
अपने विषय में क्या कहूँ....लिखना मुझे अच्छा लगता है...लिखता हूँ क्यूंकि जीता हूँ...
मेरे बारे में
- विजय रंजन
- मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...
मंगलवार, 19 जनवरी 2010
भांति भांति के गणेश
ये सारे गणपति के स्केच मैंने फुर्सत के उन क्षणों में उकेरा था जब मेरे पास मेरे सोच, विचार और कल्पना शील मानस का साथ मेरी उँगलियाँ दिया करती थी और मैं हाई टेक पेन उठा किसी भी कागज़ पर या विजिटिंग कार्ड्स पर चित्र उकेर दिया करता था....उम्मीद है, आपको ये पसंद आएगा। फोटो की क्वालिटी के लिए माफ़ी चाहूँगा । - निहार


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