रविवार, 14 मार्च 2010

शोर - धुआं - और चीख

ये पंक्तियाँ वर्ष 1९८४-८५ के चंद महीनो की तकलीफ से निकली थी , जिन्हें मैंने कलमबद्ध किया था...अब इससे अपलोड कर दुनिया के सामने ला रहा हूँ....
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शोर - धुआं - और चीख ,
मन मांगे शांति की भीख।
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बातों का तीर दिल के आर पार हो गया,
चोट इतनी लगी की दिल बीमार हो गया।
वो खाब कल तलक जो मेरी आँखों में जला,
नफरत की गर्मियों में तप के खार हो गया।
कलेजे पे मेरे ये जो चोट लगाया है आपने,
दर्द समंदर में उठा हुआ एक ज्वार हो गया।
था भरोसा हमें अपने दिल औ' दिमाग पे ,
पर न जाने आज क्यूँ वो सब गद्दार हो गया।
मेरे लिए तो दूरियां ज़हर बन कर रह गयीं,
उनके लिए तो वही सब कुछ बहार हो गया।
रोता रहा हूँ रात को तकिये में सर दिए मैं,
खा खा के गम अब तो मैं गमख्वार हो गया।
जो आग का गोला जला करता था हर समय,
फूलों की पंखुरियों पे बिखरा हुआ नीहार हो गया।
-नीहार
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सिगरेट -
जलाकर होठों में दबा लो -
और -
पूरी शक्ति से धुआं -
अपने -
नथुनों में भर लो -
यानी -
क्षण भर को ही -
मृत्यु -
को वर लो।
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उनकी नज़रों में हमारी कोई कीमत भी है नहीं,
मानो हम हों एक पत्थर,कोई जीवित शय नहीं।
अपने मुकद्दर पे मुझे रोना है अब तो हर घडी,
पी रहा जो रात दिन,वो अश्क है कोई मय नहीं।
कल तलक सुर ताल पर जो चल रही थी जिंदगी,
आज उसकी ही चाल में है कोई सुन्दर लय नहीं।
कल तलक जो संग रहने की कसम थे खा रहे,
उनकी नज़रों में आज कसमों की कीमत है नहीं।
कब कहाँ और किधर से मार डालेगी हमें ये जिंदगी,
मौत का क्या है भरोसा और जिंदगी भी तय नहीं।
- नीहार
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जब से फेरी है उसने अपनी निगाहें,
दिल से नकली हैं सिर्फ दर्द की आहें।
वो छिटक कर हमसे दूर हो गए जबसे,
तड़प कर रह गयी ये मेरी बेजुबाँ बाहें।
उसने न आने की खा रक्खी है कसमें,
फिर भी तक रहा हूँ मैं उनकी ही राहें।
घाव अब हर तरह से ला-इलाज है मेरा,
उसे चाहिए सिर्फ और सिर्फ प्यार की फाहें।
मोहब्बत करते हैं सिर्फ उन्ही से हम,
वो किसी और को भले कितना ही चाहें।
-नीहार
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