मंगलवार, 2 मार्च 2010

जब याद तुम्हारी आती है

जब याद तुम्हारी आती है,तब हम माजी में खो जाते हैं ,

आँखें बंद करके हम फिर , तेरे तसव्वुर से लग सो जाते हैं।

जग जाते हैं तेरी आहट से, तेरी खुशबु से तर हो जाते हैं,

तुम सांस जो लेते हो पास मेरे, हम उस पल को जी जाते हैं।

तुम चलते हो तो चलती रहती है धड़कन मेरे दिल की जानम,

तुम रुक जाते हो तो फिर हम चाह कर भी सांस नहीं ले पाते हैं।

जब मौसम रूठ के गर्म हुआ और पतझर की रुत आ सी गयी,

तेरे आने से ऐसे बेरुखे मौसम में भी फूल ही फूल खिल जाते हैं।

जब जब सर्द हवा का झोंका आ कर हमको तेरी याद दिलाता है ,

हम चिरियों के संग मिल बैठे , फिर तेरे ही गीत गुनगुनाते हैं।

बस धुन रहती है मुझको तेरी, बस तेरी याद में खोये रहते हैं,

बस तेरे नाम की माला जपते और इश्वर को तेरा नाम सुनते हैं।

- नीहार

सोमवार, 1 मार्च 2010

खुलता हूँ तो किताब हो जाता हूँ,पन्नो पे बिखरा गुलाब हो जाता हूँ.

देखो सुरमई सांझ उतर आयी है,लगता है आपने अपनी जुल्फें लहराई है।
मंदिर में बजी जो घंटियों की तरह,सुना है बस आपने पाजेब छनकाई है।
सात सुरों की महफ़िल सजा के बैठे हैं,लोग कहते हैं की वो खिलखिलाई है।
चेहरे से उसने अपनी जुल्फों को हटाया,चांदनी धीरे से धरती पे उतर आयी है।
महक उठा है मेरा वजूद उसकी खुशबु से,हवा में घुली उसकी याद चली आयी है।
वो दबे पांव आ जाता है ख्याल बन कर,उसे याद कर मेरी आँख फिर भर आयी है।
वो इश्क है मेरा वो मेरी मोहब्बत है,वो जान है मेरी जिस पे मैंने जिंदगी लुटाई है।
- नीहार
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खुलता हूँ तो एक किताब हो जाता हूँ,पन्नो पर बिखरा गुलाब हो जाता हूँ।
हरी दूबों पे बिखरे ओस की बूंदों में छुपा, मैं सुबह का आफताब हो जाता हूँ।
सदियों की प्यासी जिंदगी की खातिर, मैं फिर पवित्र गंगा का आब हो जाता हूँ।
मैं आँख की राहत दिलों की चाहत हूँ, मैं तुम्हारे लिए सुनहरा खाब हो जाता हूँ।
तुम्हारे जुल्फों में कैद होकर मैं तो ,पारे से ढलकता हूँ , माहताब हो जाता हूँ।
तुम जो नहीं आती हो कभी ख्याल बन कर,मैं टूटा हुआ एक साज हो जाता हूँ।
जो तुम तो रंग और रूप है जीवन में,तुम नहीं तो हर वक़्त मैं बेताब हो जाता हूँ।
मैं तुम्हारी अंखियों के कटोरों में , छलकता महकता बहेकता शराब हो जाता हूँ।
तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारे लिए अच्छा हूँ , बाकियों के लिए मैं बस ख़राब हो जाता हूँ।
- नीहार

सूरज को माथे पर बिंदी सा सजाया कीजिये


ख्वाब में मुझको रोज़ बुलाया कीजिये , चैन से रोज़ खुद को सुलाया कीजिये।
एक दफा खुदा से मांग लो मुझको,फिर हर दफा मुझको यूँ ही पाया कीजिये।
आपकी जुल्फें घटायें हैं सावन की, अपने चाँद से मुखरे से घटा हटाया कीजिए।

सूरज आपकी खतिर उगा है लाल, अपने माथे उसको बिंदी सा सजाया कीजिये।
मेरी प्यास बुझती नहीं है पानी से, अपने होठों की नमी उसको पिलाया कीजिये।
मैं डूबना चाहता हूँ गहरे समंदर में, अपनी आँख के सागर में हमें डुबाया कीजिये।
मुझको नज़र आता नहीं कोई तेरे सिवा, हर जगह बस आप नज़र आया कीजिये।
मेरी धड़कने गाती हैं तेरे तराने रात दिन,अपनी धडकनों में मेरे सुर सजाया कीजिये।
मैंने माँगा है खुदा से नेमत में आपको ,आप मुझको भी ईश्वर से मांग लाया कीजिये।
-नीहार

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मुझे कुछ पल तो तुम अपने उधार दे दो,मेरी जिंदगी को एक खूबसूरत उपहार दे दो।
हर तरफ है अँधेरा रौशनी नहीं कहीं , चाँद बन कर तुम मेरे घर रौशनी का विस्तार दे दो।
हर तरफ बियाबान सा मरुभूमि का विस्तार है, तुम उस मरुभूमि को पानी का मीठा फुहार दे दो।
मैं बना चातक यहाँ प्यास जन्मो की लिए हूँ, तुम मुझे सुबह की कलियों पे बिखरी नीहार दे दो।
मैं बिखरा संगीत हूँ एक टूटे हुए इसराज का,तुम संगीत की देवी मुझे एक अटूट सितार दे दो।
जिंदगी में रंग नहीं, गंध नहीं , मकरंद नहीं,तुम आ के मेरी जिंदगी को एक अनूठा श्रृंगार दे दो।
- नीहार

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

एक सन्नाटा पसरा हुआ

सपनो की चादर ओढ़ जब भी सोता हूँ -
तुम्हारे बदन की गर्मी मुझे नहलाती है,
दिन भर की थकन हवा में गुम हो जाती है ,
बाल उड़ उड़ कर चेहरे से अठखेलियाँ करते हैं,
आंसू आँख से निकल बस भाप हो उड़ जाते हैं,
कई दिनों की गुम हंसी वापिस लौट आती है।
पर , मेरे हाथ ज्यूँही तुम्हे पकड़ने को होते हैं -
आँखें खुल जाती हैं ,सब कुछ शांत हो जाता है।
दाढ़ी की चुभन दिल में काँटों सी फंसती है,
आँखें भीतर तक शर्म -ओ- हया से धंसती है।
वो जो सपनो का दौर था- ठाठें मारता है मेरे अन्दर,
सूख जाता है मन ही मन - मन के भीतर का समंदर,
न कुछ बहार ही बचता है , न ही बचता है कुछ अन्दर,
सिर्फ एक जलता हुआ एहसास होता है,
सिर्फ एक बेआवाज़ खामुशी होती है,
सिर्फ एक पसरा हुआ सन्नाटा होता है,
जहाँ सिर्फ मेरे रोने की आवाज़ दस्तक देती है।
-नीहार
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मज़ा आ रहा अब हमें जीने में,
जिंदगी को मय की तरह पीने में।
कुछ ख्वाब सुलग रहे हैं आँखों में,
कुछ सदियों से पल रहे हैं सीने में।
खून सारा जल कर राख हो गया ,
बदन गल कर नह गया पसीने में।
कुछ मुश्किलें हम से टकरा टूट गयी,
कुछ तैर गयीं हालात के सफीने में।
जिंदगी की बदसूरती लगता है जैसे,
बदल गयी हो संगमरमरी हसीने में।
- नीहार
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ख्वाबों का रंग कहीं आँखों में गहरे उतर गया,
मैं खुद ही अपने साए से कल रात डर गया।
अपनी तमन्ना खाक कर औरों को खुश किया,
कुछ इस तरह मैं अपनी जिंदगी दुश्वार कर गया।
चाहा हुआ देखो कभी भी नहीं होता है प्यार में,
यह जानते हुए भी मैं बस उनसे प्यार कर गया।
लगता है ख्वाबों में भी वो हमें अब देखते नहीं,
कहते हैं की यादों से उनका अब तो जी ही भर गया।
वो जो सुबह का भूला कहीं घूम रहा था डर बदर ,
फिर शाम को वो लौट कर खुद अपने ही घर गया।
सुनता हूँ मेरे नाम का एक जो शख्स रहता था यहाँ,
कल रात किसी वक़्त वो किसी सदमे से मर गया।
- नीहार
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आईने ने धुप से की अठखेलियाँ नईं,
एक किरण छिटक के फिर दूर हो गयी।
वो चांदनी जो पारे से ढलक रही थी कल,
न जाने आज क्यूँ वो फिर बर्फ हो गयी।
जिस रात ने जगकर हमें नीलाम कर दिया,
वो रात देखो खुद भी तो अब नीलाम हो गयी।
आँखें लड़ाने की तो आदत कभी नहीं थी हमें,
आँखें लडाई तो फिर बिचारी आँखें ही खो गयीं।
हरी हरी घास पर ओस की बूँदें तो देख दोस्त,
ये रात जैसे कोई शबनमी आंसू ही रो गयी।
पलकें उठी तो बस जैसे की सेहर हो गया,
पलकें झुकी तो फिर जैसे कोई रात हो गयी।
जो पी लिया उनकी मोहब्बत का मय मैंने,
उस दिन से जिंदगी बस मेरी मदहोश हो गयी।
-नीहार

