बुधवार, 18 मई 2011

रौशनी का प्रतिनिधि




मुझे - यानि सिर्फ मुझे -


एक अँधेरे ने जकड़ रक्खा है ,


अपने मजबूत हाथों में पकड़ रक्खा है।


वे जानते हैं की मैं समरथ हूँ -


सूरज अपनी हथेली पर उगा सकता हूँ,


और, धूप की चाशनी में खुद को पका सकता हूँ।


वो ये भी जानते हैं कि ,


जिस दिन सूरज कि खेती शुरू हो जाएगी,


उस दिन उनकी अस्मिता ही खो जाएगी।


लोग अँधेरे कि आड़ ले सूरज उगायेंगे ,


और -


अपने हथेलियों पर सरसों सी धूप खिलाएंगे ।


और जब, हथेलियों पर उगा सूरज -


अपनी रौशनी चारों ओर बिखेरेगा , तो -


अँधेरे का देवता कर जाएगा कूच, और तब ही -


सही अर्थों में समाजवाद आएगा ।


समाजवाद यानी वह 'वाद ', जहाँ सूरज कि धूप -


सबको बराबर मिलेगी/ हर चेहरे पर हंसी बराबर खिलेगी।


अँधेरे के देवता यह भली भांति जानते हैं कि,


'समरथ को नहीं दोष गोसाईं ,


समरथ होत खुदा कि नाईं ।'


- समरथ को यह मालूम है कि,


युद्ध और प्रेम में सब जायज है- सब सही है,


और -


समरथ के हाथ में ही किस्मत की बही है।


इसलिए अँधेरे ने जकड़ रक्खा है समरथ कि बाहें ,


अंधी कर दी है उसकी दूर देखने वाली आँखें,


क़तर डाली हैं उसकी नर्म नाज़ुक पांखें।


पर कब तक? कितने दिनों तक?......


कल फिर नए पंख उगेंगे....


आँखों में नयी चमक फिर से कौन्धेगी...


बाहें शक्तिशाली हो फिर से फरकेंगी...


और, तब -


समरथ- यानि मैं


चीड़ डालूँगा अँधेरे कि छाती को- और,


उसके रक्त से , अपनी हथेली कि ज़मीन सींच,


सूरज उगाऊंगा ....


सही अर्थों में,


मैं ही रौशनी का प्रतिनिधि कहलाऊंगा।


बुधवार, 4 मई 2011

सुख का बीज मंत्र

कल ही तो मैंने - एक घरौँदा बनाया था ,
और , आज उसे तोड़ डाला (या तोड़ने को मजबूर हुआ)।
यानि - जिंदगी को एक अनजाने राह पे मोड़ डाला(यूँ खुद से दूर हुआ)।
स्तब्ध हूँ मैं - अशांत भी,
यानि - मेरे भीतर और बाहर का कोना कोना
- रो रहा है, अपनी किस्मत का रोना।
आंसू बहते नहीं - खून भी सफ़ेद हो गया है।
कल तक का महाभारत - आज से चारों वेद हो गया है।
कुछ समझ में नहीं आता - समझना चाहता भी नहीं।
क्यूँकि जानता हूँ - व्यक्ति और व्यक्ति के बीच की जो दूरी है,
वही हर व्यक्ति कई अपनी मजबूरी है।
और कुछ भी बातें हैं-जो भीतरघातें हैं ।
पर, दरअसल - मेरी समझ की दानी बहुत छोटी है,
सीधे सपाट लहजे में, मेरी अक़ल थोड़ी मोटी है ।
तो - जो वह कल का घरौँदा था,
आज मेरे सामने ही मुंह औंधा था।
यानि, न घर बचा था न घाट ,
चारों तरफ बाट ही बाट - सपाट सपाट।
उसी सपाट बाट पर - और उस बाट के चौराहे पर,
मुझे मिला एक ग्यानी/पंडित -
जिसके अनुसार - समय कर रहा था मुझे दण्डित।
हँसते हुए उन्होंने मुझसे कहा की ऐ वत्स
तुमने जो घरौंदे का सपना जो पाल रक्खा था,
उसे बनाने के लिए तुम निकल गए वक़्त से आगे -
इसलिए, आज तुम खुद को पा रहे अभागे।
तुम जो सोचते हो - वही रोचते हो।
पर कुछ लोग जो रोचते हैं , वो सोचते नहीं।
तुम्हारा घर कुछ लोगों की दोतरफा सोचों का नतीजा थी ,
इसलिए भरभरा के बालू के मकान सा,
आ गिरी थी हवा के हलके झोंको से।
तुमने सोच और रोच को एक किया ,
काम कई नेक किया।
जिस किसी की आँख में आंसू देखा,
उसे उँगलियों की पोरों से उठा , भर लिया अपनी आँख में,
और उनके भीतर की आग को पी - बदल दिया यसे राख में।
तुम दूसरों की सुख शान्ति के लिए जिए-
दूसरों के हिस्से का ज़हर तुम ही पिए।
जब तुमने यह सब किया , तो सचमुच तुम ने जिंदगी को जिया है।
यह तुम समझ लो की तुम्हारा घर टूटा नहीं - विस्तृत हो गया है - बड़ा हो गया है।
विस्तृत नभ - फैली हुयी धरती के बीच,
तुम्हारा "मैं" सिमट कर छोटा हो गया है।
घरौंदा/घर टूटने का अब गम, नहीं करना है,
क्यूँ की तुम्हारे लिए तो सबका घर अपना है - सुख अपना है -
दुःख अपना है - और यह सब,
उनके लिए बस सपना है,
जो सोच और रोच को अलग करते हैं -
वो रोज़ एक नयी मौत मरते हैं।
तुम रोओ मत - दुखी मत हो -
सुख का बीज सर्वत्र बोओ ।
अपने पाप दूसरों के पुण्य से धोओ

