मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

' द ट्रिनिटी '

यह चित्र वर्ष १९८८ में फुर्सत के उन क्षणों में बनाया गया था जब मेरे लिए ब्रह्मा विष्णु और महेश यानि की पूरी सृस्ती एक आकार में ही समाहित थी..मैंने कोशिश की है, की तीनो प्रमुख देवताओं को सांकेतिक रूप से ही सही यहाँ इस चित्र में ढाल एकाकार कर दूँ...
(नीहार, १९८८)

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

अथ चोर पुराण एवं अन्य कवितायेँ

अथ चोर पुराण
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चोर बना सिपाही घर का,
देख मेरा वाम अंग फड़का।
कहा चोर ने प्रथा यही है, राजा और रंक की यारों
जो चोरी में हो निष्णात, उसके गले पुष्पहार डारो,
औ' ईमां का गला घोंट कर,छह फुट नीचे ज़मीं के गाड़ो,
तभी देश की गाड़ी आगे बढ़ेगी, नहीं रहेगा कोई भी कड़का।
देख मेरा वाम अंग फड़का।।
फिर चोर ने आँख दबाया ,कुर्सी को थोडा खिसकाया,
अपने गिर्द घिरे चमचों को,भारी स्वर में पास बुलाया,
हिंसा की बातें बतलाई,और ख़ूनी दांव पेंच सिखलाया,
उनके अथक प्रयास से देखो, घर घर में एक युद्ध है भड़का।
देख मेरा वाम अंग फड़का॥
चोर के भाग से छीकें फूटे, ईमान के उखड़ गए हैं खूंटे ,
देश में बन्दर- बाँट मचा है,जिसकी मर्ज़ी जो चाहे लूटे,
सच का मुंह हो गया है काला, झूठ के मुंह से कालिख छूटे,
चौर्य शिक्षा के खुल गए हैं सेंटर,गाँधी अब बंद है चरखा,
देख मेरा वाम अंग फड़का॥
अनपढ़ हों पर चतुर प्रवीणा, कर चोरी जो ताने सीना,
लिख लोढा पढ़ पत्थर हों पर, चोरी पर जो भाषण दीना,
बेच बेच कर देश का टुकड़ा, अपना पद जो आपन कीना,
ऐसे लोग से ही देश सुशोभित, लड़की हो चाहे हो लड़का।
देख मेरा वाम अंग फड़का॥
चोर हेतु होत है आरक्षण, चोर करे घूस का भक्षण,
जो पूजे है चोर चालीसा, उसको लाभ मिलेगा तत्क्षण,
दफ्तर में लगा चोरोमीटर, नापे जो चोरों का लक्षण,
घर घर में अब चोर हैं बसते, छोटा हो या हो वह बड़का।
देख मेरा वाम अंग फड़का॥
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई,चोर चोर मौसेरे भाई,
मात्री - वंदना भूल भाल कर,'वन्दे चोरम' सबने गाई,
देश भक्ति की शपथ के बदले,'चौर्य शपथ' सबने है खाई,
ह्रदय देश के लिए नहीं पर, चोरी के लिए रोज़ है धड़का।
देख मेरा वाम अंग फड़का॥
-नीहार , जून १९८९।
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सुन भाई साधो
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सुन भाई साधो सुन भाई पीर, देश की हालत अति गंभीर।
चोर सभासद राजा डाकू, गर्दन पर फेरे जो चाक़ू,
चोरी कर बन गए अमीर, देश की हालत अति गंभीर।
खेलत हैं सब खून की होली,फेंके बम और मारे गोली,
पंजाब हो या हो कश्मीर,देश की हालत अति गंभीर।
दहेज़ का यहाँ खुला है गेट,जैसा लड़का वैसा ही रेट,
अग्नि समाधि लेती सब हीर, देश की हालत अति गंभीर।
लड़की होत विचित्र यहाँ प्राणी,घूरे जिसको मूरख ग्यानी,
होत हरण नित उनका चीड़, देश की हालत अति गंभीर।
दे डोनेशन औ' करी पढ़ाई, दिया घूस औ' नौकरी पायी,
अब खावत सरकारी खीर,देश की हालत अति गंभीर।
पाँव के नीचे सिकुड़ी धरती,खुली हवा भी नहीं है मिलती,
दूनी हो गयी आदम की भीड़,देश की हालत अति गंभीर।
कुर्सी हेतु होत है महाभारत, होवें पूरा जिस से स्वारथ,
बाप मरे है बेटा अधीर, देश की हालत अति गंभीर।
रजा ढोंगी, परजा ढोंगी, भक्त और भागवान भी ढोंगी,
ढोंगी हैं सब यहाँ फ़कीर, देश की हालत अति गंभीर।
बेच बाच कर देश को खाते,कुछ बचता तो घर ले जाते,
म्हारी आँख से बहत है नीर, देश की हालत अति गंभीर।
है हवा प्रदूषित नदी प्रदूषित,है पूरी की पूरी सदी प्रदूषित,
है प्रदूषित गंगा जमुना तीर, देश की हालत अति गंभीर।
सब भाई से इही दुहाई, इस देश को समझो अपनी माई,
और बांटो सब उसका पीर,देश की हालत अति गंभीर।
मन में लेन बस इतना ठान, सत्य आचरण औ' ईमान,
यही तुम्हारा हो तूणीर, देश की हालत अति गंभीर।
- नीहार , जून 1989
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भारत महा - महा भारत
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भारत महा महाभारत ,
जिनगी हुयी अकारथ।
चोर डाकू सब राजा होइंहें,
लाशन की खेती सब बोइहें,
नीति कुनीति अनीति के बल ,
पे साधे सब अपना स्वारथ।
भारत महा महाभारत॥
नहीं धर्म अधर्म की बात कछु,
नहीं कर्म अकर्म की बात कछु,
बस भाई भाई का चीर के सीना,
देखो पी के खून डकारत।
भारत महा महाभारत॥
चोर चोर मौसेरे भाई,
बाँट बूंट कर सबने खाई,
देश-द्रोह ही परम धर्म है,
है बाकी धरम अकारथ।
भारत महा महाभारत॥
सुनु सिय सत्य ये बात हमारी,
अग्नि जरी रोज़ यहाँ नारी,
दूल्हा माचिस लिए खड़ा है,
सास ससुर तेल हैं ढारत ।
भारत महा महाभारत॥
बायाँ दायाँ सब लड़ कर मरिहईं,
मध्यम मार्ग कहाँ सुख पैहईं,
दो पाटन के बीच में भैया,
साबुत कहाँ बचा भारत।
भारत महा महाभारत॥
-नीहार , जून 1989

