मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

रविवार, 7 मार्च 2010

आँखों में काजल न यूँ आप लगाया कीजिये

आँखों में काजल न यूँ आप लगाया कीजिये,
यूँ रात की तीरगी ऐसे न बढ़ाया कीजिये।
आपके छूते ही पत्थर भी हो जाता है आदमी ,
मेरे दुश्मनों की फौज यूँ न बढाया कीजिये।
जिंदगी की राह में सिर्फ कांटे ही कांटे हैं बिछे,
पांव नाज़ुक हैं आपके, उन्हें न उतारा कीजिये।
मैं नहीं पीता हूँ वो सब, जो यहाँ पीते हैं सभी ,
अपनी नज़रों से मुझे रोज़ पिलाया कीजिये।
मैं हूँ बस ठहरा हुआ तालाब के पानी की तरह,
एक कंकड़ फेंक कर मुझको हिलाया कीजिये।
नींद भी आती नहीं कमबख्त मुझको आज कल,
अपनी जुल्फों के तले मुझको सुलाया कीजिये।
मुझको नहीं भाता है कुछ इस संसार में आप बिन,
आप ही आप मुझको हर सू नज़र आया कीजिये।
आकाश है सूना हुआ और तारे गन सब हैं छुप गए ,
अपने रुखसार से जुल्फें हटा चाँद दिखलाया कीजिये।
गीत मैं लिखता रहूँ जीवन भर सिर्फ आपकी ही खातिर ,
आप उनको गा के जीवन में मधुमास लाया कीजिये।
-नीहार

1 टिप्पणियाँ:

  1. भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
    सुंदर रचना....

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं