मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

बृहस्पतिवार, 25 मार्च 2010

कुछ उलझी कुछ सुलझी लट

कुछ उलझी कुछ सुलझी लट को आओ मैं सँवार दूँ,
बाहों में भर लूँ तुमको और जी भर तुमको प्यार दूँ।
मुझको नशा तेरी आँखों का है जिनमे डूबा रहता हूँ,
सागर जैसी इन आँखों को आ मैं कजरे की धार दूँ।
पतझड़ के मौसम में जब नग्न हो जाएँ सारे वृक्ष,
तब मैं तुमको अपने हाथों से पलाश सा श्रृंगार दूँ।
लब पर तेरे बिखरा होगा तबस्सुम का जो कतरा,
अपने लब से छू कर उसको मैं एक नया आकार दूँ।
तुम हो मेरे और मैं हूँ तेरा यह बंधन हैं जन्मों का,
फूल फूल पत्ते पत्ते पर मैं बस तेरा नाम उचार दूँ।
जब सूखा सा मौसम तुझको तन्हाई का दे एहसास,
तब तब मैं यादों के सावन की तुमको ठंडी फुहार दूँ।
तुम चन्दन वन की खुशबु से महकाती जीवन मेरा,
मैं पल पल तुमको मोगरे की खुशबु में सनी बयार दूँ।
- नीहार
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3 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. अच्छी है जी अच्छी है...
    ..
    यह पोस्ट केवल सफल ब्लॉगर ही पढ़ें...नए ब्लॉगर को यह धरोहर बाद में काम आएगा...
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_25.html
    लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से....
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं