शनिवार, 3 अप्रैल 2010

निरर्थकता का रिश्ता

हो सकता है मैं तुमसे कुछ सवाल करूँ -
मुझमें अनंत जिज्ञासा है।
लेकिन मैं जानता हूँ - की जब तुम,
उत्तर देने लगोगे - तो मेरे दोनों कान बहरे हो जायेंगे -
तुम्हारे समाधान कुछ भी नहीं दे पायेंगे मुझे।
जो भी खोजना है - जो भी पाना है -
जो भी घटाना है और बढ़ाना है -
सिर्फ अपने तरीके से - अपने आप।
* * * *
आँखें आधी मूँद कर देखो -
तो लगता है तमाम चीजें हैं बरकरार -
आपस में उलझती जा रही हैं, पर -
टूटती फूटती नहीं।
एकाएक वर्तमान नुकीला हो अतीत को खोदने लगता है।
एक धुंध सी बहार - भीतर मंडराती है,
लेकिन -
कुछ होता नहीं - कुछ भी नहीं।
* * * *
जिंदगी भर आदमी -
अपने ही बंद दरवाज़े खोलता है,
और,
खोलकर देखता हुआ थकता है।
दूसरों के लिए अजूबा या निरर्थक -
किन्तु -
यह निरर्थकता का रिश्ता ही वास्तविक है -
जो बदलता नहीं।
- नीहार

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

उनके जाने से मौसम रंगत बदल रहा है.

नम हुयी आँख मेरी और दिल बैठा जा रहा है,
या खुदा उनके जाने का दिन करीब आ रहा है।
घर आये तो रौशनी का झूमर खिल उठा जैसे,
उनके जाने का ख्याल मुझे अब खाए जा रहा है।
उनके क़दमों की आहट सुन बुलबुलें गाने लगी ,
उनके जाने की बात सुन कोई मर्सिया गा रहा है।
वो आये तो जैसे हवाओं में खुशबु सा छा गया है,
उनके जाने की सुन मौसम भी रंगत बदल रहा है।
जिंदगी में रौनक है उन्ही से औरहै उनसे खुशबू भी,
वो हैं तो सब है इस बात का एहसास वो दिला रहा है।
-नीहार

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

मैं और मेरा एहसास.....

मैं -
एक दिन राख हो जाऊँगा श्मशान में -
या, गाड दिया जाऊँगा कब्रिस्तान में -
या, किसी ऊंची मीनार पे रख दिया जाऊँगा,
ताकि मरने के बाद भी मैं काम आ सकूँ,
उन पक्षियों के , जो मुझे पचा सकें।
पर, -
फिर भी, मैं जीवित रहूँगा -
एक एहसास बन, उन दिलों में -
जिन्हें मैंने प्यार किया था।
एक अलफ़ाज़ बन, उन होठों पे -
जिन्हें मैंने चूमा था।
यादगार बन , उन फिजाओं में -
जहाँ मेरी सांस घुला करती थी -
और(याद बन) घुलती रहेगी।
दुनिया पहले भी बसती थी-
अब भी बसती है -
और, कल भी बसेगी।

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शून्य हूँ - या कुछ और -
कह नहीं पाता।
मन ही मन रह जाता है अव्यक्त -
कुछ कुछ /कुछ न कुछ
जो भरा था - कब भरा था?
जो हरा था - कब हरा था?
पर जो डरा था - अब भी डरा है।
मन है की अब भी मारता है ठाठें,
तोड़ता है वह बाँधें -
कहता है क्यूँ बाँधें वह खुद को -
क्यूँ सहमे वह खुद से -
क्यूँ सहे वह अपना प्रहार / अपने से हार।
चुक जाऊँगा मैं / फुँक जाऊँगा मैं -
धीरे धीरे - आँखें मीडे -
चलते चलते रुक जाऊँगा मैं।
रुक जायेगी तब ये धरित्री -
रुक जायेगी चलती हवा भी -
रुक जाएगा सब चल अचल।
देह का पिंजर पड़ा सोता रहेगा ।
अश्रु अमृत चरण को धोता रहेगा। ।
और रहेगा शब्द होता - निःशब्द सा।
पारा पारा रात चांदी हो रहेगी।
स्वप्न आँखों में चुबे जो अश्रु बन कर,
धरती पर गिरते ही वो आग होंगे।
मूक मेरे स्वर कभी तो एक दिन,
किसी गन्धर्व या जोशी के गले के राग होंगे।
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मेरे भीतर एक स्वर्ग है -
और बाहर एक नरक का विस्तार।
दोनों के बीच एक मजबूत दरवाज़ा है -
मैं, उस दरवाज़े की चौखट पे खड़ा ,
स्वर्गी आनंद में आकंठ डूब -
नार्किक सौंदर्य का दृश्यावलोकन कर रहा हूँ।
और इसी अवस्था में -
ना जाने कब,मेरे पाँव दरवाज़ा पार कर -
अपनी स्वर्ग सी दुनिया से बाहर आ जाते हैं।
सच - स्वर्ग के बंद घटते एकांत से,
बेहतर है - भली है - नरक की खुली हवा।
-नीहार

रविवार, 28 मार्च 2010

खाली हाथ

तुम सोच रहे होगे - की,
जब भी मैं आता हूँ - खाली हाथ ही आता हूँ।
इस बार भी,मैं खाली हाथ ही आया हूँ।
वैसे, आने से पहले - इस बार,
मैंने भी सोच लिया था,की -
नहीं जाऊँगा खाली हाथ मैं।
पर, हूँ ना आदत से मजबूर - ,इसलिए,
आ ही गया मैं फिर से खाली हाथ -
मैंने सोचा था - की,
तुम्हारे लिए - बचपन की धूप चुरा कर ले चलूँ,
यह भी सोचा की -
इश्किया उम्र की खुशबु को - नथुनों में भर ले चलूँ।
या वे ठहाके ले चलूँ, जो अब भी गले में अटके पड़े हैं।
बहुत कुछ - बहुत कुछ सोचा था मैंने ---
झरनों की खिलखिलाहट/पत्थरों की तमाशाई/पेड़ों की बुजुर्गिअत/
हवाओं की सरसराहट/भंवरों की गुनगुनाहट/चांदनी की आहट
उन सबके विषय में सोचता था मैं --
जो थीं गवाह हमारे बचपन की - और,
बचपन से तब्दील होती जवानी की -----
पर, - ला नहीं पाया मैं - कुछ भी तुम्हारे लिए।
पहले जब भी मैं आता था -
तो मेरा हाथ खाली होता था,
और ह्रदय भरा होता था।
मैं आज भी भरे ह्रदय और खाली हाथ ,
तुम्हारे सामने हूँ --
मैं शर्मिंदा हूँ की खाली हाथ हूँ -
पर, ऐ मेरे दोस्त -
लम्हों को मुट्ठी में जकड मैं भला कैसे लाऊं?
ख़ास कर,
वैसे लम्हों को , जिनकी खुशबु ने मेरे दिल को धड़कन दी है।
जिस क्षण मैं उन लम्हों को पकड़ने की कोशिश करूँगा -
मेरी धड़कन हो जायेगी बंद, और शायद मैं तुम्हारे पास,
कभी ना आ सकूँगा।
बस इसी लोभवश मैं आता हूँ खाली हाथ, की -
कम से कम तुमसे मिलूं तो सही - तुमसे होऊं तो सही ,
क्षण भर को तुम्हारे काँधे पर सर रख सौं तो सही(रोऊँ तो सही ) ----
जिन पर सोये ( रोये) न जाने कितने दिन / महीने/वर्ष बीत गए।
- नीहार

