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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

रविवार, 21 फरवरी 2010

मेरी आफरीन - तेरे ही नाम मेरी सुबह औ' मेरी शाम

तेरी आँखों के समंदर में डूब जाते हैं,
इस तरह हम खुद को तुझ में पाते हैं।
खुदा को देखा नहीं है कभी हमने पर,
तुम में ही हम खुदा की झलक पाते हैं।
तुम ही मेरी सुबह हो शाम भी तुम हो,
तुम्हारी ही चांदनी में हम रातों को नहाते हैं।
गीत लिखते हैं तो बस तेरी ही खातिर जानम,
तेरे लिए ही उन गीतों को हम गुनगुनाते हैं।
चलो फिर तुम्हारी जुल्फों में हम खुशबु ढूँढें,
चलो फिर तुम्हारे लबों पे हंसी हम ले आते हैं।
तुम जिंदगी हो मेरी , तुम ही चाहत हो मेरी,
राहत-ए-जिन्दगी भी तुझसे ही हम तो पाते हैं।

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मेरी आफरीन, तेरे ही नाम मेरी सुबह और मेरी शाम,
तू ही है मेरी मंजिल और बस तू ही है मेरा मुकाम।
खुले जो तेरी आँख तो मेरी सुबह रोज़ आती है,
तेरी जुल्फों से गुज़र कर हवा मुझ तक आती है,
तेरी ही पलकों पर ज्यूँ उतर आती है मेरी हर शाम,
तू ही है मेरी मंजिल और बस तू है है मेरा मुकाम।
तू चले तो यूँ लगे की जैसे जल उट्ठे यादों के दिए,
तेरी आँखों में डूब कर हम बहक उट्ठे हैं बिन पिए,
तेरी धड़कने दे मेरी जिंदगी को जीने का नया पैगाम,
तू ही है मेरी मंजिल और बस तू ही है मेरा मुकाम।

-नीहार

1 टिप्पणियाँ:

  1. तेरी आँखों के समंदर में डूब जाते हैं,
    इस तरह हम खुद को तुझ में पाते हैं।nice
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं