सोमवार, 4 जनवरी 2010

तुम्हारी लटें, मेरा ख्याल और चाँद रात

उलझी लटों को आओ मैं संवार दूँ,आओ मैं जी भर के तुम्हे प्यार दूँ
तुम चाँद बन मेरा घर रोशन करो, मैं आसमान बन के तेरा सत्कार करूँ।
यूँ तो तुझसा है नहीं कोई सुन्दर यहाँ पर,फिर भी आ तेरा मैं नित नया श्रृंगार करूँ।
तेरे होठों पे सजा दूँ खुशबु-इ-गुलाब की,तेरी आँखों में नशा-इ-मोहब्बत उतार दूँ।
तेरी धरकनो को दूँ मैं प्यार का सरगम,तेरी साँसों को मैं चन्दन की खुमार दूँ।
प्यार दूँ,जी भर के तुझे मैं प्यार दूँ, तुझको तुझी से चुरा के मैं ,अपनी दुनिया संवार लूँ।
तुम मेरी धरकनो में गुम हो जाओ, मैं तुम्हारी कल्पना को एक नया आकार दूँ।
झरनों सा तुम मेरी जिंदगी में खिलखिलाओ, और मैं तुम्हे आकाश का फिर विस्तार दूँ।
खरगोश की नाज़ुकी लिए,फूलों की खुसबू लिए, बस तुम्हारे ही लिए मैं मौसम - ऐ - बहार दूँ।
तुमने खुद को जब कर दिया है अर्पण मुझे , मैं भला कैसे न फिर तुमको तुम्हारा निहार दूँ।

रविवार, 3 जनवरी 2010



तुम्हारी आँख के समंदर में डूब जाता हूँ,

दिन रात बस तुम्हारे ही गीत मीन गुनगुनाता हूँ।

जब यादों की तपती धूप झुलसाने लगती है हमें,

राहत-ऐ -जान के लिए अपनी आँखों से सावन बरसाता हूँ।

तेरी जुल्फों से चुरा लाता हूँ घनी काली बदलियाँ मैं ,

तेरे होठों पे गुलाब की मासूमिअत मैं सजाता हूँ,

मुझे ढूंढना चाहो तो झाँक लो दिल में अपने तुम,

मैं धरकनो की तरह तेरे दिल में ग़ुम सा हो जाता हूँ।

थक गए हो तो चलो अपनी आँखें बूंद केर लो तुम,

मैं ख्वाब की तरह तेरी पलकों पे बिखर सा जाता हूँ।

तुम्ही को सोचूं, तुम्ही को लिक्खूं, तुम्ही में रंग भरूँ,

बस तुम ही तुम को मैं हर पल अपने करीब पाता हूँ।

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मुझको एक रात उधार दे दो,अपनी साँसों का उपहार दे दो।
मैं ढून्ढ रहा तुमको इस बेजुबान शेहेर में दिन रात,
तुम कहीं से दौर के आओ और मुझे अपना दीदार दे दो।
यूँ तो हेर मौसम में आज कल खिल जाते हैं फूल ,
तुम आके उन् फूलों को रंगत-ऐ -बहार दे दो।
कभी बादल, कभी चाँद, कभी टिमटिमाते तारों सा,
मेरे जीवन को आ के तुम एक नया श्रृंगार दे दो।
मेरे ह्रदय की धरकनो में रच जाओ किसी गीत की तरह,
मेरे मानस को छू के तुम एक पवित्र विचार दे दो।
जो साथ है मेरे वो तुम्हारा अक्स है मेरी जानम,
जो है तुम्हारे पास उस का नाम निहार दे दो।
इस जनम या उस जनम या हर जनम के वास्ते,
अपने आप का मुझे तुम एक अप्रतिम उपहार दे दो।

कभी कभी यूँ ही बस .......

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है ,
की तू है तो ज़मीन है तू है तो आसमान है,
तू है तो मुझपर खुदा हर वक़्त मेहेरबान है।
जो तू नहीं तो ऐ मेरी जान ऐ अदा ये जान ले तू,
जिंदगी बीच समंदर में उठा एक तूफ़ान है ।
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उनके ख्याल आये तो आये चले गए,
उनको सोच के गीत गाये चले गए।
उनकी आँखों के समंदर में कुछ इस तरह डूबे,
की जिन्दगीका लुत्फ़ जिनगी भर उठाये चले गए।
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तेरे होठों पे सजा दूँ गुलाब की लाली,
तेरी जुल्फों में उतार दूँ रात काली काली,
तेरे गालों को जो चूम के आयी है हवा,
वो बन गयी है मेरे हेर मर्ज़ की दवा।
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एक बार तो मेरे सीने से आके लग जाओ तुम,
एक बार तो मेरी सोचों मेतुम हो जाओ गूम,
एक बार तो यादों की बारिश को बरस जाने दो,
एक बार तो अपनी आँख से मोती टपक जाने दो।
एक बार तो कह दो की मेरे बिना सब सूना है,
एक बार तो मुझको यूँ ख्वाब में आ रुलाने दो।
एक बार तो अपने दिल को धरकने दो अपने नाम से,
एक बार अपनी साँसों को मेरी सांस से महक जाने दो।
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अकेलापन और तुम्हारी आह्ट

जब अकेलापन बहुत सताता है,मुझको खुद की तस्वीर वो दिखता है।
आईना जब भी मुझसे बात करे,मेरे अन्दर कुछ दरक सा जाता है।
कुछ हवा में अनमनी सी चाह जगे, कभी मैं सिरहाने तेरी चाप सुनु,
कभी बेसाख्ता अपने होठों पे, तेरे नाम की हरवक्त मैं सरगम धुनु,
कभी आकाश में पाखि सा उड़ जाए मन, कभी घुमु तेरी जुल्फों के वन ,
कभी बस चुपचाप तेरे कानो में, छोर जाऊं मैं बस अपना ही क्रंदन।
जिस तरह सावन में झमझम बरसे बादल, जिस तरह पत्ते भींगे पेड़ के,
बस उस तरह मन मेरा बन बावरा, भीग भीग जाए बस तुम्हारे प्यार में।
चलो अब नींद से जगा दो मुझको,एक बार तो सीने से लग जाओ तुम,
एक बार मुझे भर लो अपनी साँसों में, एक बार धरकनो में हो जाओ गूम।







शुक्रवार, 29 मई 2009

मुझे तुम याद आते हो.....

मुझे तुम याद आते हो....
सुबह जब रौशनी छन कर फूलों पे बरसती है,
सुबह ओ़सकी बूंदों में एक शबनम तरपती है,
सुबह कोयल के गले से जब वीरह के गीत सुनता हूँ,
मैं अपनी धरकनो में उस वक्त तुम्हारे ख्वाब बुनता हूँ...
मुझे तुम याद आते हो...बहुत तुम याद आते हो.....
दोपहर की तपती धुप जब मुझको सहलाती है,
बहती हुयी पुरवाई जब मुझे दुलराती है ,
कीसी पायल की खान खान से जब मुझे कोई बुलाता है ,
मधुर संगीत की धुन पर जब कोई गीत गाता है,
मुझे तुम याद आते हो...अक्सर याद आते हो.
शाम में जब कोई चीरागोन को जलाता है,
दीन के थके पखेरुओं को जब कोई लोरी सुनाता है,
जब कीसी घुंघरु की खनक से मन को दुलराता है,
चांदनी में गूँथ के कोई तेरी खुशबु ले आता है,
मुझे तुम याद आते हो...बहुत तुम याद आते हो...

गुरुवार, 29 जनवरी 2009

यादों की तरह आके रुलाते क्यूँ नहीं,
मौसम की तरह मुझ पर छाते क्यूँ नही।
मैं तेरे सपनो में खो जाता हूँ हर घरी जानम,
उन् सपनो में ख़ुद को तुम पाते क्यूँ नहीं।
जिस तरह बिजुर्गों को नहीं छोरती है खांसी,
उस तरह तुम भी मुझे हो सताते क्यूँ नहीं.
वो जो एक गीत लिखा था मैंने तेरी ही खातिर,
उस गीत को मेरे लिए तुम फ़िर गाते क्यूँ नहीं।
मुझे देख देख बचपन में जो गुलाबी थे होते,
अब देख के मुझको तुम हो लजाते क्यूँ नहीं।
मैंने तुम्हे रक्खा है पलकों पे आंसू की तरह
तुम भी मुझे आँख में आंसू सा लाते क्यूँ नहीं।
मैंने तुझे पाया है अपने खुदा से नेमत में,
तुम भी मुझे अपनी दुआओं में पाते क्यूँ नहीं।