बुधवार, 3 मार्च 2010

मुमकिन हो तो मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइए

मुमकिन हो तो सिर्फ मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइये,

अपनी पलकों का वरक उठाइये और मेरी सुबह लाइये।

मैं समंदर में भटक रहा हूँ एक किश्ती की तरह ऐ दोस्त,

मुझको मौजों से बचा कर आप किनारे तक तो ले आइये।

तरस गया है ज़माना देखने को एक चौदहवीं का चाँद,

उनकी खातिर ही सही आप अपने रुख से पर्दा हटाइये।

हर तरफ ख़ामोशी है चुप सी और निःशब्द सन्नाटा है,

आप बेतकल्लुफ होइए और खुल के कुछ गुनगुनाइए।

चारों तरफ पसरा हुआ है मरुभूमि का विस्तार सा ,

आप कदम रखिये यहाँ और फूल ही फूल खिलाइए।

मैं भटकता ही रहा हूँ तलाश में खुद की अब तलक,

आईना हैं आप मेरे तो मुझको मेरा अक्स दिखलाइये।

एक अदद चाँद की आशा में चकोर बन कर भटक रहा ,

आप चाँद हैं तो आइये और अपनी चांदनी से नहलाइये।

मैं हिमालय की तरह खड़ा हूँ बिलकुल भाव विहीन सा ,

अपने प्यार की उष्मिता से आप मुझको पिघलाइये।

तेरे इंतज़ार में आँखें दरवाज़े से हैं लगी हुयी अब तक,

आप एक बार तो ऐसे आइये की आके फिर ना जाइए।

-नीहार

कुछ अपनी बात कहूँ मैं तुमसे ......

कुछ अपनी बात कहूँ मैं तुमसे, कुछ तेरी बात सुनु,
तेरे होठों पे खिलते गुलाब की कलियों को मैं चुनु।
रात सोता सोच के तुमको सुबह उठूँ तेरा नाम लिए,
फिर दिन भर तेरी तस्वीरों से मैं बातें ढेर करूँ।
तेरी ही यादें दे जाती हैं मेरी सूनी आँखों में आंसू ,
अपनी पलकों पे उनको मैं सजा के यूँ ही रक्खूं।
मैं आवारा बादल हूँ जो बरसा नहीं कहीं भी अब तक,
तुम लहरा दो जुल्फें अपनी ,जिनकी कैद में मैं बरसूँ।
बस मुझको तो तेरी ही धुन रहती है हरदम जानम,
तुम बाग़ का पुष्प अनोखा ,मैं भंवरा बन तुझमे सिमटुं।
मैं चन्दन का पेड़ हूँ सजनी, तुम उसपे हो सर्प सी लिपटी,
तुम महको बस चन्दन बन कर और मैं तेरी गंध लिए महकूँ।
-नीहार

मंगलवार, 2 मार्च 2010

कुछ पल तुम बैठो पास मेरे......

कुछ पल तुम बैठो पास मेरे, और कुछ बातें मुझसे ख़ास करो,
मुझको छूकर मुझको पाकर, तुम मुझको फिर से सुवास करो।
मैं चातक बन कर वर्षों से बैठा, तक रहा तुम्हारी ओर प्रिये,
तुम स्वाति बूँद बन कर बरसो और मेरे दुःख का नाश करो।
मेरा जीवन तो है सूना सूना पतझर पतझर और बियाबान सा ,
तुम आकर मेरे इस सूने जंगल को खिलता हुआ पलाश करो।
मैं दोपहरी सूरज की गर्मी पीकर तपती धरती बन बैठा हूँ अब,
तुम चांदनी बन पारे सी ढलको और मुझको फिर आकाश करो।
मैं कौन हूँ , क्या हूँ,किसका हूँ यह सब भूल गया इस दुनिया में,
बस तेरा हूँ यह जानता हूँ इसलिए तुम खुद में मुझको तलाश करो।
मैंने तुम में है खुद को देखा, और खुद को तुम में ही पाया है जानम,
तुम को समर्पित मन प्राण है मेरा , तुम मुझ पर यह विश्वास करो।
-नीहार

जब याद तुम्हारी आती है

जब याद तुम्हारी आती है,तब हम माजी में खो जाते हैं ,

आँखें बंद करके हम फिर , तेरे तसव्वुर से लग सो जाते हैं।

जग जाते हैं तेरी आहट से, तेरी खुशबु से तर हो जाते हैं,

तुम सांस जो लेते हो पास मेरे, हम उस पल को जी जाते हैं।

तुम चलते हो तो चलती रहती है धड़कन मेरे दिल की जानम,

तुम रुक जाते हो तो फिर हम चाह कर भी सांस नहीं ले पाते हैं।

जब मौसम रूठ के गर्म हुआ और पतझर की रुत आ सी गयी,

तेरे आने से ऐसे बेरुखे मौसम में भी फूल ही फूल खिल जाते हैं।

जब जब सर्द हवा का झोंका आ कर हमको तेरी याद दिलाता है ,

हम चिरियों के संग मिल बैठे , फिर तेरे ही गीत गुनगुनाते हैं।

बस धुन रहती है मुझको तेरी, बस तेरी याद में खोये रहते हैं,

बस तेरे नाम की माला जपते और इश्वर को तेरा नाम सुनते हैं।

- नीहार

सोमवार, 1 मार्च 2010

खुलता हूँ तो किताब हो जाता हूँ,पन्नो पे बिखरा गुलाब हो जाता हूँ.

देखो सुरमई सांझ उतर आयी है,लगता है आपने अपनी जुल्फें लहराई है।
मंदिर में बजी जो घंटियों की तरह,सुना है बस आपने पाजेब छनकाई है।
सात सुरों की महफ़िल सजा के बैठे हैं,लोग कहते हैं की वो खिलखिलाई है।
चेहरे से उसने अपनी जुल्फों को हटाया,चांदनी धीरे से धरती पे उतर आयी है।
महक उठा है मेरा वजूद उसकी खुशबु से,हवा में घुली उसकी याद चली आयी है।
वो दबे पांव आ जाता है ख्याल बन कर,उसे याद कर मेरी आँख फिर भर आयी है।
वो इश्क है मेरा वो मेरी मोहब्बत है,वो जान है मेरी जिस पे मैंने जिंदगी लुटाई है।
- नीहार
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खुलता हूँ तो एक किताब हो जाता हूँ,पन्नो पर बिखरा गुलाब हो जाता हूँ।
हरी दूबों पे बिखरे ओस की बूंदों में छुपा, मैं सुबह का आफताब हो जाता हूँ।
सदियों की प्यासी जिंदगी की खातिर, मैं फिर पवित्र गंगा का आब हो जाता हूँ।
मैं आँख की राहत दिलों की चाहत हूँ, मैं तुम्हारे लिए सुनहरा खाब हो जाता हूँ।
तुम्हारे जुल्फों में कैद होकर मैं तो ,पारे से ढलकता हूँ , माहताब हो जाता हूँ।
तुम जो नहीं आती हो कभी ख्याल बन कर,मैं टूटा हुआ एक साज हो जाता हूँ।
जो तुम तो रंग और रूप है जीवन में,तुम नहीं तो हर वक़्त मैं बेताब हो जाता हूँ।
मैं तुम्हारी अंखियों के कटोरों में , छलकता महकता बहेकता शराब हो जाता हूँ।
तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारे लिए अच्छा हूँ , बाकियों के लिए मैं बस ख़राब हो जाता हूँ।
- नीहार

सूरज को माथे पर बिंदी सा सजाया कीजिये


ख्वाब में मुझको रोज़ बुलाया कीजिये , चैन से रोज़ खुद को सुलाया कीजिये।
एक दफा खुदा से मांग लो मुझको,फिर हर दफा मुझको यूँ ही पाया कीजिये।
आपकी जुल्फें घटायें हैं सावन की, अपने चाँद से मुखरे से घटा हटाया कीजिए।

सूरज आपकी खतिर उगा है लाल, अपने माथे उसको बिंदी सा सजाया कीजिये।
मेरी प्यास बुझती नहीं है पानी से, अपने होठों की नमी उसको पिलाया कीजिये।
मैं डूबना चाहता हूँ गहरे समंदर में, अपनी आँख के सागर में हमें डुबाया कीजिये।
मुझको नज़र आता नहीं कोई तेरे सिवा, हर जगह बस आप नज़र आया कीजिये।
मेरी धड़कने गाती हैं तेरे तराने रात दिन,अपनी धडकनों में मेरे सुर सजाया कीजिये।
मैंने माँगा है खुदा से नेमत में आपको ,आप मुझको भी ईश्वर से मांग लाया कीजिये।
-नीहार

