रविवार, 7 मार्च 2010

आँखों में काजल न यूँ आप लगाया कीजिये

आँखों में काजल न यूँ आप लगाया कीजिये,
यूँ रात की तीरगी ऐसे न बढ़ाया कीजिये।
आपके छूते ही पत्थर भी हो जाता है आदमी ,
मेरे दुश्मनों की फौज यूँ न बढाया कीजिये।
जिंदगी की राह में सिर्फ कांटे ही कांटे हैं बिछे,
पांव नाज़ुक हैं आपके, उन्हें न उतारा कीजिये।
मैं नहीं पीता हूँ वो सब, जो यहाँ पीते हैं सभी ,
अपनी नज़रों से मुझे रोज़ पिलाया कीजिये।
मैं हूँ बस ठहरा हुआ तालाब के पानी की तरह,
एक कंकड़ फेंक कर मुझको हिलाया कीजिये।
नींद भी आती नहीं कमबख्त मुझको आज कल,
अपनी जुल्फों के तले मुझको सुलाया कीजिये।
मुझको नहीं भाता है कुछ इस संसार में आप बिन,
आप ही आप मुझको हर सू नज़र आया कीजिये।
आकाश है सूना हुआ और तारे गन सब हैं छुप गए ,
अपने रुखसार से जुल्फें हटा चाँद दिखलाया कीजिये।
गीत मैं लिखता रहूँ जीवन भर सिर्फ आपकी ही खातिर ,
आप उनको गा के जीवन में मधुमास लाया कीजिये।
-नीहार

शनिवार, 6 मार्च 2010

मुबारक हो तुमको शादी की २२वीं सालगिरह

आज विवाह की २२वीं सालगिरह पर यह कविता है तुम्हें समर्पित,
जिसने अपना यह जीवन मुझको कर दिया है पूर्ण रूप से अर्पित,
मेरी हर सुख सुविधा का ख्याल रक्खा,कष्ट हरा सब मेरा जिसने,
जिसके बिन मेरे जीवन का हर पल लगता ऐसे बीते जैसे हो शापित।
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बाईस वर्ष हुए शादी को, लगता है जैसे कल की बात ,
पत्नी जीवन में लेकर आयी, नए सूरज का सुप्रभात।
सुख दुःख की साथी है मेरी, मुझको आईना दिखलाती है,
गिरता हूँ जब ठोकर खाके , दौड़ के थामती वो मेरा हाथ।
मेरी राह का हर काँटा चुनकर, करती आसान मेरा जीवन,
अपना निज सुख त्याग के,वो हरती मेरे जीवन का संताप।
वो मेरी अर्धांगिनी है और मेरे जीवन को करती पूर्णता प्रदान,
उसके रूप में ईश्वर ने दिया मुझको एक अप्रतिम सा सौगात।
उसको माँगू मैं अपनी दुआ में ईश्वर से नित दिन जोड़े हाथ,
जब तक सांस रहे जीवन में, रहे यूँ ही उसका और मेरा साथ।
-नीहार

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

मुझको मेरी तन्हाईयाँ अक्सर बुलाती हैं

मुझको मेरी तन्हाईयाँ अक्सर बुलाती हैं,

और फिर मुझे तेरी यादों से नहलाती हैं।

वो जो खुशबु का झोंका गुज़रा मेरे पास से ,

तेरी जुल्फों की कैद से छूटी हवा कहलाती हैं।

आँखें खुली रहती हैं तो दिखता नहीं कुछ भी ,

बंद आँखें ही तो मुझे सबकुछ अब दिखलाती हैं।

चीड़ों की चोटी पर बरसे चन्दन जैसी जो चांदनी,

एक आशिक के चेहरे पर माशूक का नूर कहलाती हैं।

जो भी जख्म मिले हैं मुझको तेरे सजदे में जानम,

तुझको छूकर आती हवा उन जख्मों को सहलाती हैं।

भटक रहा हूँ नील गगन में आवारा बादल सा मैं,

तेरी यादें टकरा कर उनको सावन सा बरसाती हैं।

-नीहार

गुरुवार, 4 मार्च 2010

है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद

है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद,मन के भीतर मच गया है एक द्वन्द ।

