मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

जादू सा छा रहा है,कोई मुझमे समा रहा है

जादू सा छा रहा है ,कोई मुझमे समा रहा है।

जुल्फों में कैद बादलों को, सावन बना रहा है।

चलने से उसके हर शू , आ जाती है बहारें,

मरुभूमि में भी चल कर,मौसम बदल रहा है।

पलकें उठा के अपनी, देखो ले आता है सहर वो

पलकें गिरा ली उसने तो, बस तारीक छा रहा है।

आवाज़ है उसकी जैसे, मिसरी घुली हुयी सी,

कानो में मेरे जैसे वो जलतरंग सा बजा रहा है।

मेरी प्यास बुझाने की खातिर घूमे दर बदर वो,

फूलों की पंखुरियों से,ओस की बूंदे चुरा रहा है।

है वो स्नेह का सागर , है वो प्यार का दरिया,

वो चाँद बन कर मुझको , लहर सा बना रहा है।

मैं लिखता हूँ गीत उस पर, मैं भरता हूँ रंग उसमे,

इन्द्रधनुषी रंगों के वो मुझे सपने दिखा रहा है।

वो वर्षों से गुनगुना रहा है मेरे लिखे हुए गाने,

देखो सात सुरों में ढल कर वो मुझमे उतर रहा है।

उसको साँसों में घुली है , चन्दन वन की खुशबु,

वो हवा है उन वनों का , देखो मुझ पे गुज़र रहा है।

- नीहार

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

तुम्हारी ही खातिर

उनको हम अपने दिल में छुपाये बैठे हैं,सारी दुनिया से जैसे उनको चुराए बैठे हैं।

खुदा का नूर टपकता है उनके चेहरे से,इसलिए उनको तो हम खुदा बनाये बैठे हैं।

उनकी रंगत जैसे सुबह की धूप खिली, हम खुद को उस रंग से नहलाये बैठे हैं।

वो आईना है सब कुछ बता देता है मुझे,हर घडी खुद को वो आईना दिखाए बैठे हैं।

उनकी हंसी जैसे मचलता पहाड़ी झरना कोई,उसकी मधुर गूँज हम खुद को सुनाये बैठे हैं।

उनके सिवा हमको अब कोई नज़र आता नहीं,हमारे इर्द गिर्द सिर्फ वो ही वो तो छाये हैं।

-नीहार

**************************************************************************

वो साया बन मेरे साथ साथ चल रहा है,देखो वो अपने घर से निकल रहा है।

बहुत मोहब्बत करता है मुझसे, शायद इसलिए वो रोज़ एक सूरज निगल रहा है।

मेरी अनबुझी प्यास बुझाने की खातिर ,देखो वो खुद हिम सा पिघल रहा है।

वो दरिया है शोखी उसकी आदत है , मुझे देखने की खातिर वो कैसे मचल रहा है।

उसकी चाहत खुदा की इबादत है,और खुद की इबादत में वो खुद ही खलल रहा है।

उसके गिरने से मेरी साँसे टूट जाती हैं, मेरी ही खातिर वो हर पल संभल रहा है।

उसको छूने से महक उठती हैं मेरी साँसे,मेरे सीने में वो एक दिल सा पल रहा है।

वो मेरा नसीब है कई जन्मो का, मेरे साथ साथ वो कदम दर कदम चल रहा है।

मैं उसके दिल में रहता हूँ धड़कन की तरह,वो मेरी आँख में रौशनी सा पल रहा है।

-नीहार

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

मेरी आफरीन - तेरे ही नाम मेरी सुबह औ' मेरी शाम

तेरी आँखों के समंदर में डूब जाते हैं,
इस तरह हम खुद को तुझ में पाते हैं।
खुदा को देखा नहीं है कभी हमने पर,
तुम में ही हम खुदा की झलक पाते हैं।
तुम ही मेरी सुबह हो शाम भी तुम हो,
तुम्हारी ही चांदनी में हम रातों को नहाते हैं।
गीत लिखते हैं तो बस तेरी ही खातिर जानम,
तेरे लिए ही उन गीतों को हम गुनगुनाते हैं।
चलो फिर तुम्हारी जुल्फों में हम खुशबु ढूँढें,
चलो फिर तुम्हारे लबों पे हंसी हम ले आते हैं।
तुम जिंदगी हो मेरी , तुम ही चाहत हो मेरी,
राहत-ए-जिन्दगी भी तुझसे ही हम तो पाते हैं।

