मंगलवार, 16 मार्च 2010

कोई गीत प्यार के गाओ तुम

कोई गीत प्यार के गाओ तुम,
मेरे थके हुए मन को,हौले से आ दुलरा जाओ तुम।
कोई गीत प्यार के गाओ तुम।
मैं पंछी बन नभ में घूमूं,और मस्ती में हरदम झूमूँ,
दूँ प्यार लुटा अपना सारा और अश्क भरी आँखें चूमूं,
अपनी आँखों में मेरे सपनों के रूप अनेक सजाओ तुम।
कोई गीत प्यार के गाओ तुम।
मैं ख्वाब सुनहरे बेच रहा, मैं प्यार का अमृत बाँट रहा,
दूजे के सुख की खातिर मैं,अपना सुख सब में बाँट रहा,
अपने सुख के इक कतरे से ,मुझको तो नहला जाओ तुम।
कोई गीत प्यार के गाओ तुम।
सन सन करती पुरवाई भी,अब प्यार के गीत सुनाती है,
एक विरही दर्द भरी बोली,मेरे तन मन में आग लगाती है,
इस जले हुए तन मन को,आकर अब शीतल कर जाओ तुम।
कोई गीत प्यार के गाओ तुम।
खुद से लड़ने की कोशिश ने,है कर दिया बहुत अशांत मुझे,
अपनी पीड़ा पीने की आदत ने, किया है हरदम क्लांत मुझे,
अब और नहीं पी पाता मैं, दुःख मेरे आ कर पी जाओ तुम।
कोई गीत प्यार के गाओ तुम।
अब तो बस इक्षा है शेष यही, गोदी में ही तेरे हम सो जाएँ,
जिन सपनों को बेचा करते थे, उनमे ही हम अब खो जाएँ,
बस एक बार अपने होठों के, अमृत मुझे आ पिलाओ तुम,
कोई गीत प्यार के गाओ तुम।
मेरे थके हुए मन को , हौले से आ दुलरा जाओ तुम।
कोई गीत प्यार के गाओ तुम।
-नीहार