मेरे बारे में

मेरा फोटो
मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

निरर्थकता का रिश्ता

हो सकता है मैं तुमसे कुछ सवाल करूँ -
मुझमें अनंत जिज्ञासा है।
लेकिन मैं जानता हूँ - की जब तुम,
उत्तर देने लगोगे - तो मेरे दोनों कान बहरे हो जायेंगे -
तुम्हारे समाधान कुछ भी नहीं दे पायेंगे मुझे।
जो भी खोजना है - जो भी पाना है -
जो भी घटाना है और बढ़ाना है -
सिर्फ अपने तरीके से - अपने आप।
* * * *
आँखें आधी मूँद कर देखो -
तो लगता है तमाम चीजें हैं बरकरार -
आपस में उलझती जा रही हैं, पर -
टूटती फूटती नहीं।
एकाएक वर्तमान नुकीला हो अतीत को खोदने लगता है।
एक धुंध सी बहार - भीतर मंडराती है,
लेकिन -
कुछ होता नहीं - कुछ भी नहीं।
* * * *
जिंदगी भर आदमी -
अपने ही बंद दरवाज़े खोलता है,
और,
खोलकर देखता हुआ थकता है।
दूसरों के लिए अजूबा या निरर्थक -
किन्तु -
यह निरर्थकता का रिश्ता ही वास्तविक है -
जो बदलता नहीं।
- नीहार

1 टिप्पणियाँ:

  1. "आँखें आधी मूँद कर देखो -
    तो लगता है तमाम चीजें हैं बरकरार -
    आपस में उलझती जा रही हैं, पर -
    टूटती फूटती नहीं।"
    बहुत अच्छी लाईने हैं. पूरी कविता भी बहुत अच्छी लगी.
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं