सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

कुछ गजलें (भाग एक)

(ये ग़ज़लें मैंने वर्ष १९८९ से १९९१ के बीच अपने अकेलेपन से जूझते हुए लिखी थी.इन् गजलों की एक एक पंक्तियाँ मेरी भावनाओं का सच्चा प्रतिबिम्ब हैं...शब्द उन्हें हो सकता है बयां करने में असमर्थ हों ,पर उनसे उनकी परिभाषा पर असर नहीं पड़ता .उम्मीद है आपको पसंद आएगा)- नीहार
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दिल जिगर गुर्दा सभी बीमार हो गया,
कल का शिकारी आज खुद शिकार हो गया।
चाहा था कोई रंग दूँ अपनी जिंदगी को मैं,
एक ठोकर जो लगी तो सब बेकार हो गया।
खाने को मेरे पास अब तो कुछ नहीं बचा,
कहते हैं लोग इसलिए मैं गमख्वार हो गया।
कल तक उनके ख्यालों को ढ़ो रहा था मैं,
आज देखो फिर से मैं तो बेगार हो गया।
एक दर्द का सागर जो मेरे भीतर सो रहा था,
वक़्त की आंधी में जग कर वो ज्वार हो गया।
जिंदा हूँ , पर आदमी में मेरी गिनती नहीं रही,
सच कहूँ तो मुर्दों में मेरा अब शुमार हो गया।
वक़्त ने दिए हैं कुछ ऐसे दर्द भी मुझको की,
दिल जो एक सफीना था अब पतवार हो गया।
कल तलक जो दिल की दवा बेच रहा था मैं,
आज से खुद वही देखो खरीददार हो गया।
हमने बनाया था जो एक प्रेम का मंदिर,
वक़्त की तेज़ आँधी में वही मज़ार हो गया।
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खुश रहो तुम ये चाहत मेरी है सनम,
हम तो देखेंगे राह तेरी सातों जनम।
यूँ महकती रहो जैसे की चन्दन हो तुम,
फूलों के रंग में बस तुम हो जाओ गुम।
तुम को देखूं तो बस ऐसा महसूस हो,
की सूरज से छिटकी हुयी तुम हो किरण।
खुश रहो तुम ये चाहत मेरी है सनम॥
झरनों से तुम बस सुर मिलाती रहो,
मद भरे नयन से मय पिलाती रहो।
फूल ही फूल बिखरती रहे तेरी राह में,
मेरी किस्मत में रहे बस काँटों की चुभन।
खुश रहो तुम ये चाहत मेरी है सनम॥
फर्क इतना है तुझमें और मुझमें की देख,
कितना घबरा गया है आज शायर तेरा।
तुम तो हो धरती से ऊपर की कोई परी,
हम हैं जीवन की एक अनबुझी सी जलन।
खुश रहो तुम ये चाहत मेरी है सनम,
राह देखेंगे हम तो तेरी सातों जनम॥
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जड़ था जीवन , शेष नहींकुछ भी था उसके अंतर में
तुम ने आकर मचा दिया, एक हलचल सा उसके उर में।
आँखें थी की इंतज़ार में खुली अधखुली सी रह गयी,
औ' होठों ने काँप काँप कर तुम्हे पुकारा धीमे स्वर में।
जब थका हुआ मैं बाट जोह रहा था किसी सहारे की,
तब तुमने ही आकर थामा मेरे तन को अपने कर में।
जीवन था मरुस्थल मेरा, तुम वर्षा बूँद बन कर आयी,
और फिर आ कर अमृत रस डाला, जीवन के सूखे जड़ में।
तुम हो प्रतिफल मेरे कई जन्मों की कठिन तपस्या की,
प्राप्त हुयी हो तुम तो मुझको मेरे इश्वर के दिए हुए वर में।
आओ आकर साथ लड़ो तुम, जीवन का यह कठिन समर,
हाथों में देकर हाथ मेरे, तुम गाओ जीवन गीत मेरे स्वर में।
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गीत होठों पर नहीं अब आ रहे हैं,
फिर भी ये तय है की हम कुछ गा रहे हैं।
आप बिन सब सूना सूना लग रहा है,
एक अँधेरी राह पर खुद हम जा रहे हैं।
खाने को हमें कुछ भी अब चाहिए,
क्युंकी हम अब गम ही गम खा रहे हैं।
उनके इंतज़ार में हम 'दर' को तक रहे,
उनको पर न आना था, न वे आ रहे हैं।
अब क्या बताएं तुमको ई मेरे गम-ए- दिल,
हम तो सजा-ए-मुहब्बत यूँ ही पा रहे हैं।
-नीहार