मेरे बारे में

मेरा फोटो
मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

मंगलवार, 2 मार्च 2010

कुछ पल तुम बैठो पास मेरे......

कुछ पल तुम बैठो पास मेरे, और कुछ बातें मुझसे ख़ास करो,
मुझको छूकर मुझको पाकर, तुम मुझको फिर से सुवास करो।
मैं चातक बन कर वर्षों से बैठा, तक रहा तुम्हारी ओर प्रिये,
तुम स्वाति बूँद बन कर बरसो और मेरे दुःख का नाश करो।
मेरा जीवन तो है सूना सूना पतझर पतझर और बियाबान सा ,
तुम आकर मेरे इस सूने जंगल को खिलता हुआ पलाश करो।
मैं दोपहरी सूरज की गर्मी पीकर तपती धरती बन बैठा हूँ अब,
तुम चांदनी बन पारे सी ढलको और मुझको फिर आकाश करो।
मैं कौन हूँ , क्या हूँ,किसका हूँ यह सब भूल गया इस दुनिया में,
बस तेरा हूँ यह जानता हूँ इसलिए तुम खुद में मुझको तलाश करो।
मैंने तुम में है खुद को देखा, और खुद को तुम में ही पाया है जानम,
तुम को समर्पित मन प्राण है मेरा , तुम मुझ पर यह विश्वास करो।
-नीहार

1 टिप्पणियाँ:

  1. कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
    बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं