा ।
हर एक आहट पे अपने दरवाज़े पे आके ,
शब के सन्नाटों में उसको तलाशता होगा।
वो आएगा ,ज़रूर आएगा फिर लौट कर ,
उसने मन ही मन दिल से ये कहा होगा ।
आँखें उफनती सागर सी हैं उसकी और,
उसमे घुल कर वो काजल सा बह गया होगा,
थरथराते लब से उसका नाम लेकर फिर वो ,
खुद ही उसकी प्रतिध्वनि वो सुन रहा होगा ।
वो जानता है की उसके बिन जी नहीं पायेगा,
जीने के वास्ते यादों के फूल वो चुन रहा होगा।
वो शख्श तेरा दीवाना है अपने ही किस्म का ,
अपनी दीवानगी का किस्सा वो बुन रहा होगा।
मंगलवार, 12 जुलाई 2011
कविताओं कि प्रासंगिकता
उस वक़्त मेरी कवितायें,मुझसे विद्रोह कर देती हैं,
जब मैं उन्हें प्रसंगों से जोड़ नहीं पाता।
पर मैं उन्हें क्या समझाऊं? - कितना समझाऊं?-
की - जो आजीवन प्रसंगों से खुद कटा कटा सा रहा -
अपने मन के कई भागों में बँटा बँटा सा रहा -
अपने अतीत के साए से सटा सटा सा रहा -
वह, यानी मैं - एक अदना सा कवि ,
अपनी कविताओं को कैसे प्रसंग दूँ ?
कैसे दूँ उन्हें शब्दों की आड़?
कैसे पहनाऊं उन्हें अर्थों का जामा?
कैसे उसे सुर , ताल और लय में बाँधूँ?
मैं लिखता क्यूँ हूँ - यह मुझे मालूम नहीं।
मैं कैसे बताऊँ कि -
जब जब मेरी भाषा मौन हो जाती है,
तब हाथ यक - ब - यक कलम थाम लेते हैं,
और, तब शुरू हो जाती है शब्दों कि हेरा फेरी,
और बेबस कविता -
अपने आप को पन्नो में कैद पाती है।
प्रासंगिकता का प्रश्न बहुत अहम् है,
और - अहम् है कविता का सार्थक होना।
पर मेरी कवितायेँ ( मैं दूसरों कि नहीं जानता) -
यह नहीं जानती - कि,
जीने के लिए -
अर्थ- प्रसंग - इत्यादी, इत्यादी -
खोजना है व्यर्थ - क्यूंकि,
हम जीने के लिए जीते हैं,
उन्हें रफू कर पहनते हैं -
उन्ही को खाते हैं /पीते हैं,
यानी कविताओं में मरते हैं और कविताओं में जीते हैं।
यानी, पूरी कि पूरी कविता ,
जुडी है हमारे जीने से।
कविताओं कि प्रासंगिकता हमारे जीने में है -
कविताओं कि उत्पत्ति हमारे सीने से है -
और अर्थ?अर्थ तो भाव है -
अथाह सागर में लहरों पर डोलता नाव है,
जो कभी न कभी - कहीं न कहीं ,
किनारे लग ही जाएगा, और -
उसी वक़्त , शायद -
मेरी कविता को एक 'अर्थ' मिल जाएगा।
-नीहार
जब मैं उन्हें प्रसंगों से जोड़ नहीं पाता।
पर मैं उन्हें क्या समझाऊं? - कितना समझाऊं?-
की - जो आजीवन प्रसंगों से खुद कटा कटा सा रहा -
अपने मन के कई भागों में बँटा बँटा सा रहा -
अपने अतीत के साए से सटा सटा सा रहा -
वह, यानी मैं - एक अदना सा कवि ,
अपनी कविताओं को कैसे प्रसंग दूँ ?
कैसे दूँ उन्हें शब्दों की आड़?
कैसे पहनाऊं उन्हें अर्थों का जामा?
