मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

मंगलवार, 9 फरवरी 2010

हरी आँख का समंदर

(वर्ष १९८८,मई की तपती धूप और उनकी याद..बस खींच दी कागज पे चाँद लकीरें और लिख दी दिल की बात यूँ एक कविता के रूप में जो आपके लिए नीचे प्रस्तुत है।)
सपनो की चादर ओढ़ जब भी सोता हूँ -
तुम्हारे बदन की गर्मी मुझे नहलाती है,
दिन भर की थकान हवा में गुम हो जाती है ,
बाल उड़ कर चेहरे से अठखेलियाँ करते हैं ,
आँख के आंसू वाष्प बन तिरोहित हो जाते हैं,
कई दिनों की गुम हंसी वापिस लौट आती है।
पर, मेरे हाथ ज्यूँही तुम्हे पकड़ने को होते हैं ,
आँखें खुल जाती हैं और सब कुछ शांत हो जाता है,
दाढ़ी की चुभन खुद ही हाथों में काँटों सी फंसती है,
आँखें भीतर तक शर्म-ओ-हया के गर्त में धंसती है,
वो जो सपनो का दौर था - ठाठें मारता है मेरे अन्दर,
सूख जाता है बस यूँ ही मेरे मन का वो हरा समंदर,
न कुछ बाहर बचता है और न ही कुछ बचता है अन्दर।
सिर्फ और सिर्फ एक बे आवाज़ खामुशी होती है,
सिर्फ और सिर्फ एक पसरा हुआ सन्नाटा होता है,
सिर्फ और सिर्फ मेरा क्रंदन कहीं चुपके से दस्तक देता है....
मुझे तुम्हारी आँखों का हरा समंदर बुलाता है...
- नीहार, मई १९८८

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