ये मेरी –
फैली हुयी बाहें दो –
शाख़ पेड़ की हो,
कब से मुंतज़िर हैं तेरी.....
पतझड़ है तो क्या हुआ –
पलाश हो,
खिल तो सकते तुम –
मेरी शाखों पे.... ।
-नीहार ( चंडीगढ़, 2 अप्रैल 2013)
अपने विषय में क्या कहूँ....लिखना मुझे अच्छा लगता है...लिखता हूँ क्यूंकि जीता हूँ...