
अपने विषय में क्या कहूँ....लिखना मुझे अच्छा लगता है...लिखता हूँ क्यूंकि जीता हूँ...
मंगलवार, 19 जनवरी 2010
भांति भांति के गणेश
ये सारे गणपति के स्केच मैंने फुर्सत के उन क्षणों में उकेरा था जब मेरे पास मेरे सोच, विचार और कल्पना शील मानस का साथ मेरी उँगलियाँ दिया करती थी और मैं हाई टेक पेन उठा किसी भी कागज़ पर या विजिटिंग कार्ड्स पर चित्र उकेर दिया करता था....उम्मीद है, आपको ये पसंद आएगा। फोटो की क्वालिटी के लिए माफ़ी चाहूँगा । - निहार


रविवार, 17 जनवरी 2010
तुम्हारी याद
यूं मुझको याद आती है तुम्हारी ,
ज्यूं सर्दियों की धुप में जैसे खुमारी,
जैसे किसी मासूम की कोमल हँसी,
जैसे किसी नवजात की बस किलकारी ।
जैसे किसी झरने ने गाया एक तराना,
जैसे कोई बारिश बरस जाये सुहाना,
जैसे भवरें गुंजायमान हों बाग़ में,
जैसे रंग बिरंगे फूलों से पट जाए फुलवारी।
जैसे धरती पर उतर आये कोई काली घटा,
जैसे बिखर जाए चन्दन की मादक गंध ज्यूँ,
जैसे मचल जाए सागर बिना पूरे चाँद के,
जैसे धरती पर की गयी हो चित्रकारी।
यूँ मुझको रोज़ आती है याद तुम्हारी.....
छा जाती है ज्यूँ मुझ पर कोई खुमारी ।
- निहार
ज्यूं सर्दियों की धुप में जैसे खुमारी,
जैसे किसी मासूम की कोमल हँसी,
जैसे किसी नवजात की बस किलकारी ।
जैसे किसी झरने ने गाया एक तराना,
जैसे कोई बारिश बरस जाये सुहाना,
जैसे भवरें गुंजायमान हों बाग़ में,
जैसे रंग बिरंगे फूलों से पट जाए फुलवारी।
जैसे धरती पर उतर आये कोई काली घटा,
जैसे बिखर जाए चन्दन की मादक गंध ज्यूँ,
जैसे मचल जाए सागर बिना पूरे चाँद के,
जैसे धरती पर की गयी हो चित्रकारी।
यूँ मुझको रोज़ आती है याद तुम्हारी.....
छा जाती है ज्यूँ मुझ पर कोई खुमारी ।
- निहार
शनिवार, 16 जनवरी 2010
नाद ध्वनि
(ये कवितायेँ मैंने वर्ष १९८८ और १९९० के बीच लिखी थी..मेरे विद्रोही तेवर उस वक़्त भी मेरी लेखनी को प्रभावित किये हुए थे और मैं चाह कर भी रोमांटिक नहीं हो पा रहा था...रोमांटिक कविताओं में भी कहीं एक आक्रोश दिखेगा, जिस से निजात पाने में मुझे कई वर्ष लग गए...)
**********************************************
जब भी कुछ लिखना चाहता हूँ,
मेरे भीतर कुछ खुदबुदाता है ,
कुछ कुरेदता है मेरे दिल को ,
नाखुनो में भरी मिटटी नम / गीली होती है।
शायद,
निर्माण की क्रिया अभी अधूरी है,
शायद,
निर्माण की प्रक्रिया चल रही है,
शायद........शायद ....शायद,
और, इस निर्माण - प्रतिनिर्मान - पुनर्निर्माण की क्रिया - प्रक्रिया में,
उलझता रहा मन,
घूमता रहा नदी , जंगल , पहार और वन
पर मिला कुछ भी नहीं - कहीं भी नहीं -
ना ही शान्ति ... ना ही क्रान्ति ....
मिली भी तो .......
सिर्फ और सिर्फ ..... भ्रान्ति !
****************************************************************
जिंदगी -
कुछ मकसद तो है....
क्या?
जीना? - या कुछ करना?
जीना - तो फिर किसके लिए?
और करना - तो क्या?
दरअसल - इन्ही बेमानी सवालों के चक्रव्यूह में,
फंसे फंसे हम -
अपनी जिंदगी का अर्थ खो देते हैं , और
हमें पता तक नहीं चलता।
अंधे सवालों और बहरे जवाबों के बीच की दूरी ही ,
हमारी वास्तविक लाचारी है - मजबूरी है ,
और हमें उस से हर हाल में बचना होगा ,
जीने की खातिर, रोज़ एक नया ढोंग रचना होगा।
***********************************************
मैं,
एक दिन राख हो जाऊँगा शमशान में -
या, गार दिया जाऊँगा कब्रिस्तान में -
या, किसी ऊंची मीनार पर रख दिया जाऊँगा,
ताकि मरने के बाद भी मैं काम आ सकूँ -
उन पक्षियों के, जो मुझे पचा सकें ।
पर,
फिर भी मैं जीवित रहूँगा....
एक एहसास बन, उन दिलों में ,
जिन्हें मैंने प्यार किया था।
अल्फाज़ बन उन होठों पे,
जिन्हें मैंने चूमा था।
यादगार बन उन फिजाओं में,
जहाँ मेरी साँसे घुलती थी , और
याद बन फिर घुलती रहेगी।
दुनिया, पहले भी बस्ती थी,
अब भी बस्ती है , और कल भी बसेगी।
***********************************(आगे जारी रहेगी प्रस्तुति.कृपया प्रतीक्षा करें)
**********************************************
जब भी कुछ लिखना चाहता हूँ,
मेरे भीतर कुछ खुदबुदाता है ,
कुछ कुरेदता है मेरे दिल को ,
नाखुनो में भरी मिटटी नम / गीली होती है।
शायद,
निर्माण की क्रिया अभी अधूरी है,
शायद,
निर्माण की प्रक्रिया चल रही है,
शायद........शायद ....शायद,
और, इस निर्माण - प्रतिनिर्मान - पुनर्निर्माण की क्रिया - प्रक्रिया में,
उलझता रहा मन,
घूमता रहा नदी , जंगल , पहार और वन
पर मिला कुछ भी नहीं - कहीं भी नहीं -
ना ही शान्ति ... ना ही क्रान्ति ....
मिली भी तो .......
सिर्फ और सिर्फ ..... भ्रान्ति !
****************************************************************
जिंदगी -
कुछ मकसद तो है....
क्या?
जीना? - या कुछ करना?
जीना - तो फिर किसके लिए?
और करना - तो क्या?
दरअसल - इन्ही बेमानी सवालों के चक्रव्यूह में,
फंसे फंसे हम -
अपनी जिंदगी का अर्थ खो देते हैं , और
हमें पता तक नहीं चलता।
अंधे सवालों और बहरे जवाबों के बीच की दूरी ही ,
हमारी वास्तविक लाचारी है - मजबूरी है ,
और हमें उस से हर हाल में बचना होगा ,
जीने की खातिर, रोज़ एक नया ढोंग रचना होगा।
***********************************************
मैं,
एक दिन राख हो जाऊँगा शमशान में -
या, गार दिया जाऊँगा कब्रिस्तान में -
या, किसी ऊंची मीनार पर रख दिया जाऊँगा,
ताकि मरने के बाद भी मैं काम आ सकूँ -
उन पक्षियों के, जो मुझे पचा सकें ।
पर,
फिर भी मैं जीवित रहूँगा....
एक एहसास बन, उन दिलों में ,
जिन्हें मैंने प्यार किया था।
अल्फाज़ बन उन होठों पे,
जिन्हें मैंने चूमा था।
यादगार बन उन फिजाओं में,
जहाँ मेरी साँसे घुलती थी , और
याद बन फिर घुलती रहेगी।
दुनिया, पहले भी बस्ती थी,
अब भी बस्ती है , और कल भी बसेगी।
***********************************(आगे जारी रहेगी प्रस्तुति.कृपया प्रतीक्षा करें)
मंगलवार, 5 जनवरी 2010
विघ्न हर्ता
विखंडित
वक्रतुंड
माँ काली
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

























