जब अकेलापन बहुत सताता है,मुझको खुद की तस्वीर वो दिखता है।
आईना जब भी मुझसे बात करे,मेरे अन्दर कुछ दरक सा जाता है।
कुछ हवा में अनमनी सी चाह जगे, कभी मैं सिरहाने तेरी चाप सुनु,
कभी बेसाख्ता अपने होठों पे, तेरे नाम की हरवक्त मैं सरगम धुनु,
कभी आकाश में पाखि सा उड़ जाए मन, कभी घुमु तेरी जुल्फों के वन ,
कभी बस चुपचाप तेरे कानो में, छोर जाऊं मैं बस अपना ही क्रंदन।
जिस तरह सावन में झमझम बरसे बादल, जिस तरह पत्ते भींगे पेड़ के,
बस उस तरह मन मेरा बन बावरा, भीग भीग जाए बस तुम्हारे प्यार में।
चलो अब नींद से जगा दो मुझको,एक बार तो सीने से लग जाओ तुम,
एक बार मुझे भर लो अपनी साँसों में, एक बार धरकनो में हो जाओ गूम।
अपने विषय में क्या कहूँ....लिखना मुझे अच्छा लगता है...लिखता हूँ क्यूंकि जीता हूँ...
रविवार, 3 जनवरी 2010
शुक्रवार, 29 मई 2009
मुझे तुम याद आते हो.....
मुझे तुम याद आते हो....
सुबह जब रौशनी छन कर फूलों पे बरसती है,
सुबह ओ़सकी बूंदों में एक शबनम तरपती है,
सुबह कोयल के गले से जब वीरह के गीत सुनता हूँ,
मैं अपनी धरकनो में उस वक्त तुम्हारे ख्वाब बुनता हूँ...
मुझे तुम याद आते हो...बहुत तुम याद आते हो.....
दोपहर की तपती धुप जब मुझको सहलाती है,
बहती हुयी पुरवाई जब मुझे दुलराती है ,
कीसी पायल की खान खान से जब मुझे कोई बुलाता है ,
मधुर संगीत की धुन पर जब कोई गीत गाता है,
मुझे तुम याद आते हो...अक्सर याद आते हो.
शाम में जब कोई चीरागोन को जलाता है,
दीन के थके पखेरुओं को जब कोई लोरी सुनाता है,
जब कीसी घुंघरु की खनक से मन को दुलराता है,
चांदनी में गूँथ के कोई तेरी खुशबु ले आता है,
मुझे तुम याद आते हो...बहुत तुम याद आते हो...
सुबह जब रौशनी छन कर फूलों पे बरसती है,
सुबह ओ़सकी बूंदों में एक शबनम तरपती है,
सुबह कोयल के गले से जब वीरह के गीत सुनता हूँ,
मैं अपनी धरकनो में उस वक्त तुम्हारे ख्वाब बुनता हूँ...
मुझे तुम याद आते हो...बहुत तुम याद आते हो.....
दोपहर की तपती धुप जब मुझको सहलाती है,
बहती हुयी पुरवाई जब मुझे दुलराती है ,
कीसी पायल की खान खान से जब मुझे कोई बुलाता है ,
मधुर संगीत की धुन पर जब कोई गीत गाता है,
मुझे तुम याद आते हो...अक्सर याद आते हो.
शाम में जब कोई चीरागोन को जलाता है,
दीन के थके पखेरुओं को जब कोई लोरी सुनाता है,
जब कीसी घुंघरु की खनक से मन को दुलराता है,
चांदनी में गूँथ के कोई तेरी खुशबु ले आता है,
मुझे तुम याद आते हो...बहुत तुम याद आते हो...
गुरुवार, 29 जनवरी 2009
यादों की तरह आके रुलाते क्यूँ नहीं,
मौसम की तरह मुझ पर छाते क्यूँ नही।
मैं तेरे सपनो में खो जाता हूँ हर घरी जानम,
उन् सपनो में ख़ुद को तुम पाते क्यूँ नहीं।
जिस तरह बिजुर्गों को नहीं छोरती है खांसी,
उस तरह तुम भी मुझे हो सताते क्यूँ नहीं.
वो जो एक गीत लिखा था मैंने तेरी ही खातिर,
उस गीत को मेरे लिए तुम फ़िर गाते क्यूँ नहीं।
मुझे देख देख बचपन में जो गुलाबी थे होते,
अब देख के मुझको तुम हो लजाते क्यूँ नहीं।
मैंने तुम्हे रक्खा है पलकों पे आंसू की तरह
तुम भी मुझे आँख में आंसू सा लाते क्यूँ नहीं।
मैंने तुझे पाया है अपने खुदा से नेमत में,
तुम भी मुझे अपनी दुआओं में पाते क्यूँ नहीं।
मौसम की तरह मुझ पर छाते क्यूँ नही।
मैं तेरे सपनो में खो जाता हूँ हर घरी जानम,
उन् सपनो में ख़ुद को तुम पाते क्यूँ नहीं।
जिस तरह बिजुर्गों को नहीं छोरती है खांसी,
उस तरह तुम भी मुझे हो सताते क्यूँ नहीं.
