यूं मुझको याद आती है तुम्हारी ,
ज्यूं सर्दियों की धुप में जैसे खुमारी,
जैसे किसी मासूम की कोमल हँसी,
जैसे किसी नवजात की बस किलकारी ।
जैसे किसी झरने ने गाया एक तराना,
जैसे कोई बारिश बरस जाये सुहाना,
जैसे भवरें गुंजायमान हों बाग़ में,
जैसे रंग बिरंगे फूलों से पट जाए फुलवारी।
जैसे धरती पर उतर आये कोई काली घटा,
जैसे बिखर जाए चन्दन की मादक गंध ज्यूँ,
जैसे मचल जाए सागर बिना पूरे चाँद के,
जैसे धरती पर की गयी हो चित्रकारी।
यूँ मुझको रोज़ आती है याद तुम्हारी.....
छा जाती है ज्यूँ मुझ पर कोई खुमारी ।
- निहार
अपने विषय में क्या कहूँ....लिखना मुझे अच्छा लगता है...लिखता हूँ क्यूंकि जीता हूँ...
रविवार, 17 जनवरी 2010
शनिवार, 16 जनवरी 2010
नाद ध्वनि
(ये कवितायेँ मैंने वर्ष १९८८ और १९९० के बीच लिखी थी..मेरे विद्रोही तेवर उस वक़्त भी मेरी लेखनी को प्रभावित किये हुए थे और मैं चाह कर भी रोमांटिक नहीं हो पा रहा था...रोमांटिक कविताओं में भी कहीं एक आक्रोश दिखेगा, जिस से निजात पाने में मुझे कई वर्ष लग गए...)
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जब भी कुछ लिखना चाहता हूँ,
मेरे भीतर कुछ खुदबुदाता है ,
कुछ कुरेदता है मेरे दिल को ,
नाखुनो में भरी मिटटी नम / गीली होती है।
शायद,
निर्माण की क्रिया अभी अधूरी है,
शायद,
निर्माण की प्रक्रिया चल रही है,
शायद........शायद ....शायद,
और, इस निर्माण - प्रतिनिर्मान - पुनर्निर्माण की क्रिया - प्रक्रिया में,
उलझता रहा मन,
घूमता रहा नदी , जंगल , पहार और वन
पर मिला कुछ भी नहीं - कहीं भी नहीं -
ना ही शान्ति ... ना ही क्रान्ति ....
मिली भी तो .......
सिर्फ और सिर्फ ..... भ्रान्ति !
****************************************************************
जिंदगी -
कुछ मकसद तो है....
क्या?
जीना? - या कुछ करना?
जीना - तो फिर किसके लिए?
और करना - तो क्या?
दरअसल - इन्ही बेमानी सवालों के चक्रव्यूह में,
फंसे फंसे हम -
अपनी जिंदगी का अर्थ खो देते हैं , और
हमें पता तक नहीं चलता।
अंधे सवालों और बहरे जवाबों के बीच की दूरी ही ,
हमारी वास्तविक लाचारी है - मजबूरी है ,
और हमें उस से हर हाल में बचना होगा ,
जीने की खातिर, रोज़ एक नया ढोंग रचना होगा।
***********************************************
मैं,
एक दिन राख हो जाऊँगा शमशान में -
या, गार दिया जाऊँगा कब्रिस्तान में -
या, किसी ऊंची मीनार पर रख दिया जाऊँगा,
ताकि मरने के बाद भी मैं काम आ सकूँ -
उन पक्षियों के, जो मुझे पचा सकें ।
पर,
फिर भी मैं जीवित रहूँगा....
एक एहसास बन, उन दिलों में ,
जिन्हें मैंने प्यार किया था।
अल्फाज़ बन उन होठों पे,
जिन्हें मैंने चूमा था।
यादगार बन उन फिजाओं में,
जहाँ मेरी साँसे घुलती थी , और
याद बन फिर घुलती रहेगी।
दुनिया, पहले भी बस्ती थी,
अब भी बस्ती है , और कल भी बसेगी।
***********************************(आगे जारी रहेगी प्रस्तुति.कृपया प्रतीक्षा करें)
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जब भी कुछ लिखना चाहता हूँ,
मेरे भीतर कुछ खुदबुदाता है ,
कुछ कुरेदता है मेरे दिल को ,
नाखुनो में भरी मिटटी नम / गीली होती है।
शायद,
निर्माण की क्रिया अभी अधूरी है,
शायद,
निर्माण की प्रक्रिया चल रही है,
शायद........शायद ....शायद,
और, इस निर्माण - प्रतिनिर्मान - पुनर्निर्माण की क्रिया - प्रक्रिया में,
उलझता रहा मन,
घूमता रहा नदी , जंगल , पहार और वन
पर मिला कुछ भी नहीं - कहीं भी नहीं -
ना ही शान्ति ... ना ही क्रान्ति ....
