मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

शुक्रवार, 12 फरवरी 2010

श्रिष्टि : कर्ता और कृति

यह स्केच मई १९८८ में मैंने बनाया था। इसमें मैंने ब्रम्हा ,विष्णु और महेश तीनो को कर्ता के रूप में प्रतिरूपित कर उसकी कृति को उसी में समाहित कर दर्शाने की कोशिश की है।

-निहार, मई १९८८.

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