गुरुवार, 25 मार्च 2010

कुछ उलझी कुछ सुलझी लट

कुछ उलझी कुछ सुलझी लट को आओ मैं सँवार दूँ,
बाहों में भर लूँ तुमको और जी भर तुमको प्यार दूँ।
मुझको नशा तेरी आँखों का है जिनमे डूबा रहता हूँ,
सागर जैसी इन आँखों को आ मैं कजरे की धार दूँ।
पतझड़ के मौसम में जब नग्न हो जाएँ सारे वृक्ष,
तब मैं तुमको अपने हाथों से पलाश सा श्रृंगार दूँ।
लब पर तेरे बिखरा होगा तबस्सुम का जो कतरा,
अपने लब से छू कर उसको मैं एक नया आकार दूँ।
तुम हो मेरे और मैं हूँ तेरा यह बंधन हैं जन्मों का,
फूल फूल पत्ते पत्ते पर मैं बस तेरा नाम उचार दूँ।
जब सूखा सा मौसम तुझको तन्हाई का दे एहसास,
तब तब मैं यादों के सावन की तुमको ठंडी फुहार दूँ।
तुम चन्दन वन की खुशबु से महकाती जीवन मेरा,
मैं पल पल तुमको मोगरे की खुशबु में सनी बयार दूँ।
- नीहार
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