कैसे उसे सुर , ताल और लय में बाँधूँ?
मैं लिखता क्यूँ हूँ - यह मुझे मालूम नहीं।
मैं कैसे बताऊँ कि -
जब जब मेरी भाषा मौन हो जाती है,
तब हाथ यक - ब - यक कलम थाम लेते हैं,
और, तब शुरू हो जाती है शब्दों कि हेरा फेरी,
और बेबस कविता -
अपने आप को पन्नो में कैद पाती है।
प्रासंगिकता का प्रश्न बहुत अहम् है,
और - अहम् है कविता का सार्थक होना।
पर मेरी कवितायेँ ( मैं दूसरों कि नहीं जानता) -
यह नहीं जानती - कि,
जीने के लिए -
अर्थ- प्रसंग - इत्यादी, इत्यादी -
खोजना है व्यर्थ - क्यूंकि,
हम जीने के लिए जीते हैं,
उन्हें रफू कर पहनते हैं -
उन्ही को खाते हैं /पीते हैं,
यानी कविताओं में मरते हैं और कविताओं में जीते हैं।
यानी, पूरी कि पूरी कविता ,
जुडी है हमारे जीने से।
कविताओं कि प्रासंगिकता हमारे जीने में है -
कविताओं कि उत्पत्ति हमारे सीने से है -
और अर्थ?अर्थ तो भाव है -
अथाह सागर में लहरों पर डोलता नाव है,
जो कभी न कभी - कहीं न कहीं ,
किनारे लग ही जाएगा, और -
उसी वक़्त , शायद -
मेरी कविता को एक 'अर्थ' मिल जाएगा।
-नीहार
सोमवार, 4 जुलाई 2011
प्यार में पगी कविता सी कोई
मेरे सपनो को नया रंग दो,
जीवन भर तुम मेरा संग दो।
जीवन भर तुम मेरा संग दो।
पतझड़ में भी रहे जो हरी सी,
मन में मेरी ऐसी उमंग दो।
मन में मेरी ऐसी उमंग दो।
रहूँ सोचता हर घडी मैं जिसको,
प्यार की वो मीठी तरंग दो।
प्यार की वो मीठी तरंग दो।
कागज़ से कोरे इस मन को,
अपने प्यार के रंग से रंग दो।
अपने प्यार के रंग से रंग दो।
चन्दन चन्दन महकूँ हरदम,
मेरे जीवन को ऐसी सुगंध दो ।
मेरे जीवन को ऐसी सुगंध दो ।
अमृत बन जो बरसे हरदम ,
मुझे रस पूरित वही मकरंद दो।
मुझे रस पूरित वही मकरंद दो।
मिल ना सका जो अबतक मुझको,
जीवन को ऐसी उमंग दो।
जीवन को ऐसी उमंग दो।
प्यार में पगी कविता सी कोई,
जीवन को तुम नया प्रसंग दो।
जीवन को तुम नया प्रसंग दो।
-नीहार
बृहस्पतिवार, 30 जून 2011
ताज़ी क्षणिकाएं
कुछ नयी क्षणिकाएं
खुदा भी आजकल मुझपर ,
कुछ मेहरबान ज्यादा है –
उसको पता है आजकल मैं,
सिर्फ तेरी ही इबादत करता हूँ।
***************************
सितारे सुलग रहे ,
रात के माथे पे यूं -
तेरे माथे पे जैसे,
पसीने चुहचुहा रहे।
***********************
तेरे माथे से जो पसीने को –
अपने हाथों से पोछा मैंने,
हजारों जुगनू मेरी हथेली पे,
रक्स करने लगे ।
***********************
मेरे पाँव खुद ब खुद-
तेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
आज कल मुझे मंदिर जाने की –
आदत सी हो चली है।
***********************
मैं आजकल अपने चेहरे पे –
कई चेहरे लगा लेता हूँ,
जो जैसा देखना चाहे मुझे –
उसे वैसा ही चेहरा दिखा देता हूँ।
***************************
हंस मोती चुगता है ,
जैसे ही उसने ये सुना –
मेरी हथेली पे अपनी आँख के,
मोती टपका दिये।
********************
वो रात को चुपके से ,
अंधेरा ओढ़ लेता है –
दिन के उजाले उसे,
सूरज बना देते हैं।
****************
रेत पे लिखता है नाम ,
अपनी उँगलियों से वो –
वक़्त पानी का रेला है,
हर नाम मिटा देता है।
***********************
हर सुबह घर से वो ,
निकलता है ये सोचकर –
शायद कभी अपने घर का,
रास्ता वो भूल जाये।
**********************
हर चेहरे मे ढूँढता है,
खुद का चेहरा हर समय –
जब भी घर से निकलता है,
तो आईना पहन लेता है वो।
**********************
बादल को अगर तुम –
ज़ोर से रुलाना चाहो,
सूरज की आग को,
फिर से हवा दो।
************************
अपनी मुट्ठी मे –
गुच्छे भर अमलताश लिए,
सोचती रही रात भर की,
धूप उसकी मुट्ठी मे कैद है।
********************************
थरथराते होंठों से –
वो नाम ले रहा है मेरा,
उसको भी वक़्त ने
बोलना है सिखा दिया।
***************************
उसके चेहरे पर जो –
पल भर को झुका मैं तो,
लोगों ने कहा देखो –
आंशिक चंद्रग्रहण है लग गया।
**************************
खुदा भी आजकल मुझपर ,
कुछ मेहरबान ज्यादा है –
उसको पता है आजकल मैं,
सिर्फ तेरी ही इबादत करता हूँ।
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सितारे सुलग रहे ,
रात के माथे पे यूं -
तेरे माथे पे जैसे,
पसीने चुहचुहा रहे।
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तेरे माथे से जो पसीने को –
अपने हाथों से पोछा मैंने,
हजारों जुगनू मेरी हथेली पे,
रक्स करने लगे ।
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मेरे पाँव खुद ब खुद-
तेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
आज कल मुझे मंदिर जाने की –
आदत सी हो चली है।
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मैं आजकल अपने चेहरे पे –
कई चेहरे लगा लेता हूँ,
जो जैसा देखना चाहे मुझे –
उसे वैसा ही चेहरा दिखा देता हूँ।
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हंस मोती चुगता है ,
जैसे ही उसने ये सुना –
मेरी हथेली पे अपनी आँख के,
मोती टपका दिये।
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वो रात को चुपके से ,
अंधेरा ओढ़ लेता है –
दिन के उजाले उसे,
सूरज बना देते हैं।
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रेत पे लिखता है नाम ,
अपनी उँगलियों से वो –
वक़्त पानी का रेला है,
हर नाम मिटा देता है।
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हर सुबह घर से वो ,
निकलता है ये सोचकर –
शायद कभी अपने घर का,
रास्ता वो भूल जाये।
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हर चेहरे मे ढूँढता है,
खुद का चेहरा हर समय –
जब भी घर से निकलता है,
तो आईना पहन लेता है वो।
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बादल को अगर तुम –
ज़ोर से रुलाना चाहो,
सूरज की आग को,
फिर से हवा दो।
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अपनी मुट्ठी मे –
गुच्छे भर अमलताश लिए,
सोचती रही रात भर की,
धूप उसकी मुट्ठी मे कैद है।
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थरथराते होंठों से –
वो नाम ले रहा है मेरा,
उसको भी वक़्त ने
बोलना है सिखा दिया।
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उसके चेहरे पर जो –
पल भर को झुका मैं तो,
लोगों ने कहा देखो –
आंशिक चंद्रग्रहण है लग गया।
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मंगलवार, 21 जून 2011
जय जय हे सरकार
जय जय हे सरकार
कुछ सालों मे ही कर डाला देश का बंटाधार।
जय राजा, जय परजा जय जय हे सरकार॥
भाव चढ़े बाज़ार में ऐसे,
सुरसा मुंह खोले हो जैसे,
कुंभकरण की नींद सो रहे,
तुमको है धिक्कार।
जय जय हे सरकार॥
जाति द्वेष को फिर बढ़ाया,
अधर्म का पाठ पढ़ाया,
देश जाये पर कुर्सी न जाये,
यही है तेरा विचार।
जय जय हे सरकार॥
आत्मदाह करत लड़कण सब,
धिक्कारत तुमको बड़कण सब,
तुम तो ले डूबे हो भैया,
हमरी नाव मँझधार।
जय जय हे सरकार॥
कभी दक्षिण कभी वामपंथ हो,
कभी कुरान कभी वेद ग्रंथ हो,
समय देख कर चाल हो चलते,
जैसे कोई मक्कार ।
जय जय हे सरकार॥
धर्म भेद का बोया है काँटा,
देश को है टुकड़ों मे बांटा,
जिस दाल पर बैठे हो भैया,
उसी पे किया प्रहार।
जय जय हे सरकार॥
प्रजा निरीह निर्जीव तंत्र है,
असत्य और हिंसा मूल मंत्र है,
सूचना का अधिकार है लेकिन,
सेंसर हॉत समाचार।
जय जय हे सरकार॥
बहुत हुआ है दूर का दर्शन,
बहुत हुआ है गर्जन तर्जन,
अब तो बंद करो अपना तुम,
सब असत्य प्रचार।
जय जय हे सरकार॥
मस्त मलंग निहार बोले,
गर तुम्हरे दिल मे हो शोले,
मत उसको पानी बनने दो,
बनने दो अंगार।
जय जय हे सरकार॥
-नीहार
कुछ सालों मे ही कर डाला देश का बंटाधार।
जय राजा, जय परजा जय जय हे सरकार॥
भाव चढ़े बाज़ार में ऐसे,
सुरसा मुंह खोले हो जैसे,
कुंभकरण की नींद सो रहे,
तुमको है धिक्कार।
जय जय हे सरकार॥
जाति द्वेष को फिर बढ़ाया,
अधर्म का पाठ पढ़ाया,
देश जाये पर कुर्सी न जाये,
यही है तेरा विचार।
जय जय हे सरकार॥
आत्मदाह करत लड़कण सब,
धिक्कारत तुमको बड़कण सब,
तुम तो ले डूबे हो भैया,
हमरी नाव मँझधार।
जय जय हे सरकार॥
कभी दक्षिण कभी वामपंथ हो,
कभी कुरान कभी वेद ग्रंथ हो,
समय देख कर चाल हो चलते,
जैसे कोई मक्कार ।
जय जय हे सरकार॥
धर्म भेद का बोया है काँटा,
देश को है टुकड़ों मे बांटा,
जिस दाल पर बैठे हो भैया,
उसी पे किया प्रहार।
जय जय हे सरकार॥
प्रजा निरीह निर्जीव तंत्र है,
असत्य और हिंसा मूल मंत्र है,
सूचना का अधिकार है लेकिन,
सेंसर हॉत समाचार।
जय जय हे सरकार॥
बहुत हुआ है दूर का दर्शन,
बहुत हुआ है गर्जन तर्जन,
अब तो बंद करो अपना तुम,
सब असत्य प्रचार।
जय जय हे सरकार॥
मस्त मलंग निहार बोले,
गर तुम्हरे दिल मे हो शोले,
मत उसको पानी बनने दो,
बनने दो अंगार।
जय जय हे सरकार॥
-नीहार
बृहस्पतिवार, 16 जून 2011
मन की पीड़ा व्यक्त करना चाहता हूँ...
मन की पीड़ा व्यक्त करना चाहता हूँ...