**************************************
मेरी आफरीन, तेरे ही नाम मेरी सुबह और मेरी शाम,
तू ही है मेरी मंजिल और बस तू ही है मेरा मुकाम।
खुले जो तेरी आँख तो मेरी सुबह रोज़ आती है,
तेरी जुल्फों से गुज़र कर हवा मुझ तक आती है,
तेरी ही पलकों पर ज्यूँ उतर आती है मेरी हर शाम,
तू ही है मेरी मंजिल और बस तू है है मेरा मुकाम।
तू चले तो यूँ लगे की जैसे जल उट्ठे यादों के दिए,
तेरी आँखों में डूब कर हम बहक उट्ठे हैं बिन पिए,
तेरी धड़कने दे मेरी जिंदगी को जीने का नया पैगाम,
तू ही है मेरी मंजिल और बस तू ही है मेरा मुकाम।

-नीहार

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

कुछ गजलें (भाग एक)

(ये ग़ज़लें मैंने वर्ष १९८९ से १९९१ के बीच अपने अकेलेपन से जूझते हुए लिखी थी.इन् गजलों की एक एक पंक्तियाँ मेरी भावनाओं का सच्चा प्रतिबिम्ब हैं...शब्द उन्हें हो सकता है बयां करने में असमर्थ हों ,पर उनसे उनकी परिभाषा पर असर नहीं पड़ता .उम्मीद है आपको पसंद आएगा)- नीहार
******************************************************
दिल जिगर गुर्दा सभी बीमार हो गया,
कल का शिकारी आज खुद शिकार हो गया।
चाहा था कोई रंग दूँ अपनी जिंदगी को मैं,
एक ठोकर जो लगी तो सब बेकार हो गया।
खाने को मेरे पास अब तो कुछ नहीं बचा,
कहते हैं लोग इसलिए मैं गमख्वार हो गया।
कल तक उनके ख्यालों को ढ़ो रहा था मैं,
आज देखो फिर से मैं तो बेगार हो गया।
एक दर्द का सागर जो मेरे भीतर सो रहा था,
वक़्त की आंधी में जग कर वो ज्वार हो गया।
जिंदा हूँ , पर आदमी में मेरी गिनती नहीं रही,
सच कहूँ तो मुर्दों में मेरा अब शुमार हो गया।
वक़्त ने दिए हैं कुछ ऐसे दर्द भी मुझको की,
दिल जो एक सफीना था अब पतवार हो गया।
कल तलक जो दिल की दवा बेच रहा था मैं,
आज से खुद वही देखो खरीददार हो गया।
हमने बनाया था जो एक प्रेम का मंदिर,
वक़्त की तेज़ आँधी में वही मज़ार हो गया।
******************************************
खुश रहो तुम ये चाहत मेरी है सनम,
हम तो देखेंगे राह तेरी सातों जनम।
यूँ महकती रहो जैसे की चन्दन हो तुम,
फूलों के रंग में बस तुम हो जाओ गुम।
तुम को देखूं तो बस ऐसा महसूस हो,
की सूरज से छिटकी हुयी तुम हो किरण।
खुश रहो तुम ये चाहत मेरी है सनम॥
झरनों से तुम बस सुर मिलाती रहो,
मद भरे नयन से मय पिलाती रहो।
फूल ही फूल बिखरती रहे तेरी राह में,
मेरी किस्मत में रहे बस काँटों की चुभन।
खुश रहो तुम ये चाहत मेरी है सनम॥
फर्क इतना है तुझमें और मुझमें की देख,
कितना घबरा गया है आज शायर तेरा।
तुम तो हो धरती से ऊपर की कोई परी,
हम हैं जीवन की एक अनबुझी सी जलन।
खुश रहो तुम ये चाहत मेरी है सनम,
राह देखेंगे हम तो तेरी सातों जनम॥
************************************************************
जड़ था जीवन , शेष नहींकुछ भी था उसके अंतर में
तुम ने आकर मचा दिया, एक हलचल सा उसके उर में।
आँखें थी की इंतज़ार में खुली अधखुली सी रह गयी,
औ' होठों ने काँप काँप कर तुम्हे पुकारा धीमे स्वर में।
जब थका हुआ मैं बाट जोह रहा था किसी सहारे की,
तब तुमने ही आकर थामा मेरे तन को अपने कर में।
जीवन था मरुस्थल मेरा, तुम वर्षा बूँद बन कर आयी,
और फिर आ कर अमृत रस डाला, जीवन के सूखे जड़ में।
तुम हो प्रतिफल मेरे कई जन्मों की कठिन तपस्या की,
प्राप्त हुयी हो तुम तो मुझको मेरे इश्वर के दिए हुए वर में।
आओ आकर साथ लड़ो तुम, जीवन का यह कठिन समर,
हाथों में देकर हाथ मेरे, तुम गाओ जीवन गीत मेरे स्वर में।
****************************************************
गीत होठों पर नहीं अब आ रहे हैं,
फिर भी ये तय है की हम कुछ गा रहे हैं।
आप बिन सब सूना सूना लग रहा है,
एक अँधेरी राह पर खुद हम जा रहे हैं।
खाने को हमें कुछ भी अब चाहिए,
क्युंकी हम अब गम ही गम खा रहे हैं।
उनके इंतज़ार में हम 'दर' को तक रहे,
उनको पर न आना था, न वे आ रहे हैं।
अब क्या बताएं तुमको ई मेरे गम-ए- दिल,
हम तो सजा-ए-मुहब्बत यूँ ही पा रहे हैं।
-नीहार