शनिवार, 27 मार्च 2010

तुम्हारे साथ के पल


तुम्हारे साथ के दो पल, मेरे कल आज और कल।
तुम्हारी जुल्फों के साए में,मेरा दिन जाता है ढल।
मुझे मदहोश कर देती हैं ,तेरी ये दो आँखें चंचल।
वैसे हूँ पत्थर का बना ,पर तेरे साथ जाता पिघल।
जो तुम होते नहीं हो पास, तो मैं हो जाता हूँ विह्वल।
मैं सूरज की तपती किरण,तुम हो चंदा सी शीतल।
मैं पिघलता हिमखंड और तुम उससे गंगा हो निर्मल।
मैं तुम्हारा श्वास हूँ और तुम हो मेरे दिल की हलचल।
मैं ये जानता हूँ की तुम मेरी तपस्या का हो प्रतिफल।
-नीहार
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फूलों को चुनने की तो आदत नहीं थी हमें,
काँटों को आपकी राह से चुनते चले गए।
जो पल हमने गुज़ारे हैं आपके साथ साथ,
उन पलों के धागों से सपने बुनते चले गए।
जब बातें कर रहे थे पिछले दिनों की हम ,
उन बातों की खुशबु में मचलते चले गए।
जो खिलखिलाहटें थी झरनों की सी निर्मल,
आँखें बंद कर के उनको हम सुनते चले गए।
कुछ पल मेरे काँधे पे सर रख सोयी रही आप,
कुछ पल आपके साए में हम ढलते चले गए।
आपके बिना जीवन जैसे लड़खड़ा के है चलता,
आप हैं साथ तो हम गिर के संभलते चले गए।
हम आप के दिल में बसे हैं धडकनों की तरह,
आप मेरी आँख में ख्वाब सा पलते चले गए।
हम तो मौज हैं सागर की सर पटकते रहते हैं,
आप चाँद हैं जिसे देख हम मचलते चले गए।
हम न बदले हैं न बदलेंगे औरों की खातिर ,
आपकी खातिर पर हम तो बदलते चले गए।
-नीहार

गुरुवार, 25 मार्च 2010

कुछ उलझी कुछ सुलझी लट

कुछ उलझी कुछ सुलझी लट को आओ मैं सँवार दूँ,
बाहों में भर लूँ तुमको और जी भर तुमको प्यार दूँ।
मुझको नशा तेरी आँखों का है जिनमे डूबा रहता हूँ,
सागर जैसी इन आँखों को आ मैं कजरे की धार दूँ।
पतझड़ के मौसम में जब नग्न हो जाएँ सारे वृक्ष,
तब मैं तुमको अपने हाथों से पलाश सा श्रृंगार दूँ।
लब पर तेरे बिखरा होगा तबस्सुम का जो कतरा,
अपने लब से छू कर उसको मैं एक नया आकार दूँ।
तुम हो मेरे और मैं हूँ तेरा यह बंधन हैं जन्मों का,
फूल फूल पत्ते पत्ते पर मैं बस तेरा नाम उचार दूँ।
जब सूखा सा मौसम तुझको तन्हाई का दे एहसास,
तब तब मैं यादों के सावन की तुमको ठंडी फुहार दूँ।
तुम चन्दन वन की खुशबु से महकाती जीवन मेरा,
मैं पल पल तुमको मोगरे की खुशबु में सनी बयार दूँ।
- नीहार
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बुधवार, 24 मार्च 2010

दिल को दिल की बात सुनाने को दिल करता है

दिल को दिल की बात सुनाने को दिल करता है,
कुछ भूली बिसरी बात सुनाने को दिल करता है।
उनकी जुल्फें बिखरी बिखरी जैसे हों काले बादल,
उनकी चितवन मदहोशी का फैला है जैसे आँचल,
लब उनके ऐसे जैसे पगे हों अमृत रस की धार में,
उन होठों से पीकर खिल जाने को दिल करता है।
उनकी आँखें चंचल चंचल, हों जैसे मृग के दो नैन,
जिन चितवत हो जाए उसे मिले है मन का चैन,
छल छल करती उन आँखों में ठाठें मारे सागर,
सागर के उस गागर में डूब जाने को दिल करता है।
वो चलती हैं तो खिल जाते हैं शत शत नील कमल,
उनके छू लेने से हो जाते हैं कृष्ण भी श्वेत धवल,
पत्थर को छूती हैं तो उनमे जीवन भर जाती हैं,
उनकी राहों में बस बिछ जाने को दिल करता है।
काया उनकी कंचन कंचन बिखराए है स्वर्ण किरण,
रंग दे अपने रंग में सबको ,दे दे मृत को भी जीवन,
चाहूँ उनका साथ मैं हर पल अपने जीवन में हे देव,
हर पल बस उनमे ही अब रम जाने को दिल करता है।
दिल को दिल की बात सुनाने को दिल करता है।
कुछ भूली बिसरी बात सुनाने को दिल करता है।
-नीहार