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

सभ्य समाज की विरूपता और आदमी का व्याघ्र मन

(वर्ष १९८८ में मैंने यह ऊपर वाला चित्र खींचा था अपनी डायरी के एक पन्ने पर.यह चित्र हमारे समाज की विरूपता एवं उस समाज में रहने वाले आदमी के भीतर के हिंसक व्यक्तित्व (जिसे मैंने व्याघ्र मन का नाम दिया है) को दर्शाती है।उसी दौरान मैंने कुछ कवितायेँ भी लिखी थी , उनमे से एक नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ। आश्चर्य की बात यह है की हमारे सभ्य समाज की विरूपता और उसमें रहने वाले हम सभी के भीतर का हिंसक मन आज भी वैसा ही है....कुछ भी नहीं बदला है और शायद बदलेगा भी नहीं।आज की व्यथा यही है की हम नारी को पूजिता नहीं, पतिता समझते हैं और पतित पावनी गंगा के स्त्रीत्व को मानने से इंकार करते हैं.धोखा हमारे पुरुषत्व का हिस्सा है और येही धोखा हम खुद से, परिवार से, समाज से, देश से सदियों से करते आये हैं.उम्मीद है आप को ये रचना पसंद आएगी ।)
भविष्य अजन्मा है -
भूत मिट चुका है और वर्त्तमान रेंग रहा है(अपने आस्था के आयाम में)।
अहल्यायें ठोकर दर ठोकर खा रही हैं,
सीतायें अपहृत हो रही हैं,
द्रोपदियों को भरी सभाओं में नंगा नचाया जा रहा है,
और कृष्ण की सुदर्शन चक्र धरी उँगलियाँ काटी जा रही हैं,
समय के प्रहरियों द्वारा।
राम की तरकश का हर बाण ,
समय के साथ उड़ जाता है निशाने से दूर ..... बहुत दूर।
लक्ष्मण अब सीताओं के लिए रेखाएं नहीं खींचते -
वरन -
खुद ही उन रेखाओं में कैद हो जाते हैं।
बलराम का हल कोई लेकर भाग गया है,
और, अर्जुन किसी कर्ण के हाथों मारे जा चुके हैं।
सभी वशिष्ठ और विश्वामित्र खो चुके हैं अपनी वाक्पटुता,
और परशुराम अपनी दाढ़ी के बाल चुनते हैं।
कुम्भकर्ण जगते हैं, विनाश करते हैं ,
और बिभीषण सुख की नींद महीनो सोते हैं।
हर तरफ सीतायें अपहृत हो रही हैं - द्रोपदियां नंगी हो रही हैं,
और हर तरफ मंदोदरी तथा शूर्पनाखायें अट्टहास करती हैं -।
हर ओर सुरसायें निगल जाती हैं हनुमानों को,
और हर बार कौरव ही रौरव कर महाभारत जीत जाते हैं।
चुक गया द्वापर त्रेता का वह पुण्य -
जब राम राम थे और कृष्ण कृष्ण थे ।
सत्य यही है , की यह कलियुग है और यहाँ कल्कि का राज है,
और इसलिए -
आज का वर्तमान रेंग रहा है -
भूत मर चुका है -
और भविष्य अजन्मा है.... ।
(नीहार, वर्ष १९८९)

अव्यक्त अभिव्यक्तियाँ

जब भी मैंने अपनी अभिव्यक्ति को -
शब्दों के जंगल में - निःशब्द घूमने के लिए छोड़ दिया है,
मुझे एक ही एहसास हुआ है की मैं,
एक बेजुबान आदमी - सिर्फ देख सकता , सुन सकता और,
सूंघ सका हूँ......
पर कह नहीं सकता कुछ भी।
क्युंकी, शब्दों के जंगल में,
सिर्फ और सिर्फ आदमखोर शब्द ही घूमते हैं,
और मैं जानता हूँ की मेरे सारे छौने शब्द खा लिए जायेंगे बेदर्दी से,
उन आदमखोर शब्दों के द्वारा।
इसलिए मैं अपने दांतों के जंगल से -
उन मृदु/कोमल छौनों सामान शब्दों को बहार नहीं आने देता।
मैं जानता हूँ की अपने शब्दोंका भंडार चुक जाने के बाद ,
मैं शब्दहीन , साधनहीन, पुरुषत्वहीन , अभिव्यक्तिहीन ,
यानि,
हर तरह से 'दीन' हो जाऊँगा ।
इसलिए -
वर्षों से बूढ़े सूरज के वृसभ कन्धों पर टकटकी लगाये,
मैं उस सुबह का इंतज़ार कर रहा हूँ -
जहाँ नहीं होगा कोई जंगल आदमखोर शब्दों का।
और जब मेरे शब्द भी छलांगे मरेंगे - उछ्रिन्ख्ल हो ,
उत्पात मचाएंगे नन्हे शावकों ( बच्चों) की भांति।
पर, इंतज़ार कर मैं खुद चुकता जा रहा हूँ...
मेरे शब्द दांतों के जंगल में घुट घुट कर मरते जा रहे हैं....
अभिव्यक्ति अपने मायने खोती जा रही है..... ।
और अब तो उम्मीद की हलकी किरण भी ख़त्म हो गयी है - ।
सुना है, सरकार ने किसी भी तरह के ,
जंगलों की कटाई पर लगा दी है पाबन्दी ।
और इस तरह मेरे शब्दों ( अभिव्यक्तिओं) की हो गयी है,
पूर्ण रूप से " तालाबंदी"।
- नीहार ( वर्ष १९८९)
( यूँ ही बैठे बैठे कलम उठा लिया, कुछ चित्र उकेरे, कुछ शब्दों को अभिव्यक्ति का जामा पहना छोड़ दिया अजनबी शहर के अजनबी रास्तों पर अजनबी लोगों के अजनबी बर्ताव से खुद को बचा बच कर विचरण करने को....जंगल के कट जाने क उपरांत मेरे पास कोई और चारा भी तो नहीं...)