मिली भी तो .......
सिर्फ और सिर्फ ..... भ्रान्ति !
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जिंदगी -
कुछ मकसद तो है....
क्या?
जीना? - या कुछ करना?
जीना - तो फिर किसके लिए?
और करना - तो क्या?
दरअसल - इन्ही बेमानी सवालों के चक्रव्यूह में,
फंसे फंसे हम -
अपनी जिंदगी का अर्थ खो देते हैं , और
हमें पता तक नहीं चलता।
अंधे सवालों और बहरे जवाबों के बीच की दूरी ही ,
हमारी वास्तविक लाचारी है - मजबूरी है ,
और हमें उस से हर हाल में बचना होगा ,
जीने की खातिर, रोज़ एक नया ढोंग रचना होगा।
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मैं,
एक दिन राख हो जाऊँगा शमशान में -
या, गार दिया जाऊँगा कब्रिस्तान में -
या, किसी ऊंची मीनार पर रख दिया जाऊँगा,
ताकि मरने के बाद भी मैं काम आ सकूँ -
उन पक्षियों के, जो मुझे पचा सकें ।
पर,
फिर भी मैं जीवित रहूँगा....
एक एहसास बन, उन दिलों में ,
जिन्हें मैंने प्यार किया था।
अल्फाज़ बन उन होठों पे,
जिन्हें मैंने चूमा था।
यादगार बन उन फिजाओं में,
जहाँ मेरी साँसे घुलती थी , और
याद बन फिर घुलती रहेगी।
दुनिया, पहले भी बस्ती थी,
अब भी बस्ती है , और कल भी बसेगी।
***********************************(आगे जारी रहेगी प्रस्तुति.कृपया प्रतीक्षा करें)
मंगलवार, 5 जनवरी 2010
विघ्न हर्ता
विखंडित
वक्रतुंड
माँ काली
सोमवार, 4 जनवरी 2010
तुम्हारी लटें, मेरा ख्याल और चाँद रात
उलझी लटों को आओ मैं संवार दूँ,आओ मैं जी भर के तुम्हे प्यार दूँ
तुम चाँद बन मेरा घर रोशन करो, मैं आसमान बन के तेरा सत्कार करूँ।
यूँ तो तुझसा है नहीं कोई सुन्दर यहाँ पर,फिर भी आ तेरा मैं नित नया श्रृंगार करूँ।
तेरे होठों पे सजा दूँ खुशबु-इ-गुलाब की,तेरी आँखों में नशा-इ-मोहब्बत उतार दूँ।
तेरी धरकनो को दूँ मैं प्यार का सरगम,तेरी साँसों को मैं चन्दन की खुमार दूँ।
प्यार दूँ,जी भर के तुझे मैं प्यार दूँ, तुझको तुझी से चुरा के मैं ,अपनी दुनिया संवार लूँ।
तुम मेरी धरकनो में गुम हो जाओ, मैं तुम्हारी कल्पना को एक नया आकार दूँ।
झरनों सा तुम मेरी जिंदगी में खिलखिलाओ, और मैं तुम्हे आकाश का फिर विस्तार दूँ।
खरगोश की नाज़ुकी लिए,फूलों की खुसबू लिए, बस तुम्हारे ही लिए मैं मौसम - ऐ - बहार दूँ।
तुमने खुद को जब कर दिया है अर्पण मुझे , मैं भला कैसे न फिर तुमको तुम्हारा निहार दूँ।
तुम चाँद बन मेरा घर रोशन करो, मैं आसमान बन के तेरा सत्कार करूँ।
यूँ तो तुझसा है नहीं कोई सुन्दर यहाँ पर,फिर भी आ तेरा मैं नित नया श्रृंगार करूँ।
तेरे होठों पे सजा दूँ खुशबु-इ-गुलाब की,तेरी आँखों में नशा-इ-मोहब्बत उतार दूँ।
तेरी धरकनो को दूँ मैं प्यार का सरगम,तेरी साँसों को मैं चन्दन की खुमार दूँ।
प्यार दूँ,जी भर के तुझे मैं प्यार दूँ, तुझको तुझी से चुरा के मैं ,अपनी दुनिया संवार लूँ।
तुम मेरी धरकनो में गुम हो जाओ, मैं तुम्हारी कल्पना को एक नया आकार दूँ।
झरनों सा तुम मेरी जिंदगी में खिलखिलाओ, और मैं तुम्हे आकाश का फिर विस्तार दूँ।
खरगोश की नाज़ुकी लिए,फूलों की खुसबू लिए, बस तुम्हारे ही लिए मैं मौसम - ऐ - बहार दूँ।
तुमने खुद को जब कर दिया है अर्पण मुझे , मैं भला कैसे न फिर तुमको तुम्हारा निहार दूँ।
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