मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

उनके जाने से मौसम रंगत बदल रहा है.

नम हुयी आँख मेरी और दिल बैठा जा रहा है,
या खुदा उनके जाने का दिन करीब आ रहा है।
घर आये तो रौशनी का झूमर खिल उठा जैसे,
उनके जाने का ख्याल मुझे अब खाए जा रहा है।
उनके क़दमों की आहट सुन बुलबुलें गाने लगी ,
उनके जाने की बात सुन कोई मर्सिया गा रहा है।
वो आये तो जैसे हवाओं में खुशबु सा छा गया है,
उनके जाने की सुन मौसम भी रंगत बदल रहा है।
जिंदगी में रौनक है उन्ही से औरहै उनसे खुशबू भी,
वो हैं तो सब है इस बात का एहसास वो दिला रहा है।
-नीहार

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