रविवार, 7 फ़रवरी 2010

अथ चोर पुराण एवं अन्य कवितायेँ

अथ चोर पुराण
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चोर बना सिपाही घर का,
देख मेरा वाम अंग फड़का।
कहा चोर ने प्रथा यही है, राजा और रंक की यारों
जो चोरी में हो निष्णात, उसके गले पुष्पहार डारो,
औ' ईमां का गला घोंट कर,छह फुट नीचे ज़मीं के गाड़ो,
तभी देश की गाड़ी आगे बढ़ेगी, नहीं रहेगा कोई भी कड़का।
देख मेरा वाम अंग फड़का।।
फिर चोर ने आँख दबाया ,कुर्सी को थोडा खिसकाया,
अपने गिर्द घिरे चमचों को,भारी स्वर में पास बुलाया,
हिंसा की बातें बतलाई,और ख़ूनी दांव पेंच सिखलाया,
उनके अथक प्रयास से देखो, घर घर में एक युद्ध है भड़का।
देख मेरा वाम अंग फड़का॥
चोर के भाग से छीकें फूटे, ईमान के उखड़ गए हैं खूंटे ,
देश में बन्दर- बाँट मचा है,जिसकी मर्ज़ी जो चाहे लूटे,
सच का मुंह हो गया है काला, झूठ के मुंह से कालिख छूटे,
चौर्य शिक्षा के खुल गए हैं सेंटर,गाँधी अब बंद है चरखा,
देख मेरा वाम अंग फड़का॥
अनपढ़ हों पर चतुर प्रवीणा, कर चोरी जो ताने सीना,
लिख लोढा पढ़ पत्थर हों पर, चोरी पर जो भाषण दीना,
बेच बेच कर देश का टुकड़ा, अपना पद जो आपन कीना,
ऐसे लोग से ही देश सुशोभित, लड़की हो चाहे हो लड़का।
देख मेरा वाम अंग फड़का॥
चोर हेतु होत है आरक्षण, चोर करे घूस का भक्षण,
जो पूजे है चोर चालीसा, उसको लाभ मिलेगा तत्क्षण,
दफ्तर में लगा चोरोमीटर, नापे जो चोरों का लक्षण,
घर घर में अब चोर हैं बसते, छोटा हो या हो वह बड़का।
देख मेरा वाम अंग फड़का॥
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई,चोर चोर मौसेरे भाई,
मात्री - वंदना भूल भाल कर,'वन्दे चोरम' सबने गाई,
देश भक्ति की शपथ के बदले,'चौर्य शपथ' सबने है खाई,
ह्रदय देश के लिए नहीं पर, चोरी के लिए रोज़ है धड़का।
देख मेरा वाम अंग फड़का॥
-नीहार , जून १९८९।
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सुन भाई साधो
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सुन भाई साधो सुन भाई पीर, देश की हालत अति गंभीर।
चोर सभासद राजा डाकू, गर्दन पर फेरे जो चाक़ू,
चोरी कर बन गए अमीर, देश की हालत अति गंभीर।
खेलत हैं सब खून की होली,फेंके बम और मारे गोली,
पंजाब हो या हो कश्मीर,देश की हालत अति गंभीर।
दहेज़ का यहाँ खुला है गेट,जैसा लड़का वैसा ही रेट,
अग्नि समाधि लेती सब हीर, देश की हालत अति गंभीर।
लड़की होत विचित्र यहाँ प्राणी,घूरे जिसको मूरख ग्यानी,
होत हरण नित उनका चीड़, देश की हालत अति गंभीर।
दे डोनेशन औ' करी पढ़ाई, दिया घूस औ' नौकरी पायी,
अब खावत सरकारी खीर,देश की हालत अति गंभीर।
पाँव के नीचे सिकुड़ी धरती,खुली हवा भी नहीं है मिलती,
दूनी हो गयी आदम की भीड़,देश की हालत अति गंभीर।
कुर्सी हेतु होत है महाभारत, होवें पूरा जिस से स्वारथ,
बाप मरे है बेटा अधीर, देश की हालत अति गंभीर।
रजा ढोंगी, परजा ढोंगी, भक्त और भागवान भी ढोंगी,
ढोंगी हैं सब यहाँ फ़कीर, देश की हालत अति गंभीर।
बेच बाच कर देश को खाते,कुछ बचता तो घर ले जाते,
म्हारी आँख से बहत है नीर, देश की हालत अति गंभीर।
है हवा प्रदूषित नदी प्रदूषित,है पूरी की पूरी सदी प्रदूषित,
है प्रदूषित गंगा जमुना तीर, देश की हालत अति गंभीर।
सब भाई से इही दुहाई, इस देश को समझो अपनी माई,
और बांटो सब उसका पीर,देश की हालत अति गंभीर।
मन में लेन बस इतना ठान, सत्य आचरण औ' ईमान,
यही तुम्हारा हो तूणीर, देश की हालत अति गंभीर।
- नीहार , जून 1989
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भारत महा - महा भारत
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भारत महा महाभारत ,
जिनगी हुयी अकारथ।
चोर डाकू सब राजा होइंहें,
लाशन की खेती सब बोइहें,
नीति कुनीति अनीति के बल ,
पे साधे सब अपना स्वारथ।
भारत महा महाभारत॥
नहीं धर्म अधर्म की बात कछु,
नहीं कर्म अकर्म की बात कछु,
बस भाई भाई का चीर के सीना,
देखो पी के खून डकारत।
भारत महा महाभारत॥
चोर चोर मौसेरे भाई,
बाँट बूंट कर सबने खाई,
देश-द्रोह ही परम धर्म है,
है बाकी धरम अकारथ।
भारत महा महाभारत॥
सुनु सिय सत्य ये बात हमारी,
अग्नि जरी रोज़ यहाँ नारी,
दूल्हा माचिस लिए खड़ा है,
सास ससुर तेल हैं ढारत ।
भारत महा महाभारत॥
बायाँ दायाँ सब लड़ कर मरिहईं,
मध्यम मार्ग कहाँ सुख पैहईं,
दो पाटन के बीच में भैया,
साबुत कहाँ बचा भारत।
भारत महा महाभारत॥
-नीहार , जून 1989