एक के घर में पैर - दूसरे के घर में सर,
तीसरे के घर में धड रख कर -
चैन की नींद सोओ।

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

सुन भाई साधो...

(मेरी यह कविता मेरा निज का आर्तनाद है...यह किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय या कार्यक्षेत्र या अन्य किसी पर भी कोई आक्षेप नहीं है।अगर फिर भी किसी को चोट पहुँच रही हो, तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ.)


सुन भाई साधो, सुन भाई पीर,
देश की हालत अति गंभीर।


चोर सभासद राजा डाकू,
गर्दन पर फेरे सब चाकू,
चोरी कर बन गए अमीर,
देश की हालत अति गंभीर।


खेलत हैं सब खून की होली,
फेंके बम और मारे हैं गोली,
बंगाल हो या हो वो कश्मीर,
देश की हालत अति गंभीर।


दहेज का यहाँ खुला है गेट,
जैसा हो लड़का वैसा ही रेट,
अग्नि समाधि लेती सब हीर,
देश की हालत अति गंभीर।


लड़की होत विचित्र यहाँ प्राणी,
घूरे जिसको मूरख और ज्ञानी,
होत हरण नित उनका चीर,
देश की हालत अति गंभीर।


दे डोनेशन और करी पढ़ाई,
दिया घूस और नौकरी पायी,
अब खावत हैं सरकारी खीर,
देश की हालत अति गंभीर।


पाँव के नीचे सिकुड़ी धरती ,
खुली हवा भी नहीं है मिलती,
दूनी हो गयी आदम की भीड़,
देश की हालत अति गंभीर।


कुर्सी हेतु होत महाभारत,
होवइ पूरा जिससे स्वारथ,
बाप मरे है हर बेटा अधीर,
देश की हालत अति गंभीर।


राजा ढोंगी परजा ढोंगी,
भक्त और भगवान भी ढोंगी,
ढोंगी हैं सब यहाँ फकीर,
देश की हालत अति गंभीर।


बेच बाच कर देश को खाते,
कुछ बचता तो घर ले जाते,
म्हारी आँखों से बहत है नीर,
देश की हालत अति गंभीर।


हवा प्रदूषित नदी प्रदूषित ,
पूरी की पूरी सदी प्रदूषित,
है दूषित गंगा जमुना तीर,
देश की हालत अति गंभीर।


सब भाई से है यही दुहाई,
देश को समझो अपनी माई,
और बाँट लो सब उसका पीर,
देश की हालत अति गंभीर।