वो जो एक गीत लिखा था मैंने तेरी ही खातिर,
उस गीत को मेरे लिए तुम फ़िर गाते क्यूँ नहीं।
मुझे देख देख बचपन में जो गुलाबी थे होते,
अब देख के मुझको तुम हो लजाते क्यूँ नहीं।
मैंने तुम्हे रक्खा है पलकों पे आंसू की तरह
तुम भी मुझे आँख में आंसू सा लाते क्यूँ नहीं।
मैंने तुझे पाया है अपने खुदा से नेमत में,
तुम भी मुझे अपनी दुआओं में पाते क्यूँ नहीं।
बुधवार, 7 जनवरी 2009
नए साल की नयी सुबह का पहला सलाम....तेरे ही नाम...
नए साल की नयी सुबह का पहला सलाम भेजूं,कोयल की मीठी तान चुरा प्यार का पैगाम भेजूं।
महकती फूल से चुरा कर उस्सकी भीनी सी खुशबु,
हवाओं में उसकी खुशबु घोल बस तेरे ही नाम भेजूं।
गुल भेजूं गुलशन भेजूं और गुल-ऐ-गुलफाम भेजूं,
सागर भेजूं, दरिया भेजूं और जंगल तमाम भेजूं।
नगर भेजूं,क़स्बा भेजूं पूरा का पूरा गाम भेजूं,
सुबह भेजूं,दोपहर भेजूं, मयकश ये शाम भेजूं।
बसंत भेजूं, पावस भेजूं,सावन का जाम भेजूं,
जारे की धुप, गर्मी की बयार,बारिश झमाम भेजूं।
जो भी है मेरे पास वो चीज़ें सर- ऐ-आम भेजूं,
दिल भेजूं, जिगर भेजूं, अपनी साँसे तमाम भेजूं।
मंगलवार, 9 दिसंबर 2008
आँख से जो टपका वो लहू रहा होगा,कतरा कतरा दिल से निकल बहा होगा।
जब दर्द बहुत हुआ होगा हमको, उसने अपनी भीगी पलकों से हमें छुआ होगा।
दूर और दूर कहीं शब् के सन्नाटे में, उसने तकिये को अपनी बाहों में लिया होगा।
याद में मेरी जो भर आयी होंगी आँखें, उन आंसुओं को चुपचाप उसने पिया होगा।
चाँद जब रात को बादलों से निकला होगा,उसने यादों की चादर ओढ़ लिया होगा।
मैं हूँ ,यहीं हूँ और पास ही हूँ उसके, अपने दिल को ये तसल्ली उसने दे दिया होगा।
उसकी रातें कभी वीरान नही होती, उसने ख़ुद को मेरी खुशबु में भिगो दिया होगा।
शज़र उदास होंगे मगर चिरिया नही गुमसुम,मेरे गीत उनको उसने सुना दिया होगा.....
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दर्द की बात नही करता हूँ
मैं दवा बन के उभरता हूँ।
आँख में काजल सा तेरे ,
सुबह शाम मैं संवारता हूँ।
होठों पे अश्क बन फिसलता हूँ,
फ़िर मोतियों सा मैं बिखरता हूँ।
गालों पे तेरे गुलाब की रंगत,
बादलों सा तेरी जुल्फों में उतरता हूँ...
तेरी आंखों से चुरा काजल की लकीर,
रात बन कर मैं ख़ुद ही निखरता हूँ।
तू समंदर की शोखी ले मचलती है,
मैं दरिया हूँ,तुझमे उतरता जाता हूँ....
शनिवार, 6 दिसंबर 2008
कोई तो गीत गाओ की अब चैन पड़े
कोई तो गीत गाओ की अब चैन पड़े,
कोई धुन गुनगुनाओ की अब चैन पड़े.
रास्ते से गुजर नहीं ,राह भी आसान नहीं ,
तुम साथ आओ में तो फिर अब चैन पड़े।
वो झुकी नज़र में तेरे प्यार की खुमारी थी,
उस एहसास को फ़िर ले आओ की अब चैन पड़े।
मुद्दतें हुयी हैं तुम को जी भर के देखे हुए ,
फ़िर आ के दरस दिखाओ की अब चैन पड़े।
वो मेरी साँसों में छुपी खुशबु तेरे प्यार की,
उस खुशबु से मुझे नहलाओ की अब चैन पड़े ।
खुदा की तलाश में घुमते हैं दर-बा-दर ,
कभी आके मुझे मिल भी जाओ की अब चैन पड़े।
कोई धुन गुनगुनाओ की अब चैन पड़े.
रास्ते से गुजर नहीं ,राह भी आसान नहीं ,
तुम साथ आओ में तो फिर अब चैन पड़े।
वो झुकी नज़र में तेरे प्यार की खुमारी थी,
उस एहसास को फ़िर ले आओ की अब चैन पड़े।
मुद्दतें हुयी हैं तुम को जी भर के देखे हुए ,
फ़िर आ के दरस दिखाओ की अब चैन पड़े।
वो मेरी साँसों में छुपी खुशबु तेरे प्यार की,
उस खुशबु से मुझे नहलाओ की अब चैन पड़े ।
खुदा की तलाश में घुमते हैं दर-बा-दर ,
कभी आके मुझे मिल भी जाओ की अब चैन पड़े।
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