मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

बुधवार, 3 मार्च 2010

मुमकिन हो तो मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइए

मुमकिन हो तो सिर्फ मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइये,

अपनी पलकों का वरक उठाइये और मेरी सुबह लाइये।

मैं समंदर में भटक रहा हूँ एक किश्ती की तरह ऐ दोस्त,

मुझको मौजों से बचा कर आप किनारे तक तो ले आइये।

तरस गया है ज़माना देखने को एक चौदहवीं का चाँद,

उनकी खातिर ही सही आप अपने रुख से पर्दा हटाइये।

हर तरफ ख़ामोशी है चुप सी और निःशब्द सन्नाटा है,

आप बेतकल्लुफ होइए और खुल के कुछ गुनगुनाइए।

चारों तरफ पसरा हुआ है मरुभूमि का विस्तार सा ,

आप कदम रखिये यहाँ और फूल ही फूल खिलाइए।

मैं भटकता ही रहा हूँ तलाश में खुद की अब तलक,

आईना हैं आप मेरे तो मुझको मेरा अक्स दिखलाइये।

एक अदद चाँद की आशा में चकोर बन कर भटक रहा ,

आप चाँद हैं तो आइये और अपनी चांदनी से नहलाइये।

मैं हिमालय की तरह खड़ा हूँ बिलकुल भाव विहीन सा ,

अपने प्यार की उष्मिता से आप मुझको पिघलाइये।

तेरे इंतज़ार में आँखें दरवाज़े से हैं लगी हुयी अब तक,

आप एक बार तो ऐसे आइये की आके फिर ना जाइए।

-नीहार

6 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत शानदार कविता, ज़नाब । बधाई कबूल करे ।
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  2. तेरे इंतज़ार में आँखें दरवाज़े से हैं लगी हुयी अब तक,

    आप एक बार तो ऐसे आइये की आके फिर ना जाइए।

    -क्या बात है!! वाह!
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
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  4. भटकता ही रहा हूँ तलाश में खुद की अब तलक,आईना हैं आप मेरे तो मुझको मेरा अक्स दिखलाइये।एक अदद चाँद की आशा में चकोर बन कर भटक रहा ,आप चाँद हैं तो आइये
    lajwaab panktiya........
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. आप बेतकल्लुफ होइए और खुल के कुछ गुनगुनाइए ....

    अच्छी लगी ग़ज़ल ...

    तेरे इंतज़ार में आँखें दरवाज़े से हैं लगी हुयी अब तक,

    आप एक बार तो ऐसे आइये की आके फिर ना जाइए ..

    इसमें पहली लाइन में तेरे और दूसरी में आप खटक रहा है ....
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