सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

सभ्य समाज की विरूपता और आदमी का व्याघ्र मन

(वर्ष १९८८ में मैंने यह ऊपर वाला चित्र खींचा था अपनी डायरी के एक पन्ने पर.यह चित्र हमारे समाज की विरूपता एवं उस समाज में रहने वाले आदमी के भीतर के हिंसक व्यक्तित्व (जिसे मैंने व्याघ्र मन का नाम दिया है) को दर्शाती है।उसी दौरान मैंने कुछ कवितायेँ भी लिखी थी , उनमे से एक नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ। आश्चर्य की बात यह है की हमारे सभ्य समाज की विरूपता और उसमें रहने वाले हम सभी के भीतर का हिंसक मन आज भी वैसा ही है....कुछ भी नहीं बदला है और शायद बदलेगा भी नहीं।आज की व्यथा यही है की हम नारी को पूजिता नहीं, पतिता समझते हैं और पतित पावनी गंगा के स्त्रीत्व को मानने से इंकार करते हैं.धोखा हमारे पुरुषत्व का हिस्सा है और येही धोखा हम खुद से, परिवार से, समाज से, देश से सदियों से करते आये हैं.उम्मीद है आप को ये रचना पसंद आएगी ।)
भविष्य अजन्मा है -
भूत मिट चुका है और वर्त्तमान रेंग रहा है(अपने आस्था के आयाम में)।
अहल्यायें ठोकर दर ठोकर खा रही हैं,
सीतायें अपहृत हो रही हैं,
द्रोपदियों को भरी सभाओं में नंगा नचाया जा रहा है,
और कृष्ण की सुदर्शन चक्र धरी उँगलियाँ काटी जा रही हैं,
समय के प्रहरियों द्वारा।
राम की तरकश का हर बाण ,
समय के साथ उड़ जाता है निशाने से दूर ..... बहुत दूर।
लक्ष्मण अब सीताओं के लिए रेखाएं नहीं खींचते -
वरन -
खुद ही उन रेखाओं में कैद हो जाते हैं।
बलराम का हल कोई लेकर भाग गया है,
और, अर्जुन किसी कर्ण के हाथों मारे जा चुके हैं।
सभी वशिष्ठ और विश्वामित्र खो चुके हैं अपनी वाक्पटुता,
और परशुराम अपनी दाढ़ी के बाल चुनते हैं।
कुम्भकर्ण जगते हैं, विनाश करते हैं ,
और बिभीषण सुख की नींद महीनो सोते हैं।
हर तरफ सीतायें अपहृत हो रही हैं - द्रोपदियां नंगी हो रही हैं,
और हर तरफ मंदोदरी तथा शूर्पनाखायें अट्टहास करती हैं -।
हर ओर सुरसायें निगल जाती हैं हनुमानों को,
और हर बार कौरव ही रौरव कर महाभारत जीत जाते हैं।
चुक गया द्वापर त्रेता का वह पुण्य -
जब राम राम थे और कृष्ण कृष्ण थे ।
सत्य यही है , की यह कलियुग है और यहाँ कल्कि का राज है,
और इसलिए -
आज का वर्तमान रेंग रहा है -
भूत मर चुका है -
और भविष्य अजन्मा है.... ।
(नीहार, वर्ष १९८९)