मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

तमस की पीड़ा

नींद आ रही....
अधखिले पुष्प क़लियों के स्फुरण में -
उनके मुरझा के बंद होने की प्रक्रिया ,
पलकों में दुहराई जा रही.... ।
रात -
तमस की पीड़ा का  ,
विषपान करने -
मुझे अपने पास बुला रही ....
वह जानती है कि,
उसकी पीड़ा का -
मैं ही वरण कर सकता हूँ....
उसके दुख का मैं ही हरण कर सकता हूँ।
मैं -
बस अपनी आँखें  मूंदता हूँ , 
और -
रात एक ख्वाब कि तरह -
खूबसूरत हो  जाती है  ।
सुबह -
सूरज कि किरणों पे सवार ,
खुशियाँ आ जाती मेरे द्वार -
तमस कि पीड़ा हो जाती निर्विकार। 
- नीहार 





शनिवार, 7 अप्रैल 2012

यात्रा अनन्त हो....

न आदि हो और न अंत हो,
पर यात्रा अनंत हो ।
कर्म कुछ ऐसा करें कि,
गुंजायमान दिग दिगंत हो ।
रचें कुछ ऐसे चित्र कि ,
चहुँ ओर बिखरा बसंत हो ।
लेखनी में हो सामर्थ्य असीम ,
और विषय ज्वलंत हो ।
स्वप्न दर्शी हों हम सभी,
और हमारी कल्पना जीवंत हो ।
न ही झूठ कि खेती करें,
और न ही बातें मन गढ़ंत हो ।
- नीहार

गुरुवार, 29 मार्च 2012

नदी की खुशबु

उड़ते हुए पत्तों को दोनों हाथों से लपक लेता है ,
उसने मौसम की गवाही में ये खत लिखा होगा।
जैसे झड़ते हैं टूट कर शाख के पत्ते इस मौसम,
वैसे ही आँख को शाख कर वो झर गया होगा।
कहाँ से चुन लिए शब्द उसने अपने गीतों के ,
कहाँ से दर्द ला उन गीतों मे रच दिया होगा।
अपनी आवाज़ में भर ली होगी नदी की खुशबू ,
और फिर उसमें मौसम का रंग मिला दिया होगा।
शाम लाती है मेरी वो अपनी ज़ुल्फों की छाँव तले ,
अपनी आँखों को मेरे घर चराग उसने किया होगा।
लाख कोशिश करे पर मर नहीं पाता है ये ‘नीहार’,
तेरे लब से शायद अमृत कभी उसने पिया होगा।

गुरुवार, 15 मार्च 2012

नयन पलक ......

नयन पलक जब उठत हैं,
चहुँ बिखर जात हैं धूप।
हर लेता मन का दुःख विषाद ,
प्रिया का अप्रतिम यह रूप॥
सब कुछ तो है पा लिया ,
पाय प्रिया का निश्छल प्यार।
जीवन में नहीं अब कोई कमी,
जब से पायो प्रियतमा अनूप॥
मन से कभी न मिट सका ,
तेरे दिव्य दरस की चाह।
पल पल करता मन याद तुझे ,
पल पल उठती दिल में हूक ॥
बिन तेरे सब कुछ सून है ,
न ही रंग न ही मधुर संगीत।
तुझसे ही मुखरित वाणी मेरी,
बिन तेरे मैं तो रहता मूक॥
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कौन है जो याद करता है मुझे ,
कौन है जो संग मेरे गा रहा -
कौन है जो उमड़ घुमड़ कर बादलों सा ,
मेरे प्यासमन को है तरसा रहा .....
किसकी आँखें देखती हर पल मुझे ,
कौन मेरे दिल की धड़कन सुन रहा -
किसकी साँसों में महक उठता हूँ मैं ,
कौन मेरे लब से रंगत चुन रहा .....
किसकी जुल्फें रात का साया बनी ,
कौन है जो मदहोश मुझको कर रहा -
किसकी आँखों के समंदर में डूब कर,
ज़िन्दगी का मय ये शायर है पी रहा ....
क्या कहूँ तुमसे मैं तुम सब जानती हो ,
जो भी है वो उसको तुम पहचानती हो -
आईना भी देता है तेरे प्रश्न का उत्तर,
पर इस हकीकत को नहीं तुम मानती हो.....
चलो कह ही देता हूँ की तुम मेरा प्यार हो ,
मेरी कविता में प्रतिबिंबित उदगार हो -
दिल की धडकनों में गुम्फित तुम हो प्रिये,
तुम ही मेरे जीवन का अद्भुत श्रृंगार हो....

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

मैं ख्वाब की रेत बिछाता हूँ...