रविवार, 31 जनवरी 2010

एक दूजे के लिए

(यह कृति जून १९८८ में मैंने बनाई थी और इसका नाम दिया था "मेड फॉर इच अदर"(एक दूजे के लिए)..)जाहिर है यह कृतित्व मेरे व्यक्तिगत भावों को दर्शाता है ..नीचे इस से जुडी एक छोटी सी कविता भी है ,जिन्हें मेरे दिल की धरकनो ने बुना, हाथों ने कलम उठाया, कागज़ पे लिखा और मन ने उस वक़्त से जो गाना शुरु किया तो आज तक गाये जा रहा है...)
नींद में डूबी उनकी आँखें कितनी प्यारी लगती हैं,
खुल जाए तो वो ही आँखें छुरी कटारी लगती हैं।
जुल्फ अगर सावन की बदली, होंठ है जैसे सुर्ख गुलाब
रंग सुनहरी धूप किरण है , उनका पूरा चेहरा है माहताब,
साँसों की खुशबु से वो तो फूलों पे भारी लगती हैं,
नींद में प्यारी लगती हैं।
चाल अगर हिरनी सी है तो , स्वर कोयल की मीठी तान,
अंग अंग मदिरालय उनका , जो दे जीवन को नया प्राण,
एक फूल क्या वो तो के फूलों की क्यारी लगती हैं,
स्वर्ग की नारी लगती हैं।
-नीहार ( जून १९८८)

सोमवार, 25 जनवरी 2010

और मेरा खून खौल उठता है...

