शनिवार, 13 मार्च 2010

जब दर्द पल रहा सीने में

जब दर्द पल रहा सीने में,
तब मज़ा आ रहा जीने में ।
खून पानी में तब्दील हुआ ,
बदन गला और बहा पसीने में।
दिल टुकड़े हो कर बिखर गया,
हम जुट गए उसको सीने में।
जब दर्द का दरिया उफन गया ,
तब छेद हो गया है सफीने में।
आंसू को जब से मय है समझा,
मज़ा आ रहा है उसे पीने में।
धडकनों की गर जुबान होती तो,
कहाँ दफन होता दर्द सीने में।
-नीहार
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चोट दिल पे लगी कुछ तो ऐसी,
की जान मेरी निकल सी गयी है।
आईना देख कर यूँ लगा मुझको,
मेरी खुद की सूरत बदल सी गयी।
एक तूफ़ान सा गुज़रा है मुझ पर,
जिसके सदमे से घबडा गया हूँ,
डूबती हुयी सांझ सी सांस मेरी ,
पलकों पे आ के ठहर सी गयी है।
मैं वो सागर हूँ जिसकी सीमा,
बन्धनों में बंधी हुयी सी नहीं है,
सिर्फ लहरें ही लहरें हैं उसमे,
जिनका कोई भी किनारा नहीं है।
वक़्त ने इतना सिखला दिया है,
की छाछ भी फूंक कर पी रहा हूँ,
प्यार की जो एक ईमारत थी मेरी,
भरभरा कर ज़मीन पे जा गिरी है।
मैं तो शायर हूँ बदनाम जिससे,
लोग मिलने से घबराये हुए हैं,
सच कहूँ अब तो लगता है जैसे,
इंसानियत ख़त्म सी हो गयी है।
- नीहार

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

यह जीवन है एक भार प्रिये एवं अन्य कवितायेँ


यह जीवन है एक भार प्रिये।
थी तृषा जगी मन में मेरे,औ' प्यास कहाँ बुझ पाती है,
जल की चाहत में भटक रहा,मन पाता है अंगार प्रिये।
यह जीवन है एक भार प्रिये।
जो दूर कहकशां सा दिखा, तो मन मयूर सा नाच उठा,
पर पास जो जाकर देखा तो,पाया मरू का सा सार प्रिये।
यह जीवन है एक भार प्रिये।
सोचा था एक दिन आएगा, मेरे जीवन में भी बसंत,
समय बीतता ही जाता है, पर आया नहीं बहार प्रिये।
यह जीवन है एक भार प्रिये।
मेरे मन के अंधे कोने में,जो ज्योति सदा से जलती थी,
एक तनिक हवा के झोंके ने, मन किया मेरा अंधार प्रिये।
यह जीवन है एक भार प्रिये।
मैं स्वाति बूँद की आशा में, चातक बन बैठा हूँ अब तक,
टपका कर अपना स्नेह बूँद,कर लो मुझको स्वीकार प्रिये।
यह जीवन है एक भार प्रिये।
- नीहार
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मन व्यथित बहुत अब होता है।
जब सन्नाटों की सीटी गूंजे,तब मन ही मन आँखें मूंदे,
यह दिल बेचारा जी भर रोता है।
मन व्यथित बहुत अब होता है।
जब कोयल ताने तान सखी,तब झूम झूम मन प्राण सखी,
अपना सुध बुध सब खोता है।
मन व्यथित बहुत अब होता है।
मेरी आँखों के बंद कटोरों में,मेरे तन मन के पोरों पोरों में,
एक दर्द का सागर अब सोता है।
मन व्यथित बहुत अब होता है।
तुम बिन सब कुछ है उदास, बुझ नहीं रही अनबुझी प्यास,
प्यासा मन हरदम अब रोता है।
मन व्यथित बहुत अब होता है।
- नीहार
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मैं दर्द के सागर में जीता।
मेरी वाणी जो मुखर कभी थी,गूंगी हो दम तोड़ रही है,
मेरे दिल की जीवित धड़कन,मेरा ही संग छोड़ रही है,
बाहर भीतर हर तरह से मैं हो चुका हूँ रीता ।
मैं दर्द के सागर में जीता।
मैंने जितने भी सपने देखे, सब चूर चूर हो बिखर गए,
तेज़ हवा के झोंको में, कुछ इधर गए कुछ उधर गए,
उन सपनो को खोकर मैं तो हो गया हूँ रीता।
मैं दर्द के सागर में जीता।
वाणी से मूक,आँख से अंधा और हाथ पाँव से लूला हूँ,
अल्लसुबह जो भटक गया तो, देर शाम तक भूला हूँ,
दर्द ही भोजन है मेरा, और दर्द ही मैं हूँ पीता।
मैं दर्द के सागर में जीता।
-नीहार
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रविवार, 7 मार्च 2010

चुप चुप से हो गुमसुम से हो

चुप चुप से हो गुमसुम से हो,मुझसे बातें क्यूँ नहीं करते हो,
इतना दो बता दो मुझको क्या तुम आज भी मुझपर मरते हो।
गर्म हवा सी चलती है और मौसम पतझड़पतझड़ सा होता है,
गुस्से में जब तुम होते हो और फिर लम्बी लम्बी साँसे भरते हो।
प्यार से जब बातें करते हो तो मन में जलतरंग सा बजता है,
और तुम हिम की शिला से निकली गंगा के जल सा झरते हो।
थक सा जाता हूँ भटक भटक कर तेरी खोज में जब भी मैं,
तुम चुप कर आते हो कहीं से और फिर मेरे क्लेश को हरते हो।
मैं नहीं डरता यह कहने से की तुम मेरी हो हर जनम जनम ,
तुम क्यूँ दुनिया को यह बात कहने से फिर हरदम डरते हो।
-नीहार

आँखों में काजल न यूँ आप लगाया कीजिये

आँखों में काजल न यूँ आप लगाया कीजिये,
यूँ रात की तीरगी ऐसे न बढ़ाया कीजिये।
आपके छूते ही पत्थर भी हो जाता है आदमी ,
मेरे दुश्मनों की फौज यूँ न बढाया कीजिये।
जिंदगी की राह में सिर्फ कांटे ही कांटे हैं बिछे,
पांव नाज़ुक हैं आपके, उन्हें न उतारा कीजिये।
मैं नहीं पीता हूँ वो सब, जो यहाँ पीते हैं सभी ,
अपनी नज़रों से मुझे रोज़ पिलाया कीजिये।
मैं हूँ बस ठहरा हुआ तालाब के पानी की तरह,
एक कंकड़ फेंक कर मुझको हिलाया कीजिये।
नींद भी आती नहीं कमबख्त मुझको आज कल,
अपनी जुल्फों के तले मुझको सुलाया कीजिये।
मुझको नहीं भाता है कुछ इस संसार में आप बिन,
आप ही आप मुझको हर सू नज़र आया कीजिये।
आकाश है सूना हुआ और तारे गन सब हैं छुप गए ,
अपने रुखसार से जुल्फें हटा चाँद दिखलाया कीजिये।
गीत मैं लिखता रहूँ जीवन भर सिर्फ आपकी ही खातिर ,
आप उनको गा के जीवन में मधुमास लाया कीजिये।
-नीहार

शनिवार, 6 मार्च 2010

मुबारक हो तुमको शादी की २२वीं सालगिरह

आज विवाह की २२वीं सालगिरह पर यह कविता है तुम्हें समर्पित,
जिसने अपना यह जीवन मुझको कर दिया है पूर्ण रूप से अर्पित,
मेरी हर सुख सुविधा का ख्याल रक्खा,कष्ट हरा सब मेरा जिसने,
जिसके बिन मेरे जीवन का हर पल लगता ऐसे बीते जैसे हो शापित।
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बाईस वर्ष हुए शादी को, लगता है जैसे कल की बात ,
पत्नी जीवन में लेकर आयी, नए सूरज का सुप्रभात।
सुख दुःख की साथी है मेरी, मुझको आईना दिखलाती है,
गिरता हूँ जब ठोकर खाके , दौड़ के थामती वो मेरा हाथ।
मेरी राह का हर काँटा चुनकर, करती आसान मेरा जीवन,
अपना निज सुख त्याग के,वो हरती मेरे जीवन का संताप।
वो मेरी अर्धांगिनी है और मेरे जीवन को करती पूर्णता प्रदान,
उसके रूप में ईश्वर ने दिया मुझको एक अप्रतिम सा सौगात।
उसको माँगू मैं अपनी दुआ में ईश्वर से नित दिन जोड़े हाथ,
जब तक सांस रहे जीवन में, रहे यूँ ही उसका और मेरा साथ।
-नीहार

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

मुझको मेरी तन्हाईयाँ अक्सर बुलाती हैं

मुझको मेरी तन्हाईयाँ अक्सर बुलाती हैं,

और फिर मुझे तेरी यादों से नहलाती हैं।

वो जो खुशबु का झोंका गुज़रा मेरे पास से ,

तेरी जुल्फों की कैद से छूटी हवा कहलाती हैं।

आँखें खुली रहती हैं तो दिखता नहीं कुछ भी ,

बंद आँखें ही तो मुझे सबकुछ अब दिखलाती हैं।

चीड़ों की चोटी पर बरसे चन्दन जैसी जो चांदनी,

एक आशिक के चेहरे पर माशूक का नूर कहलाती हैं।

जो भी जख्म मिले हैं मुझको तेरे सजदे में जानम,

तुझको छूकर आती हवा उन जख्मों को सहलाती हैं।

भटक रहा हूँ नील गगन में आवारा बादल सा मैं,

तेरी यादें टकरा कर उनको सावन सा बरसाती हैं।

-नीहार

गुरुवार, 4 मार्च 2010

है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद

है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद,मन के भीतर मच गया है एक द्वन्द ।

वो मेरा जो कुछ भी नहीं तो ऐ दोस्त, याद उसकी आ आ के क्यूँ करती है तंग।

जब भी मैं खींचता हूँ लकीर कागज़ पे,वो हो जाती है पूर्णतया उसमें जीवंत।

लिखता हूँ उसको ख़त जब अपने हाल का,पढ़ के वो कहता है ये सब है मनगढ़ंत।

मेरे लिए तो वो है एक मंदिर प्रेम का,उसके लिए बन बैठा हूँ मैं एक महंत।

पलकें उठायीं तो सुबह ले आती है वो,पलकें झुका ली तो रात उतर आती तुरंत।

उनका चेहरा खिलता हुआ माहताब है,उनकी खुशबु में तर बतर है दिग-दिगंत।

उनसे ही जीवन बना है मधुमास मेरा , उनसे ही पतझड़ में भी छाया है बसंत।

- नीहार