मन में लेना इतना ठान ,
सत्य आचरण और ईमान,
यही तुम्हारा हो सिर्फ तूणीर,
देश की हालत अति गंभीर।
-नीहार

रविवार, 24 अप्रैल 2011

भविष्य : एक प्रश्न

सारा माहौल ही बदरंग हो गया है,
चोर और सिपाही का संग हो गया है।
राज करना चाहते हो तो आओ सुनो ,
भीख में वोट मांगना ढंग हो गया है।
एक कुर्सी के कई दावेदार हैं यहाँ पर,
बेटे और बाप में ही जंग हो गया है।
क़त्ल करना अब कोई अपराध है नहीं,
क़त्ल तो राजनीति का अंग हो गया है।
बुद्धिजीवी बुद्धि को ही खा के हैं जी रहे
सब के सोच का दायरा तंग हो गया है।
महाभारत अब किताबों की चीज़ है कहाँ,
घर घर में महाभारत का प्रसंग हो गया है।
बैसाखियों का व्यापार जोरों पर है यहाँ,
दो टांग वाला सब देखो अपांग हो गया है।
गाँधी और बुद्ध की तुम अब बात मत करो,
उनके विषय के रंग में अब भंग हो गया है।
दूध की नदी अब दूध की रही नहीं यहाँ पर,
खून की नदी सा उसका देखो रंग हो गया है।
जुआ और शराब से लेकर बलात्कार तक,
आज के नवयुवकों का प्रेरक प्रसंग हो गया है।
हम तो बस निहार रहे इस देश के भविष्य को,
वह भविष्य जो अँधा, बहरा और लंग हो गया है।
*******************************************
सच
झूठ का
चेहरा सच से
मिलता ही नहीं पर
सच और झूठ का रिश्ता
बहुत पुराना, मुलायम और नाज़ुक है।
इसलिए मुझे लगता है की तुम्हारा
और मेरा सम्बन्ध भी ऐसे
ही झूठ और सच
की तरह ही
नाज़ुक ,मुलायम
है।

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

सूखे रेत का सहरा....

दिल मे खुलूस और आँख मे दर्द लहरा रहा,
मेरे जज़्बात पे मेरे ही ज़मीर का पहरा रहा।
वो बहारों की कर रहा था ख़्वाहिश कबसे,
उसके हिस्से तो सूखे रेत का सहरा रहा।
न किसीकी सुनता है न कहता ही किसी से,
लोग कहते हैं की वो गूंगा रहा बहरा रहा।
तुम दरिया की तरह मचल के बहती रही,
वो समंदर सा बस अपनी जगह ठहरा रहा।
सुना है उसका कद हिमालय से भी ऊंचा है ,
और उसका गांभीर्य सागर से भी गहरा रहा।

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

कतरा कतरा मोम सा पिघलता रहा ............