तुमने कभी सोचा है -
की, कैसा लगता होगा -
मलमल के कपड़ों में सज, खादी की विशेषताओं पे बोलना।
या, विदेशी 'बो" बंधे कंठ से स्वदेशी अंग वस्त्रं पहनने की सलाह।
या, फ्रेंच अतर में नहा कर देशी दुर्गंधी पर एक अभिभाषण।
या, मुर्गे की एक पूरी साबुत टांग अपनी दांत से नोचते हुये,
गरीबी और भुखमरी पर अश्रुपात।
या, मखमली बिस्तर पर इम्पोर्टेड मछरदानी में लेट कर ,
मलेरिया से बचने का उपाय सोचना । ..... । ....... ।
तुम नहीँ सोच पाओगे....मैं भी नहीं सोच पाता था।
मैं सोचता था की ये बातें सिर्फ बातें ही होंगी,
हमारे देश के कर्णधार इतिहास से सबक ले चुके होंगे -
उन्हें याद होगा -
भूख से बिलबिलाते हुये फ्रांसीसियों ने रोटी के बदले( मांगे जाने पर),
केक खाने की सलाह सुन - पूरी व्यवस्था को पलट डाला था -
एक क्रांति के ज़रिये।
पर, मुझे यह देख कर अचम्भा होता है , कि -
हमारे देश के लोग -अब भी सोये पड़े हैं, ओर
हर रोज़ उन्हें सपने बेचे जाते हैं और वो,
उन सपनो को हकीकत समझ कर उस अंधकूप में खोये पड़े हैं।
मेरा खून खौल उठता है....
हर रोज़ टेलीविजन पर , गरीबी और भूख से मरते बच्चों को,
जब संतरे के जूस और न जाने क्या क्या पिलाने कि सलाह दी जाती है,
तब मेरा खून खौल उठता है।
हर रोज़ जब मैं , गरीब जनता के पैसों को ,
तथाकथित ' कल्याणकारी कार्यों" में हवा होते देखता हूँ ,
तब मेरा खून खौल उठता है।
हर रोज़ जब मैं ' स्लम्स ' से गुज़रते कीचड उछालते कार में बैठे,
नेताओं कि नाक पे रुमाल और आँख में घृणा देखता हूँ,
तब मेरा खून खौल उठता है।
हर रोज़ जब अस्पताल में मजबूरी और गरीबी का बिका खून,
किसी अमीर कि नसों में चढ़ता देखता हूँ,
तब मेरा खून खौल उठता है।
हर रोज़ जब मैं भूख से बिलबिलाती ,बाढ़/सूखा पीड़ित जनता कि,
कटोरियों को मंत्रियों/संतरियों द्वारा दान की गयी ,
सड़ी पाँवरोटी से भरी देखता हूँ,
तब मेरा खून खौल उठता है।
हर रोज़ जब मैं अस्पतालों में ज़िन्दगी के बदले,
मौत का खुला व्यापार देखता हूँ,
तब मेरा खून खौल उठता है।
जब मैं शिक्षण संस्थानों में नैतिक व चारित्रिक शिक्षा दले,
हड़ताल कि साजिश देखता हूँ ,
तब मेरा खून खौल उठता है।
हर रोज़ मैं जब राशन में अनाज के दानो के बदले ,
नेताओं के भाषण के अंश पाता हूँ,
तब मेरा खून खौल उठता है।
हर रोज़ जब मैं अपनी इस मजबूर व्यवस्था को,
पल पल क्षण क्षण हर घडी यूँ
मरते तब मेरा खून खौल उठता है।
सच तो ये है कि, मेरा खून हर जगह, हर बात पर खौलता है...,
कभी वोह देश के हर हिस्से में हो रही खूनी वारदातों पे खौलता है ,