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मुझे कुछ पल तो तुम अपने उधार दे दो,मेरी जिंदगी को एक खूबसूरत उपहार दे दो।
हर तरफ है अँधेरा रौशनी नहीं कहीं , चाँद बन कर तुम मेरे घर रौशनी का विस्तार दे दो।
हर तरफ बियाबान सा मरुभूमि का विस्तार है, तुम उस मरुभूमि को पानी का मीठा फुहार दे दो।
मैं बना चातक यहाँ प्यास जन्मो की लिए हूँ, तुम मुझे सुबह की कलियों पे बिखरी नीहार दे दो।
मैं बिखरा संगीत हूँ एक टूटे हुए इसराज का,तुम संगीत की देवी मुझे एक अटूट सितार दे दो।
जिंदगी में रंग नहीं, गंध नहीं , मकरंद नहीं,तुम आ के मेरी जिंदगी को एक अनूठा श्रृंगार दे दो।
- नीहार

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

एक सन्नाटा पसरा हुआ

सपनो की चादर ओढ़ जब भी सोता हूँ -
तुम्हारे बदन की गर्मी मुझे नहलाती है,
दिन भर की थकन हवा में गुम हो जाती है ,
बाल उड़ उड़ कर चेहरे से अठखेलियाँ करते हैं,
आंसू आँख से निकल बस भाप हो उड़ जाते हैं,
कई दिनों की गुम हंसी वापिस लौट आती है।
पर , मेरे हाथ ज्यूँही तुम्हे पकड़ने को होते हैं -
आँखें खुल जाती हैं ,सब कुछ शांत हो जाता है।
दाढ़ी की चुभन दिल में काँटों सी फंसती है,
आँखें भीतर तक शर्म -ओ- हया से धंसती है।
वो जो सपनो का दौर था- ठाठें मारता है मेरे अन्दर,
सूख जाता है मन ही मन - मन के भीतर का समंदर,
न कुछ बहार ही बचता है , न ही बचता है कुछ अन्दर,
सिर्फ एक जलता हुआ एहसास होता है,
सिर्फ एक बेआवाज़ खामुशी होती है,
सिर्फ एक पसरा हुआ सन्नाटा होता है,
जहाँ सिर्फ मेरे रोने की आवाज़ दस्तक देती है।
-नीहार
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मज़ा आ रहा अब हमें जीने में,
जिंदगी को मय की तरह पीने में।
कुछ ख्वाब सुलग रहे हैं आँखों में,
कुछ सदियों से पल रहे हैं सीने में।
खून सारा जल कर राख हो गया ,
बदन गल कर नह गया पसीने में।
कुछ मुश्किलें हम से टकरा टूट गयी,
कुछ तैर गयीं हालात के सफीने में।
जिंदगी की बदसूरती लगता है जैसे,
बदल गयी हो संगमरमरी हसीने में।
- नीहार
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ख्वाबों का रंग कहीं आँखों में गहरे उतर गया,
मैं खुद ही अपने साए से कल रात डर गया।
अपनी तमन्ना खाक कर औरों को खुश किया,
कुछ इस तरह मैं अपनी जिंदगी दुश्वार कर गया।
चाहा हुआ देखो कभी भी नहीं होता है प्यार में,
यह जानते हुए भी मैं बस उनसे प्यार कर गया।
लगता है ख्वाबों में भी वो हमें अब देखते नहीं,
कहते हैं की यादों से उनका अब तो जी ही भर गया।
वो जो सुबह का भूला कहीं घूम रहा था डर बदर ,
फिर शाम को वो लौट कर खुद अपने ही घर गया।
सुनता हूँ मेरे नाम का एक जो शख्स रहता था यहाँ,
कल रात किसी वक़्त वो किसी सदमे से मर गया।
- नीहार
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आईने ने धुप से की अठखेलियाँ नईं,
एक किरण छिटक के फिर दूर हो गयी।
वो चांदनी जो पारे से ढलक रही थी कल,
न जाने आज क्यूँ वो फिर बर्फ हो गयी।
जिस रात ने जगकर हमें नीलाम कर दिया,
वो रात देखो खुद भी तो अब नीलाम हो गयी।
आँखें लड़ाने की तो आदत कभी नहीं थी हमें,
आँखें लडाई तो फिर बिचारी आँखें ही खो गयीं।
हरी हरी घास पर ओस की बूँदें तो देख दोस्त,
ये रात जैसे कोई शबनमी आंसू ही रो गयी।
पलकें उठी तो बस जैसे की सेहर हो गया,
पलकें झुकी तो फिर जैसे कोई रात हो गयी।
जो पी लिया उनकी मोहब्बत का मय मैंने,
उस दिन से जिंदगी बस मेरी मदहोश हो गयी।
-नीहार