रात यूं ही देर तक चाँद फिर जलता रहा,

आसमां कतरा कतरा मोम हो पिघलता रहा।

वो अजीब शख्स है किसी की भी नहीं सुनता ,

उसकी खातिर ही सही मगर वो बदलता रहा।

उठ के गिरता रहा और गिर के उठता रहा,

रात और दिन मगर खुद ही वो संभलता रहा।

वो उफक पे बिखरे हुये है अपने सौ सौ रंग,

वो सूरज है अपने मुंह से धूप को उगलता रहा।

वो जानता है की चलने का नाम ही है ज़िंदगी ,

इस जिंदगी की खातिर रात दिन वो चलता रहा।

छले जाने का डर उसको सालता है हर समय ,

डर से निजात पाने को खुद को ही वो छलता रहा।

वो जानता है पानी के बिन तड़प उट्ठेगा आदमी,

उनकी प्यास बुझाने को वो बर्फ सा गलता रहा।

*****************************************

पाजेब बज रही है या खनकता है तेरा कंगन

आँखें हैं की तेरी याद में बरसती हैं ज्यूँ सावन।

तुझको पाने की ख़्वाहिश कुछ इस तरह सुलगी,

की मन मेरा राम के बदले हो जाना चाहे रावण ।

तेरे बिना सब उदास सा लगे फीका लगे हर रंग ,

जो तू हो साथ तो फिर सहरा भी लगे मनभावन।

**********************************************

वो अपनी आँख में खंजर छुपाए बैठा है ,

मेरी ही तबाही का मंज़र छुपाए बैठा है।

वो जानता है कि मुझे तैरना नहीं आता,

इसलिए खुद में वो समंदर छुपाए बैठा है।

जिसको भी देखता है सम्मोहित किए देता,

अपने अंदर वो जादू मंतर छुपाए बैठा है।

जिधर से भी गुज़रता है तूफान उठा देता है,

अपने सीने मे वो एक अंधड़ छुपाए बैठा है।

उसकी आँख में सबके लिए मोहब्बत है ,

अपने भीतर वो एक मंदर छुपाए बैठा है।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

तेरी मेरी सब की बात

चुनावी सरगर्मियां फ़िर तेज़ हैं,

दाँव पर कुर्सियां और मेज़ हैं।

शासक तो सुनहरे भविष्य हैं ,

और शासित इतिहास के पेज हैं।

जो पिछड़ गए वो हिन्दुस्तानी हैं,

जो आगे हैं वे सभी अँगरेज़ हैं।

ख़ुद को देव संतान हैं वे कहते,

पर सारे के सारे नेता तो चंगेज़ हैं।

गिरगिट कहाँ टिक पाता उनके आगे,

वे सब के सब तो खानदानी रंगरेज़ हैं।

आप पढ़ लिख कर भी मूर्ख हैं,

वे तो बिना पढ़े भी सबसे तेज़ हैं।

आप के कारनामे तो कुछ भी नही,

उनके कारनामे तो हैरत अंगेज़

आपको तो कांटो का बिस्तर भी नही,

उनके लिए तो बिछी फूलों की सेज हैं।

****************************************

लोग संभावनाओं में जीते हैं,

और,

संभावनाओं में ही मर जाते हैं...

इसलिए ,

हाथ का रूपया दे कर लॉटरी का टिकट खरीद लाते हैं...

********************************************

सती प्रथा के समर्थन में उनके भाषण का एक अंश,

जो पति को जीवन भर रही जलाती ....

उन्हें भी लगे अग्नि-दंश।

************************************************

वे छुआछूत के विरोधी हैं,

जी हाँ....

वे छू अछूत के विरोधी हैं...

*****************************

सुना है सरकार ने रिज़र्वेशन पॉलिसी को

एक नया आयाम दिया है,

जिंदगी के साथ साथ अब,

मौत को भी रिज़र्व कोटे में लिया है...

****************************************

एक सभा में नेता के भाषण का एक अंश...

"हम इस धरती को स्वर्ग बनायेंगे

और आप सभी स्वर्गवासी कहलायेंगे"।

****************************************

अब्राहम लिंकन ने ,

प्रजातंत्र को प्रजा का,प्रजा के लिए ,प्रजा द्वारा शाषण बताया था...

पर आज तो इसके अर्थ का ही अनर्थ हो गया,

कल का प्रजातंत्र था....प्रजा का तंत्र...

और आज का ...

आदमी के खिलाफ आदमी का ...

एक खुला हुआ षडयंत्र...

*************************************

एक परीक्षा में प्रश्न था...

नेता का पर्यायवाची शब्द लिखें...

एक उत्तर पुस्तिका पढ़ परीक्षक गए काँप,

उत्तर लिखा था नेता का पर्याय है "सांप "।

*************************************

हर शब्-ऐ-गम की सुबह हो ये ज़रूरी तो नही.....

यही उनका सर्व प्रिय सिद्धांत था...

इसलिए शब्-ऐ-गम में डूबा उनका प्रान्त था...

*************************************

प्रधान मंत्री का आदेश था ....

की गरीबों की आँख अश्रुविहीन रहे,

किसी गरीब की आँख से आंसू न बहे।

सरकारी तंत्र ने प्रधानमंत्री के आदेश का

चुस्ती दुरुस्ती से पालन कर दिया,

सभी गरीब की आँखें निकाल ली,

और उनमे सोखता कागज़ भर दिया।

************************************

चलो चलें इक्कीसवीं सदी की और ,

यही उनका सबसे प्रिय नारा था ,

जोड़ तोड़ की कमी ने उन्हें मारा था...

**************************************