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

श्रिष्टि : कर्ता और कृति

यह स्केच मई १९८८ में मैंने बनाया था। इसमें मैंने ब्रम्हा ,विष्णु और महेश तीनो को कर्ता के रूप में प्रतिरूपित कर उसकी कृति को उसी में समाहित कर दर्शाने की कोशिश की है।

-निहार, मई १९८८.

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

हरी आँख का समंदर

(वर्ष १९८८,मई की तपती धूप और उनकी याद..बस खींच दी कागज पे चाँद लकीरें और लिख दी दिल की बात यूँ एक कविता के रूप में जो आपके लिए नीचे प्रस्तुत है।)
सपनो की चादर ओढ़ जब भी सोता हूँ -
तुम्हारे बदन की गर्मी मुझे नहलाती है,
दिन भर की थकान हवा में गुम हो जाती है ,
बाल उड़ कर चेहरे से अठखेलियाँ करते हैं ,
आँख के आंसू वाष्प बन तिरोहित हो जाते हैं,
कई दिनों की गुम हंसी वापिस लौट आती है।
पर, मेरे हाथ ज्यूँही तुम्हे पकड़ने को होते हैं ,
आँखें खुल जाती हैं और सब कुछ शांत हो जाता है,
दाढ़ी की चुभन खुद ही हाथों में काँटों सी फंसती है,
आँखें भीतर तक शर्म-ओ-हया के गर्त में धंसती है,
वो जो सपनो का दौर था - ठाठें मारता है मेरे अन्दर,
सूख जाता है बस यूँ ही मेरे मन का वो हरा समंदर,
न कुछ बाहर बचता है और न ही कुछ बचता है अन्दर।
सिर्फ और सिर्फ एक बे आवाज़ खामुशी होती है,
सिर्फ और सिर्फ एक पसरा हुआ सन्नाटा होता है,
सिर्फ और सिर्फ मेरा क्रंदन कहीं चुपके से दस्तक देता है....
मुझे तुम्हारी आँखों का हरा समंदर बुलाता है...
- नीहार, मई १९८८

' द ट्रिनिटी '

यह चित्र वर्ष १९८८ में फुर्सत के उन क्षणों में बनाया गया था जब मेरे लिए ब्रह्मा विष्णु और महेश यानि की पूरी सृस्ती एक आकार में ही समाहित थी..मैंने कोशिश की है, की तीनो प्रमुख देवताओं को सांकेतिक रूप से ही सही यहाँ इस चित्र में ढाल एकाकार कर दूँ...
(नीहार, १९८८)