रविवार, 31 जनवरी 2010

एक दूजे के लिए

(यह कृति जून १९८८ में मैंने बनाई थी और इसका नाम दिया था "मेड फॉर इच अदर"(एक दूजे के लिए)..)जाहिर है यह कृतित्व मेरे व्यक्तिगत भावों को दर्शाता है ..नीचे इस से जुडी एक छोटी सी कविता भी है ,जिन्हें मेरे दिल की धरकनो ने बुना, हाथों ने कलम उठाया, कागज़ पे लिखा और मन ने उस वक़्त से जो गाना शुरु किया तो आज तक गाये जा रहा है...)
नींद में डूबी उनकी आँखें कितनी प्यारी लगती हैं,
खुल जाए तो वो ही आँखें छुरी कटारी लगती हैं।
जुल्फ अगर सावन की बदली, होंठ है जैसे सुर्ख गुलाब
रंग सुनहरी धूप किरण है , उनका पूरा चेहरा है माहताब,
साँसों की खुशबु से वो तो फूलों पे भारी लगती हैं,
नींद में प्यारी लगती हैं।
चाल अगर हिरनी सी है तो , स्वर कोयल की मीठी तान,
अंग अंग मदिरालय उनका , जो दे जीवन को नया प्राण,
एक फूल क्या वो तो के फूलों की क्यारी लगती हैं,
स्वर्ग की नारी लगती हैं।
-नीहार ( जून १९८८)