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

जादू सा छा रहा है,कोई मुझमे समा रहा है

जादू सा छा रहा है ,कोई मुझमे समा रहा है।

जुल्फों में कैद बादलों को, सावन बना रहा है।

चलने से उसके हर शू , आ जाती है बहारें,

मरुभूमि में भी चल कर,मौसम बदल रहा है।

पलकें उठा के अपनी, देखो ले आता है सहर वो

पलकें गिरा ली उसने तो, बस तारीक छा रहा है।

आवाज़ है उसकी जैसे, मिसरी घुली हुयी सी,

कानो में मेरे जैसे वो जलतरंग सा बजा रहा है।

मेरी प्यास बुझाने की खातिर घूमे दर बदर वो,

फूलों की पंखुरियों से,ओस की बूंदे चुरा रहा है।

है वो स्नेह का सागर , है वो प्यार का दरिया,

वो चाँद बन कर मुझको , लहर सा बना रहा है।

मैं लिखता हूँ गीत उस पर, मैं भरता हूँ रंग उसमे,

इन्द्रधनुषी रंगों के वो मुझे सपने दिखा रहा है।

वो वर्षों से गुनगुना रहा है मेरे लिखे हुए गाने,

देखो सात सुरों में ढल कर वो मुझमे उतर रहा है।

उसको साँसों में घुली है , चन्दन वन की खुशबु,

वो हवा है उन वनों का , देखो मुझ पे गुज़र रहा है।

- नीहार

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

तुम्हारी ही खातिर

उनको हम अपने दिल में छुपाये बैठे हैं,सारी दुनिया से जैसे उनको चुराए बैठे हैं।

खुदा का नूर टपकता है उनके चेहरे से,इसलिए उनको तो हम खुदा बनाये बैठे हैं।

उनकी रंगत जैसे सुबह की धूप खिली, हम खुद को उस रंग से नहलाये बैठे हैं।

वो आईना है सब कुछ बता देता है मुझे,हर घडी खुद को वो आईना दिखाए बैठे हैं।

उनकी हंसी जैसे मचलता पहाड़ी झरना कोई,उसकी मधुर गूँज हम खुद को सुनाये बैठे हैं।

उनके सिवा हमको अब कोई नज़र आता नहीं,हमारे इर्द गिर्द सिर्फ वो ही वो तो छाये हैं।

-नीहार

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वो साया बन मेरे साथ साथ चल रहा है,देखो वो अपने घर से निकल रहा है।

बहुत मोहब्बत करता है मुझसे, शायद इसलिए वो रोज़ एक सूरज निगल रहा है।

मेरी अनबुझी प्यास बुझाने की खातिर ,देखो वो खुद हिम सा पिघल रहा है।

वो दरिया है शोखी उसकी आदत है , मुझे देखने की खातिर वो कैसे मचल रहा है।

उसकी चाहत खुदा की इबादत है,और खुद की इबादत में वो खुद ही खलल रहा है।

उसके गिरने से मेरी साँसे टूट जाती हैं, मेरी ही खातिर वो हर पल संभल रहा है।

उसको छूने से महक उठती हैं मेरी साँसे,मेरे सीने में वो एक दिल सा पल रहा है।

वो मेरा नसीब है कई जन्मो का, मेरे साथ साथ वो कदम दर कदम चल रहा है।

मैं उसके दिल में रहता हूँ धड़कन की तरह,वो मेरी आँख में रौशनी सा पल रहा है।

-नीहार

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

मेरी आफरीन - तेरे ही नाम मेरी सुबह औ' मेरी शाम

तेरी आँखों के समंदर में डूब जाते हैं,
इस तरह हम खुद को तुझ में पाते हैं।
खुदा को देखा नहीं है कभी हमने पर,
तुम में ही हम खुदा की झलक पाते हैं।
तुम ही मेरी सुबह हो शाम भी तुम हो,
तुम्हारी ही चांदनी में हम रातों को नहाते हैं।
गीत लिखते हैं तो बस तेरी ही खातिर जानम,
तेरे लिए ही उन गीतों को हम गुनगुनाते हैं।
चलो फिर तुम्हारी जुल्फों में हम खुशबु ढूँढें,
चलो फिर तुम्हारे लबों पे हंसी हम ले आते हैं।
तुम जिंदगी हो मेरी , तुम ही चाहत हो मेरी,
राहत-ए-जिन्दगी भी तुझसे ही हम तो पाते हैं।

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मेरी आफरीन, तेरे ही नाम मेरी सुबह और मेरी शाम,
तू ही है मेरी मंजिल और बस तू ही है मेरा मुकाम।
खुले जो तेरी आँख तो मेरी सुबह रोज़ आती है,
तेरी जुल्फों से गुज़र कर हवा मुझ तक आती है,
तेरी ही पलकों पर ज्यूँ उतर आती है मेरी हर शाम,
तू ही है मेरी मंजिल और बस तू है है मेरा मुकाम।
तू चले तो यूँ लगे की जैसे जल उट्ठे यादों के दिए,
तेरी आँखों में डूब कर हम बहक उट्ठे हैं बिन पिए,
तेरी धड़कने दे मेरी जिंदगी को जीने का नया पैगाम,
तू ही है मेरी मंजिल और बस तू ही है मेरा मुकाम।

-नीहार