बहुत याद आते हो मुझे -
पलकें बंद करूँ तो,
ख्वाब सा देखूं तुम्हे मैं -
आँख खुलते ही तुम मुझे ,
हर शय में शामिल दिख रही हो....
यह प्यार मेरा प्रसश्त करता ,
आराधना का मार्ग जानम -
चल के जिसपे,
मैं पहुँच जाता हूँ तुम तक....
मेरे थके हारे मन का विश्रामस्थल,
मेरे जन्मों की तपस्या का प्रतिफल है ।

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मैं ख्वाब की रेत बिछाता हूँ,
और नंगे पाँव -
तुम तक भागा आता हूँ....
मेरे बदन से चूते हुए श्वेद कण ,
उस रेत पे रात के जुगनुओं की तरह -
दमक उठते हैं....
तुम उन्हें अन्जुरिओं में उठा,
अपनी आँखों में भर लेती हो -
मैंने तुम्हारी आँखों में,
अपने लिए असीम प्यार देखा है.....
मैं उस प्यार के महासागर में -
यूँ ही डूबा रहना चाहता हूँ....
हाँ ,
मैं जीना चाहता हूँ ......

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

भ्रमित भ्रमर का ज्ञान

पुष्प गुच्छ से लदा पादप,
भ्रमर रहत है अकुलान।
किन पुष्प मुख चूम के,
करूँ मैं रस का पाण ।।
भ्रमित भ्रमर को देख के,
गुन्चन सब मुसकाय।
मधुर गुंजन श्रवण को,
सबका मन ललचाय।।
उड़ जाता कभी उधर को,
फिर आ जाता इस ओर।
उड़ता रहता यूँ ही भ्रमर,
थामे लालच की एक डोर।।
एक पुष्प कहे विहँस के ,
प्रियतम आओ मेरे पास।
मैं तुमको आओ देती हूँ,
जीवन दायिनी श्वास॥
तभी दूसरी बोल उठी,
न जाना तुम उत ओर।
मेरे पास आओ प्राण मेरे,
तुम हो मेरे सिरमौर॥
बोल उठी मादक रस पूरित,
मकरंद युक्त एक रतनार।
मेरे पास रहो तुम भँवरे,
कम से कम दिन चार॥
भ्रमित भ्रमर थक हार कर,
बैठा कंटक युक्त एक डाल ।
न रस था न गंध वहां थी ,
न मकरन्दी माया जाल॥
पर थी नीरव शांति वहां,
और था वहां सुख संतोष।
न था रूप रस रंग वहां ,
पर था आनंद का एक कोष॥
भ्रमर समझ गया सुख का मूल,
नहीं रूप रस रंग और राग ।
सुख का मूल तो संतोष में ,
सुख का मूल है त्याग ॥
उड़ता उड़ता भ्रमर पुनः ,
जा पहुंचा पुष्प के पास।
रक्खो अपना रूप रंग ,
और रक्खो अपना सुवास॥
ये सब नहीं सुख के मूल,
न ही इनसे मुक्ति है मिलती।
न ही इनसे इंसान के अन्दर,
सुवाषित पुष्प है खिलती॥
तुम्हे अगर सच में करना हो,
मधु रस का ही पाण ।
तो फिर तुम नित किया करो,
अपने निज का नित दान॥
दान से बड़ा पुण्य नहीं कोई,
न बड़ा कोई तीरथ ध्यान।
न ही पूजा इससे बड़ी कोई,
न ही बड़ा कोई है स्नान॥
कंटक ने लोलुप भ्रमर को,
कर दिया संत समान।
भ्रमर गुण गुण कर बांच रहा,
अपना ताज़ा ताज़ा ज्ञान॥
- नीहार (२०/०२/२०१२)

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

तुम हो तो मैं हूँ....

मैंने तुम्हारी खोज में -
दिग दिगंत में हवाओं को,
भेज रक्खा है....
मुझे ऐसा क्यूँ लगता है,
की मेरे ह्रदय का हर कोना,
तुम्हे ही अपने अन्दर -
छुपा के बैठा है।
हवाएं यूँ ही -
लौट आती हैं खाली हाथ ....
पर मुझे तुम्हारी कमी,
नहीं महसूस होती ....
क्यूंकि तुम मुझमें -
उसी तरह शामिल हो,
जैसे जल में घुली -
जीवनदायिनी हवा....
अलग नहीं कर सकते एक से दुसरे को -
बिना उनकी प्रवृत्ति बदले हुए हम ....
और,
हमारी प्रवृत्ति -
कोई नहीं बदल सकता...
नियति भी नहीं !
- नीहार (१५/०२/२०१२)