शनिवार, 16 जनवरी 2010

नाद ध्वनि

(ये कवितायेँ मैंने वर्ष १९८८ और १९९० के बीच लिखी थी..मेरे विद्रोही तेवर उस वक़्त भी मेरी लेखनी को प्रभावित किये हुए थे और मैं चाह कर भी रोमांटिक नहीं हो पा रहा था...रोमांटिक कविताओं में भी कहीं एक आक्रोश दिखेगा, जिस से निजात पाने में मुझे कई वर्ष लग गए...)
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जब भी कुछ लिखना चाहता हूँ,
मेरे भीतर कुछ खुदबुदाता है ,
कुछ कुरेदता है मेरे दिल को ,
नाखुनो में भरी मिटटी नम / गीली होती है।
शायद,
निर्माण की क्रिया अभी अधूरी है,
शायद,
निर्माण की प्रक्रिया चल रही है,
शायद........शायद ....शायद,
और, इस निर्माण - प्रतिनिर्मान - पुनर्निर्माण की क्रिया - प्रक्रिया में,
उलझता रहा मन,
घूमता रहा नदी , जंगल , पहार और वन
पर मिला कुछ भी नहीं - कहीं भी नहीं -
ना ही शान्ति ... ना ही क्रान्ति ....
मिली भी तो .......
सिर्फ और सिर्फ ..... भ्रान्ति !
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जिंदगी -
कुछ मकसद तो है....
क्या?
जीना? - या कुछ करना?
जीना - तो फिर किसके लिए?
और करना - तो क्या?
दरअसल - इन्ही बेमानी सवालों के चक्रव्यूह में,
फंसे फंसे हम -
अपनी जिंदगी का अर्थ खो देते हैं , और
हमें पता तक नहीं चलता।
अंधे सवालों और बहरे जवाबों के बीच की दूरी ही ,
हमारी वास्तविक लाचारी है - मजबूरी है ,
और हमें उस से हर हाल में बचना होगा ,
जीने की खातिर, रोज़ एक नया ढोंग रचना होगा।
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मैं,
एक दिन राख हो जाऊँगा शमशान में -
या, गार दिया जाऊँगा कब्रिस्तान में -
या, किसी ऊंची मीनार पर रख दिया जाऊँगा,
ताकि मरने के बाद भी मैं काम आ सकूँ -
उन पक्षियों के, जो मुझे पचा सकें ।
पर,
फिर भी मैं जीवित रहूँगा....
एक एहसास बन, उन दिलों में ,
जिन्हें मैंने प्यार किया था।
अल्फाज़ बन उन होठों पे,
जिन्हें मैंने चूमा था।
यादगार बन उन फिजाओं में,
जहाँ मेरी साँसे घुलती थी , और
याद बन फिर घुलती रहेगी।
दुनिया, पहले भी बस्ती थी,
अब भी बस्ती है , और कल भी बसेगी।
***********************************(आगे जारी रहेगी प्रस्तुति.कृपया प्रतीक्षा करें)