मैं तुम्हारे अधर में गुम्फित हो के आज,
अपने वेदना को स्वर देना चाहता हूँ....
मन तो है अविरल सलिल की धार सा,
अपनी उद्दाम वासना के वेग के अतिरेक में,
तोड़ डाले है भुजंग सा सर पटक,
रास्ते की हर शिला को....
मैं तुम्हारे तन से यूँ लिपटा हुआ,
जैसे लोहित सूर्य से उसकी किरण,
मैं चकित हूँ देखता तुमको अपलक,
ज्यूँ बधिक को देखता कोई हिरन...
मैं तप्त होकर घूमता बेचैन सा,
और फिर ज्वाला सी धधक कर फूट जाता हूँ....
मैं तुम्हारे बदन की रागिनी से ,
रंग के निर्झर सा फिर टूट जाता हूँ...
मैं तुम्हे जब भी कभी अपलक देखूं,
रूप की अराधना का मार्ग होता है प्रशस्त,
भर के तेरे रूप को अपनी आँख में फिर,
आसुओं की धार सा बहता हूँ मैं...
तुम सुरीली यामिनी की चन्द्रमा सी,
खिल के हरती हो मेरा सारा तिमिर,
मैं तुम्हारी सांस की वीथियों से गुज़रकर,
तुमको एक रंग और रूप देना चाहता हूँ...
मैं तुम्हारे केश में उलझे मेघ सा,
टूट कर सावन सा बरसना चाहता हूँ...
कौन है जो रोकता है मुझको आज,
कौन है जो मेरी बाहों को बाँध लेता है...
कौन है जो बादलों की ओट से ,
आवाज़ देता है मुझको हर घडी ...
मैं किसी राका की उजियारी किरण ,
मैं तुम्हारी आँख में जलना चाहता हूँ,
मैं तुम्हारे काँधे पर रख कर अपना सर,
आखरी नींद फिर मैं आज सोना चाहता हूँ।
-नीहार
मैं तुम्हारे अधर में गुम्फित हो के आज,
अपने वेदना को स्वर देना चाहता हूँ....
मन तो है अविरल सलिल की धार सा,
अपनी उद्दाम वासना के वेग के अतिरेक में,
तोड़ डाले है भुजंग सा सर पटक,
रास्ते की हर शिला को....
मैं तुम्हारे तन से यूँ लिपटा हुआ,
जैसे लोहित सूर्य से उसकी किरण,
मैं चकित हूँ देखता तुमको अपलक,
ज्यूँ बधिक को देखता कोई हिरन...
मैं तप्त होकर घूमता बेचैन सा,
और फिर ज्वाला सी धधक कर फूट जाता हूँ....
मैं तुम्हारे बदन की रागिनी से ,
रंग के निर्झर सा फिर टूट जाता हूँ...
मैं तुम्हे जब भी कभी अपलक देखूं,
रूप की अराधना का मार्ग होता है प्रशस्त,
भर के तेरे रूप को अपनी आँख में फिर,
आसुओं की धार सा बहता हूँ मैं...
तुम सुरीली यामिनी की चन्द्रमा सी,
खिल के हरती हो मेरा सारा तिमिर,
मैं तुम्हारी सांस की वीथियों से गुज़रकर,
तुमको एक रंग और रूप देना चाहता हूँ...
मैं तुम्हारे केश में उलझे मेघ सा,
टूट कर सावन सा बरसना चाहता हूँ...
कौन है जो रोकता है मुझको आज,
कौन है जो मेरी बाहों को बाँध लेता है...
कौन है जो बादलों की ओट से ,
आवाज़ देता है मुझको हर घडी ...
मैं किसी राका की उजियारी किरण ,
मैं तुम्हारी आँख में जलना चाहता हूँ,
मैं तुम्हारे काँधे पर रख कर अपना सर,
आखरी नींद फिर मैं आज सोना चाहता हूँ।
-नीहार
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