बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

एक सन्नाटा पसरा हुआ

सपनो की चादर ओढ़ जब भी सोता हूँ -
तुम्हारे बदन की गर्मी मुझे नहलाती है,
दिन भर की थकन हवा में गुम हो जाती है ,
बाल उड़ उड़ कर चेहरे से अठखेलियाँ करते हैं,
आंसू आँख से निकल बस भाप हो उड़ जाते हैं,
कई दिनों की गुम हंसी वापिस लौट आती है।
पर , मेरे हाथ ज्यूँही तुम्हे पकड़ने को होते हैं -
आँखें खुल जाती हैं ,सब कुछ शांत हो जाता है।
दाढ़ी की चुभन दिल में काँटों सी फंसती है,
आँखें भीतर तक शर्म -ओ- हया से धंसती है।
वो जो सपनो का दौर था- ठाठें मारता है मेरे अन्दर,
सूख जाता है मन ही मन - मन के भीतर का समंदर,
न कुछ बहार ही बचता है , न ही बचता है कुछ अन्दर,
सिर्फ एक जलता हुआ एहसास होता है,
सिर्फ एक बेआवाज़ खामुशी होती है,
सिर्फ एक पसरा हुआ सन्नाटा होता है,
जहाँ सिर्फ मेरे रोने की आवाज़ दस्तक देती है।
-नीहार
***************************************************
मज़ा आ रहा अब हमें जीने में,
जिंदगी को मय की तरह पीने में।
कुछ ख्वाब सुलग रहे हैं आँखों में,
कुछ सदियों से पल रहे हैं सीने में।
खून सारा जल कर राख हो गया ,
बदन गल कर नह गया पसीने में।
कुछ मुश्किलें हम से टकरा टूट गयी,
कुछ तैर गयीं हालात के सफीने में।
जिंदगी की बदसूरती लगता है जैसे,
बदल गयी हो संगमरमरी हसीने में।
- नीहार
************************************
ख्वाबों का रंग कहीं आँखों में गहरे उतर गया,
मैं खुद ही अपने साए से कल रात डर गया।
अपनी तमन्ना खाक कर औरों को खुश किया,
कुछ इस तरह मैं अपनी जिंदगी दुश्वार कर गया।
चाहा हुआ देखो कभी भी नहीं होता है प्यार में,
यह जानते हुए भी मैं बस उनसे प्यार कर गया।
लगता है ख्वाबों में भी वो हमें अब देखते नहीं,
कहते हैं की यादों से उनका अब तो जी ही भर गया।
वो जो सुबह का भूला कहीं घूम रहा था डर बदर ,
फिर शाम को वो लौट कर खुद अपने ही घर गया।
सुनता हूँ मेरे नाम का एक जो शख्स रहता था यहाँ,
कल रात किसी वक़्त वो किसी सदमे से मर गया।
- नीहार
******************************************
आईने ने धुप से की अठखेलियाँ नईं,
एक किरण छिटक के फिर दूर हो गयी।
वो चांदनी जो पारे से ढलक रही थी कल,
न जाने आज क्यूँ वो फिर बर्फ हो गयी।
जिस रात ने जगकर हमें नीलाम कर दिया,
वो रात देखो खुद भी तो अब नीलाम हो गयी।
आँखें लड़ाने की तो आदत कभी नहीं थी हमें,
आँखें लडाई तो फिर बिचारी आँखें ही खो गयीं।
हरी हरी घास पर ओस की बूँदें तो देख दोस्त,
ये रात जैसे कोई शबनमी आंसू ही रो गयी।
पलकें उठी तो बस जैसे की सेहर हो गया,
पलकें झुकी तो फिर जैसे कोई रात हो गयी।
जो पी लिया उनकी मोहब्बत का मय मैंने,
उस दिन से जिंदगी बस मेरी मदहोश हो गयी।
-नीहार