शनिवार, 27 मार्च 2010

तुम्हारे साथ के पल


तुम्हारे साथ के दो पल, मेरे कल आज और कल।
तुम्हारी जुल्फों के साए में,मेरा दिन जाता है ढल।
मुझे मदहोश कर देती हैं ,तेरी ये दो आँखें चंचल।
वैसे हूँ पत्थर का बना ,पर तेरे साथ जाता पिघल।
जो तुम होते नहीं हो पास, तो मैं हो जाता हूँ विह्वल।
मैं सूरज की तपती किरण,तुम हो चंदा सी शीतल।
मैं पिघलता हिमखंड और तुम उससे गंगा हो निर्मल।
मैं तुम्हारा श्वास हूँ और तुम हो मेरे दिल की हलचल।
मैं ये जानता हूँ की तुम मेरी तपस्या का हो प्रतिफल।
-नीहार
*******************************************
फूलों को चुनने की तो आदत नहीं थी हमें,
काँटों को आपकी राह से चुनते चले गए।
जो पल हमने गुज़ारे हैं आपके साथ साथ,
उन पलों के धागों से सपने बुनते चले गए।
जब बातें कर रहे थे पिछले दिनों की हम ,
उन बातों की खुशबु में मचलते चले गए।
जो खिलखिलाहटें थी झरनों की सी निर्मल,
आँखें बंद कर के उनको हम सुनते चले गए।
कुछ पल मेरे काँधे पे सर रख सोयी रही आप,
कुछ पल आपके साए में हम ढलते चले गए।
आपके बिना जीवन जैसे लड़खड़ा के है चलता,
आप हैं साथ तो हम गिर के संभलते चले गए।
हम आप के दिल में बसे हैं धडकनों की तरह,
आप मेरी आँख में ख्वाब सा पलते चले गए।
हम तो मौज हैं सागर की सर पटकते रहते हैं,
आप चाँद हैं जिसे देख हम मचलते चले गए।
हम न बदले हैं न बदलेंगे औरों की खातिर ,
आपकी खातिर पर हम तो बदलते चले गए।
-नीहार