वो मेरा जो कुछ भी नहीं तो ऐ दोस्त, याद उसकी आ आ के क्यूँ करती है तंग।

जब भी मैं खींचता हूँ लकीर कागज़ पे,वो हो जाती है पूर्णतया उसमें जीवंत।

लिखता हूँ उसको ख़त जब अपने हाल का,पढ़ के वो कहता है ये सब है मनगढ़ंत।

मेरे लिए तो वो है एक मंदिर प्रेम का,उसके लिए बन बैठा हूँ मैं एक महंत।

पलकें उठायीं तो सुबह ले आती है वो,पलकें झुका ली तो रात उतर आती तुरंत।

उनका चेहरा खिलता हुआ माहताब है,उनकी खुशबु में तर बतर है दिग-दिगंत।

उनसे ही जीवन बना है मधुमास मेरा , उनसे ही पतझड़ में भी छाया है बसंत।

- नीहार

बुधवार, 3 मार्च 2010

मुमकिन हो तो मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइए

मुमकिन हो तो सिर्फ मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइये,

अपनी पलकों का वरक उठाइये और मेरी सुबह लाइये।

मैं समंदर में भटक रहा हूँ एक किश्ती की तरह ऐ दोस्त,

मुझको मौजों से बचा कर आप किनारे तक तो ले आइये।

तरस गया है ज़माना देखने को एक चौदहवीं का चाँद,

उनकी खातिर ही सही आप अपने रुख से पर्दा हटाइये।

हर तरफ ख़ामोशी है चुप सी और निःशब्द सन्नाटा है,

आप बेतकल्लुफ होइए और खुल के कुछ गुनगुनाइए।

चारों तरफ पसरा हुआ है मरुभूमि का विस्तार सा ,

आप कदम रखिये यहाँ और फूल ही फूल खिलाइए।

मैं भटकता ही रहा हूँ तलाश में खुद की अब तलक,

आईना हैं आप मेरे तो मुझको मेरा अक्स दिखलाइये।

एक अदद चाँद की आशा में चकोर बन कर भटक रहा ,

आप चाँद हैं तो आइये और अपनी चांदनी से नहलाइये।

मैं हिमालय की तरह खड़ा हूँ बिलकुल भाव विहीन सा ,

अपने प्यार की उष्मिता से आप मुझको पिघलाइये।

तेरे इंतज़ार में आँखें दरवाज़े से हैं लगी हुयी अब तक,

आप एक बार तो ऐसे आइये की आके फिर ना जाइए।

-नीहार

कुछ अपनी बात कहूँ मैं तुमसे ......

कुछ अपनी बात कहूँ मैं तुमसे, कुछ तेरी बात सुनु,
तेरे होठों पे खिलते गुलाब की कलियों को मैं चुनु।
रात सोता सोच के तुमको सुबह उठूँ तेरा नाम लिए,
फिर दिन भर तेरी तस्वीरों से मैं बातें ढेर करूँ।
तेरी ही यादें दे जाती हैं मेरी सूनी आँखों में आंसू ,
अपनी पलकों पे उनको मैं सजा के यूँ ही रक्खूं।
मैं आवारा बादल हूँ जो बरसा नहीं कहीं भी अब तक,
तुम लहरा दो जुल्फें अपनी ,जिनकी कैद में मैं बरसूँ।
बस मुझको तो तेरी ही धुन रहती है हरदम जानम,
तुम बाग़ का पुष्प अनोखा ,मैं भंवरा बन तुझमे सिमटुं।
मैं चन्दन का पेड़ हूँ सजनी, तुम उसपे हो सर्प सी लिपटी,
तुम महको बस चन्दन बन कर और मैं तेरी गंध लिए महकूँ।
-नीहार

मंगलवार, 2 मार्च 2010

कुछ पल तुम बैठो पास मेरे......

कुछ पल तुम बैठो पास मेरे, और कुछ बातें मुझसे ख़ास करो,
मुझको छूकर मुझको पाकर, तुम मुझको फिर से सुवास करो।
मैं चातक बन कर वर्षों से बैठा, तक रहा तुम्हारी ओर प्रिये,
तुम स्वाति बूँद बन कर बरसो और मेरे दुःख का नाश करो।
मेरा जीवन तो है सूना सूना पतझर पतझर और बियाबान सा ,
तुम आकर मेरे इस सूने जंगल को खिलता हुआ पलाश करो।
मैं दोपहरी सूरज की गर्मी पीकर तपती धरती बन बैठा हूँ अब,
तुम चांदनी बन पारे सी ढलको और मुझको फिर आकाश करो।
मैं कौन हूँ , क्या हूँ,किसका हूँ यह सब भूल गया इस दुनिया में,
बस तेरा हूँ यह जानता हूँ इसलिए तुम खुद में मुझको तलाश करो।
मैंने तुम में है खुद को देखा, और खुद को तुम में ही पाया है जानम,
तुम को समर्पित मन प्राण है मेरा , तुम मुझ पर यह विश्वास करो।
-नीहार