कभी आतंक के नाम पर निरीह लोगों कि मौत पर,
तो कभी मराठी, तो कभी मद्रासी ,तो कभी पंजाबी और
कभी अन्य भाषाओँ में बटे लोगों कि मानसिकता पर,
कभी असाम और कश्मीर कि जनता कि अस्तित्व विहीन झगडे पर,
कभी आंध्र, कभी कर्नाटक, कभी गुजरात , कभी दिल्ली कि लूट
और कभी बिहार और उत्तरप्रदेश कि अस्मिता को तिरस्कृत करती राजनीती पर,
कभी मस्जिद , कभी मंदिर, कभी चर्च तो कभी गुरुद्वारा,
कभी राम , कभी रहीम और कभी संत समाज द्वारा
टुकड़े टुकड़े होते हुये इस देश पर,
मेरा खून खौल उठता है....
हर जगह...हर घड़ी...हर पल.... पर होता कुछ नहीं....कुछ भी नहीँ....
मेरे खून को जैसे खौलने की आदत पड़ गयी है... ।
उसके खौलने से कुछ फर्क नहीं पड़ता ....न ही कुछ बदलता है...
सच तो ये है की मेरे खून का खौलना भी ,
मेरी रूटीन का एक अंग हो गया है....
और मेरा सोचने का दायरा तंग गया है।
सच पूछो तो दोस्त - मैं एक भ्रम की स्थिति में जीता रहा हूँ,
सपनो के चीथड़ों को ख्यालों के धागे से सीता रहा हूँ।
जब भी मेरी साँसों ने गर्मी दी, या मेरे नथुनों ने गर्म हवा छोड़ी ,
या मेरी आँखें जलने लगी ,मैं सोचने लगा की मेरा खून खौल रहा है।
पर ये धुआं ,ये गर्म हवा ,ये आँख का जलना ....खून के खौलने से नहीं...
दरअसल मेरा खून इतना बर्फ हो गया है,
की उस से भाप उठने लगा...आँखें जलने लगी, और
मैं इस भ्रम में जीता रहा की मेरा खून खौल रहा है।
दरअसल हम ठन्डे पड़ चुके हैं - हमारी इक्षाएं जम चुकी हैं,
हमारे सोचने की शक्ति बर्फ हो चुकी है .....हमारी क्रांति अभिलाषा ख़त्म हो गयी है।
और, हम एक बड़े से बर्फ के टुकड़े की मानिंद,
अपने भीतर की गर्मी को पीकर -
एक दुसरे से चिपके जा रहे हैं,
और यूँ ही चिपकते रहेंगे।
तकलीफ सहते रहे हैं और तकलीफ सहते रहेंगे...
व्यवस्था के खिलाफ चुप रहते रहे हैं और चुप ही रहेंगे... ।
अगर कहीं आपस का ' एडजस्टमेंट' बिगड़ता है तो हम,
एक बड़े हिमखंड की तरह समस्या से भाग खरे होते हैं...
और 'आइसबर्ग' कहला कर गौरवान्वित होते हैं।
दरअसल हम खुद एक साजिश के तहत जीते रहे हैं ,
हमने अपने चेहरे पे पहन रक्खा है एक नकाब,
हमने अपनी आँखें फोड़ डाली है...और,
कानो में पिघला शीशा उड़ेल रक्खा है ,
हमने अपने नाक कान सब बंद कर रक्खे हैं...
हमारे दिमाग की बत्ती हो गयी है गुल...
हम कैद में फंसे हैं जैसे कोई बुलबुल।
सचमुच हम प्रजातंत्र के षड़यंत्र का एक अभिन्न अंग हैं,
राजनीतिज्ञों/अधिकारीयों के जीवन का राग रंग हैं,
हाथ पाँव सही सलामत , फिर भी हम अपंग हैं ।
-- निहार ( वर्ष १९९० की रचना)

मौन की समिधा


हैं दिशाएं चुप की बस अब मौन की समिधा जलेगी,

मनुष्य के अंतःकरण में समय की दुविधा पलेगी,

ज़िन्दगी का अर्थ कोई जान पाया है कहाँ तक,

ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बन कर छलेगी ।

जल रहे हैं सभ्यता के गरिमामयी अवशेष सारे,

टूट कर गिरने लगे हैं संस्कृति के पुंज तारे,

खून की फेनिल नदी से देखो कोई है पुकारे,

घृणा और विद्वेष में क्या यूँ ही ये धरती जलेगी?

ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बन कर छलेगी ।

पशु वृत्ति को ओट ले देखो हम सब जी रहे हैं,

नीर के बदले मनुष्य का रुधिर देखो हम पी रहे हैं,

चीर कर खुद का ही सीना खुद ही उसको सी रहे हैं,

मौत की खेती यहाँ पर खूब फूलेगी और फलेगी,

जिंदगी ही जिंदगी को जिंदगी बन कर छलेगी।

थे खुले दरवाज़े सब अब बंद हो कर रह गए हैं,

घुप्प अँधेरे अपनी किस्मत में हमीं तो गह गए हैं,

मनुष्यत्व की लाश हम काँधे पे ढोते रह गए हैं ,

अब नहीं हिम की शिला गंगा बनी फिर से गलेगी,

ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बन कर छलेगी।

हम सभी उद्दाम वासना के द्वार पर देखो खड़े हैं,

"अहम्" की परछाईयों में जी रहे हम सब अड़े हैं,

भाई भाई भाईचारा भूल कर देखो कैसे लड़े हैं,

ऐसे में किसकी चली है और किसकी है चलेगी,

जिंदगी ही ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बन कर छलेगी।

गर दिखे कोई किरण तो तुम बढ़ के उसको रोक लो ,

मुट्ठियों में जकड उसको तुम जाओ अपनी कोख लो,

और प्यासी जीभ से तुम उसकी तरलता सोख लो,

जिंदगी शायद तुम्हारे कोख में फिर से पलेगी,

जिंदगी फिर जिंदगी को ज़िन्दगी बन कर मिलेगी।
_ निहार ( अप्रकाशित नाद ध्वनि संकलन वर्ष १९९० से )