शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

प्रश्न और उत्तर

यूँ सपने पकड़ना बुरी बात नहीं - पर,

असफल होने पर रोना या दुखी होना बुरी बात है।

मैंने बचपन से अपने तसव्वुर में कई सपने पाल रक्खे थे...

कुछ रंगीन... कुछ सफ़ेद... कुछ गीले...कुछ सूखे...

जवानी का सूरज चढ़ता गया - सपनो की बर्फ गलती गयी।

पर मुझे न तकलीफ होना था... न हुआ।

मुझे लगा ही नहीं की दुक्खों ने मुझे छुआ।

मुझे सदा ये लगता रहा की दुःख मुझे माँज रहे हैं,

या - फिर मैं ही दुक्खों को माँज रहा हूँ।

पर, शायद मैं यह नहीं जान पाया

की -

मांजने और मंज्वाने की इस क्रिया प्रक्रिया में -

कहीं न कहीं मैं -

भीतर से दरक रहा था - टूट रहा था।

मेरा संग खुद से ही छूट रहा था।

और, अचानक जब दर्द की एक लहर - मुझे सर से पाँव तक चीर गयी

तो लगा -

कि इन सबसे मुक्ति पाने की कगार पर हूँ -

मुक्ति?

और किस से ?

प्रश्न बहुत सारे हो सकते हैं - और उत्तर भी।

उत्तर मेरे प्रश्नों को बहरा कर सकते हैं- या,

मेरे प्रश्न - उत्तरों को नंगा कर सकते हैं।

पर, सच तो यही है - कि,

चाहे प्रश्न कि जीत हो या उत्तर की ,

दरकेगा - कसकेगा - रिसेगा ,

मेरा ही कोई कोना - मेरे ही अन्तः का कोई एक भाग।

और, इसलिए अपने को हार जीत की सीमा से ,

परे मैं रखता हूँ और रखना चाहता हूँ।

और ,

इस कोशिश में -

कुछ न कुछ - कहीं न कहीं से दरकता हूँ।

टूटता हूँ - छूटता हूँ - खुद ही खुद को लूटता हूँ।

रविवार, 22 अगस्त 2010

कुछ उदगार

रिश्तों का संभवतया कोई रंग नहीं होता और रिश्ते न ही रूपवान होते हैं। रिश्ते तो बस रिश्ते हैं - चाहे जैसे भी हों। उनमे रूप और रंग ढूँढने की काबिलिअत हम में कहाँ है ? और अगर है भी तो हम उसे ढूंढ कर करेंगे भी क्या?
मुझे तो लगता है की व्यक्ति और व्यक्ति - परक सोचों से हर व्यक्ति को - या व्यक्ति विशेष को मतभेद होना स्वाभाविक है। तो क्या मतभेदों की वजह से या उनके कारण रिश्तों का अस्तित्व खत्म हो जाए। कभी नहीं - रिश्ते जितने मुलायम होते हैं - रिश्तों की नींव उस से भी ज्यादा मजबूत होनी चाहिए।
- पर पता नहीं क्यूँ - सारे प्रश्न अधूरे होते हैं - उत्तर भी होते हैं - पर अधूरे ही। - रिश्ते भी अधूरे ही रह जाते हैं शायद - पूर्णता की हद किसने जानी है?
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प्रश्न और उत्तर ? समस्या और समाधान ? - बहुत बडी उलझनें हैं। अस्तित्वहीनता के बोझ से दब जाता हूँ - डर जाता हूँ और फिर उस डर से उबरने की कोशिश में लड़खड़ा भी जाता हूँ। कुछ नहीं सूझता - मन भटकता रहता है , जंगल आकाश वन .... भागता रहता है मीलों नंगे पाँव ,रेत - पानी - कंकडों के ऊपर - नंगे पाँव - लहूलुहान पाँव से भागता मन थक सा जाता है - दूर कहीं शायद कोई बोलता है - अभी तो शुरुआत है - और मन की आँखें भर आती हैं - मन रोता है... शांति खोता है.... सो जाना चाहता है थक कर - आराम से - वो नींद जहाँ जगने की नौबत ही न आये...
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कभी कभी मन अजीब से दहशतों की कैद हो जाता है। अगर मैं जो तेरा कुछ भी नहीं- तो ......!!!!पूरा अस्तित्व हवा हो जाता है - जिस्म में किरचें खराश सी उग आती हैं...जीस्त को ये एहसास छेद डालते हैं। ..... कितना बेबुनियादी है ये एहसास - पर बेबुनियादी क्यूँ?.....जिंदगी के फैसले आप से आप नहीं होते - उनकी धाराओं को समयानुसार मोड़ने की ताकत हमारे बाजुओं में होनी चाहिए - पर 'गर बाजू ही न हों? या हों भी तो मजबूत न हों...या मजबूत हों तो टूट गए हों....तो ये सारे डर एक साथ मिलकर मेरी मानसिकता पर सर्प का दंश करते हैं ...... कहाँ हो त्रिलोचन? क्यूँ नहीं पी लेते सारा विष मेरे मानस का और कर देते मुझे विषमुक्त? आ जाओ त्रिलोचन और इस नागदंश से मुझे मुक्त तो करो।
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कभी कभी मुझे ऐसा लगता है की मैं एक ऐसे अंधे मोड़ पर खड़ा हूँ , जहाँ सिवाय मौत के और कोई रास्ता नहीं खुद के बचाव का.....अकेलापन ....ठंडी चेतना को जड़ बनता है,मन को ताप दे तन को साध जाता है - यही अकेलापन है जो मुझे सर से पाँव तक या पाँव से सर तक , निःशब्द काटता है....धीरे धीरे ....जैसे सूखी लकड़ी को टुकड़ों में बांटती आरा मशीन।
यह अकेलापन का जो अभिशाप है- वह मेरे लिए ही है...सर्वथा मेरे लिए ....जंगल में रहूँ या भीड़ में ...अकेला ही रहना होता है। नियति ही यही है....इसे झेलना ही है....किसी न किसी तरह।
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शून्य का विकल्प क्या हो?ओर शून्य का प्रयोजन क्या है? क्या है आखिर इस शून्य का चरित्र?और क्या है इसका प्रारब्ध?.....सच पूछो तो इन अनुत्तरित प्रश्नों के दायरे के भीतर रह कर भी मैं - दायरे से बाहर हूँ - इसलिए नहीं की इस शून्यता को मैं नहीं झेलता, वरन इसकी तो मुझे आदत सी हो गयी है।
सोचता हूँ की जिस दिन धरती काँप उठेगी उसी क्षण हम सबको अपना सर लेकर भागना होगा, उस आकाश के नीचे, जो गिर चुका हो।
मैं तो हर उस जगह अपने आप को पाता हूँ जहाँ शून्यता का एहसास गाता है राग गान्धार और भीड़ की भीड़ मांदर की थाप पर राग भैरव की अहीरी तान सुनती है - ( नाराज तो नहीं हो कृष्ण?)...मन कैसे शांत हो ... मन की पीड़ा क्या वृथा है? ओर अगर है, तो फिर उसकी शान्ति का उपाय क्या है?
मृत्यु!!!!! शायद यही उत्तर हो....शायद.....
- नीहार

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सोमवार, 16 अगस्त 2010

बिखर जाता हूँ जब टूट के पत्तों पे मैं नीहार.......

कुछ बातें तुम में हैं ऐसी जो मुझको खींचा करती हैं,
तुम्हारी खिली सी हसीं हर पल मेरी पीडाओं को हरती हैं।
मैं सागर की लहरों सा हर पल बस साहिल से टकराता हूँ,
मैं चीड वनों की मदमाती सी झुंडों में बस गुम हो जाता हूँ,
मैं स्वप्न लोक में विचरण करता हूँ तुमको अपने संग लिए,
तेरी यादें फूलों सी मुझ पर फिर बिखर बिखर कर झरती हैं।
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मुक्त हो आकाश में मन मेरा कर रहा विचरण प्रिये,
सांझ की बेला में मैं करता नित पी का सुमिरन प्रिये।
चक्र है बस समय का जो चल रहा देखो पल पल प्रिये,
सांस तेरी घुल गयी है मुझमें जैसे घुली धड़कन प्रिये।
तुम खिली हुयी चांदनी बन छिटकी हुयी हो इस समय,
मैं हुआ विस्तृत तुझको समेटे जैसे हो नील गगन प्रिये।
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बिखर जाता हूँ जब टूट के पत्तों पे मैं 'नीहार' ,
कुछ लोग मोती समझ उठा लेते हैं मुझको।
लेते ही हाथों में जो हो जाता हूँ मैं बस पानी ,
फिर धीरे से हथेली से गिरा देते हैं मुझको।
मैं बादल बन भटकता रहा मन के गगन में,
कोई भी हवा अपने संग उड़ा लेती है मुझको।
मैं नदी की पवित्र धार सा बहता रहा अविरल,
वक़्त जहाँ चाहे वहां से मुड़ा देती है मुझको।
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-नीहार (जमशेदपुर , अगस्त १२)

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

चेहरे

" चेहरे ", यह चित्र मैंने सन १९९८ में अपने जमशेदपुर प्रवास के दौरान बनाया था।
- नीहार

बुधवार, 28 जुलाई 2010

स्वप्न फूल सा झर झर जाते,झरनों सा वो कल कल गाते

जब आंसू कतरा दर कतरा टपकेगा,
तब कोई करवट दर करवट बदलेगा।
आंसू के कतरे दिखे न दिखे उनको पर ,
उनका दिल दर्द की हद से गुजरेगा।
जब कोयल को पिया की याद सताएगी,
तब वह छुप छुप विरह के गीत गाएगी।
जब चाँद बादल संग आँख मिचौली खेलेगा ,
उस पल प्यासा मन सावन को तरसेगा ।
दरवाज़े पे हवा सुरीली सीटी जब बजाएगी,
उनके आने की आहट मेरे दर पे आएगी।
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एक रौशनी का कतरा मेरे भीतर तक उतर गया,
जब से उस माहताब ने मेरे दिल में घर किया।
मेरी प्यास बुझती ही नहीं थी किसी भी पानी से,
बुझ गयी है प्यास जो उनकी आँखों से मैंने पिया।
सुना है आज कल खुदा भी नाराज़ रहता है मुझसे ,
मैंने सुबह सुबह जो उठ के उनका नाम ले लिया।
चन्दन चन्दन भीनी भीनी खुशबु खुशबु बन उस ने,
मेरे जीवन को सात रंग और सात सुरों से सजा दिया।
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पत्तियों की सरसराहट जब भी मुझे सुनायी देती है,
ऐसा लगता है हवाएं तेरा नाम फुसफुसा के लेती है।
जब भी आस पास सुनता हूँ तेरी आवाज़ की खनक,
मुझे दूर कहीं मंदिर में बजती मधुर घंटी सुनाई देती है।
रात भर सेहरा पे तुम ऊँगली से लिखते रहे नाम मेरा,
वक़्त की ज़ालिम थपेरें उसे सुबह को मिटाए देती है ।
जब भी मैं महसूसता हूँ बड़ी शिद्दत से खुद में तुमको,
मुझे मौत के साए में भी जैसे एक जिंदगी दिखाई देती है।
बस करीब आके मुझे छू लो तुम ई मेरी जान - ए - अदा ,
तेरे दिल में मेरी धड़कन बस चाहत बन के पनाह लेती है।
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स्वप्न फूल सा झर झर जाते, झरनों सा वो कल कल गाते,
छल छल आँखें बहती अविरल , पल पल पी की याद दिलाते।
खन खन मन संगीत खनकाता,झम झम सावन सा बरसाता,
गुन गुन भँवरे गुन्जन करते, फूलों का सब मकरन्द चुराते ।
स्वप्न फूल से झर झर जाते, झरनों सा वो कल कल गाते।।
खिल खिल जाता चाँद सा चेहरा, छंट सा जाता गम का कोहरा,
मन मयूर सा नच नच जाए, पिया का दर्शन जब वो हैं पाते।
स्वप्न फूल सा झर झर जाते, झरनों सा वो कल कल गाते।
-नीहार

रविवार, 18 जुलाई 2010

मन बैरी सावन भया

मन बैरी सावन भया , तन हुआ दोपहरी धूप,
सांस भाई लोबान सरीखी, जीवन भया अनूप।
मन गूंजे संगीत सदा , तन भया नाचता मोर,
धड़कन में है प्रिया बसी, जो करती रहती शोर।
पलक उठे तो सुबह सोना बन कर खिल जाती,
पलक झुके तो आ जाती है बिरहनी रात कठोर।
उन बिन जीवन मरू हुआ,ज्यूँ गरम रेत की ढेर,
तन बियाबान जंगल बना,मन भया आदमखोर।
मन लिपटा उनसे इस तरह ,जैसे चन्दन से हो सर्प ,
हर घडी सोचे उनको ही ,उन बिन कहीं नहीं है ठौर।
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अधर धरत हैं अधर पे,और अमृत रस हैं पीत,
भ्रमर सलोना श्याम करे ,राधा पुष्प से प्रीत।
मन जब से मंदिर हुआ, मंत्र हुआ सब भाव,
जो राधा राधा रट लिया,भर जाए मन के घाव।
मन तडपे राधा दरस को,तन होय दहकती आग,
श्याम रचाते रास जब, मन खेले रंग संग फाग।
तन जैसे ब्रिन्दावन हुआ, मन जैसे ब्रज की धूल,
सोच हुआ यमुना तट पे, खिला कदम्ब का फूल।
मन के अन्दर बज रहा, ज्यूँ घड़ी घंट घड़ियाल,
इन्द्रियां हुयी राधा समान , देती बंशी धुन पर ताल।
सांस हुयी है बावरी, कभी इत और कभी उत जाए,
श्याम बंशी की धुन पर ज्यूँ प्यारी राधा बहकी जाए।
-नीहार

बुधवार, 14 जुलाई 2010

कुछ बात करो मुझसे तुम.....एवं कुछ अन्य रचनाएं


कुछ बात करो मुझसे तुम,मेरा मन रूखा रूखा है,

प्रेम पयोधि पीकर भी, देखो लगता भूखा भूखा है।

झर झर झर निर्झर बहता,कानो में मेरे है कहता ,

तुम बिन मरू का सा है जीवन,सब सूखा सूखा है।

प्रेम पयोधि पीकर भी , देखो लगता भूखा भूखा है।

फूल फूल पत्ते पत्ते ,कानो में कहते फ़ुसक फ़ुसक,

मन के अन्दर ज्वाल सरीखा , जैसे फूका फूका है।

प्रेम पयोधि पीकर भी, देखो लगता भूखा भूखा है।

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तन्हाई को पीकर मैं खिलता रहता हूँ एक धूप सरीखा ,

मेरे भीतर का तम किसको दिखता है यह वो ही जाने।

पीर परायी मेरे आँख से बहती गंगा जमुना की धारा बन,

मेरे भीतर एक आग का दरिया बहता रहता है वो ही जाने।

चन्दन चन्दन खुशबु बन कर,बादल बादल उड़ता हूँ मैं,

तपती धरती का दर्द समेटे, मैं क्यूँ उड़ता हूँ यह वो ही जाने।

उसको पाकर उसमे रंग कर मैं पारिजात सा खिल जाता हूँ,

मैं खुद को उसमे क्यूँ खो देता हूँ ,यह मै ना जानू वो ही जाने।

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मैं सन्नाटा बुनता हूँ...

जो भी उल्टा सीधा मन में आता,उसको हर घडी मैं धुनता हूँ।

मैं सन्नाटा बुनता हूँ...

जब भी तुमसे मैं मिलता हूँ , अधरों पे बंशी सा मैं बजता हूँ ,

तेरी गोदी में सर रख कर मैं, सागर की बस ठाठें ही सुनता हूँ।

मैं सन्नाटा बुनता हूँ...

मुझको जब भी तेरे ख्वाब बुलाते हैं , आकर मेरी तन्हाई में,

मैं चुप चुप से तेरी आँखों में , बस डूबता हूँ और उतराता हूँ।

मैं सन्नाटा बुनता हूँ...

मैं कहता रहता हूँ तुमसे ही अपने दिल की सारी बातें अक्सर ,

तुम जो कुछ भी कह नहीं पाते, मैं उनको भी अक्सर सुनता हूँ।

मैं सन्नाटा बुनता हूँ...

--नीहार