गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

मैं और मेरा एहसास.....

मैं -
एक दिन राख हो जाऊँगा श्मशान में -
या, गाड दिया जाऊँगा कब्रिस्तान में -
या, किसी ऊंची मीनार पे रख दिया जाऊँगा,
ताकि मरने के बाद भी मैं काम आ सकूँ,
उन पक्षियों के , जो मुझे पचा सकें।
पर, -
फिर भी, मैं जीवित रहूँगा -
एक एहसास बन, उन दिलों में -
जिन्हें मैंने प्यार किया था।
एक अलफ़ाज़ बन, उन होठों पे -
जिन्हें मैंने चूमा था।
यादगार बन , उन फिजाओं में -
जहाँ मेरी सांस घुला करती थी -
और(याद बन) घुलती रहेगी।
दुनिया पहले भी बसती थी-
अब भी बसती है -
और, कल भी बसेगी।

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शून्य हूँ - या कुछ और -
कह नहीं पाता।
मन ही मन रह जाता है अव्यक्त -
कुछ कुछ /कुछ न कुछ
जो भरा था - कब भरा था?
जो हरा था - कब हरा था?
पर जो डरा था - अब भी डरा है।
मन है की अब भी मारता है ठाठें,
तोड़ता है वह बाँधें -
कहता है क्यूँ बाँधें वह खुद को -
क्यूँ सहमे वह खुद से -
क्यूँ सहे वह अपना प्रहार / अपने से हार।
चुक जाऊँगा मैं / फुँक जाऊँगा मैं -
धीरे धीरे - आँखें मीडे -
चलते चलते रुक जाऊँगा मैं।
रुक जायेगी तब ये धरित्री -
रुक जायेगी चलती हवा भी -
रुक जाएगा सब चल अचल।
देह का पिंजर पड़ा सोता रहेगा ।
अश्रु अमृत चरण को धोता रहेगा। ।
और रहेगा शब्द होता - निःशब्द सा।
पारा पारा रात चांदी हो रहेगी।
स्वप्न आँखों में चुबे जो अश्रु बन कर,
धरती पर गिरते ही वो आग होंगे।
मूक मेरे स्वर कभी तो एक दिन,
किसी गन्धर्व या जोशी के गले के राग होंगे।
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मेरे भीतर एक स्वर्ग है -
और बाहर एक नरक का विस्तार।
दोनों के बीच एक मजबूत दरवाज़ा है -
मैं, उस दरवाज़े की चौखट पे खड़ा ,
स्वर्गी आनंद में आकंठ डूब -
नार्किक सौंदर्य का दृश्यावलोकन कर रहा हूँ।
और इसी अवस्था में -
ना जाने कब,मेरे पाँव दरवाज़ा पार कर -
अपनी स्वर्ग सी दुनिया से बाहर आ जाते हैं।
सच - स्वर्ग के बंद घटते एकांत से,
बेहतर है - भली है - नरक की खुली हवा।
-नीहार