मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

तुम हो तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...


तुमने कभी आँखों में नाचते हुए मोरे देखें हैं....नहीं न...देखना चाहोगी?आ जाओ...आ के मेरी आँखों के जंगल में झाँको....उफनते हुए दर्द के बादलों के झमाझम बरस जाते ही,मेरी आँखों में तुम्हारी यादों के मोर अपने पंख पसारे नाचने लगते हैं....
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...भींगा मन है और आँखों से होती बरसात है।
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खिड़की से बहार चाँद ज़र्द सा है...मनो किसी ने सूरज को पीला चादर उढ़ा दिया हो...तारे जुगनू बन जल बुझ रहे.....दरख्तों पे बर्फ धुनी रुई सी टंगी है....पत्ते सारे के सारे सिहर कर अपने आप में दुबके जा रहे....झील में तैरता रक्त कमल चन्द्र किरणों से अभिसार कर रहा...मेरे भीतर एक सूनापन घर कर जाता है...मुझे उस रक्त कमल में अपनी प्रियतमा के तप्त अधरों का प्रतिबिम्ब नज़र आता है....मैं बगल में रक्खे तकिये को सीने से लगा लेता हूँ....तुम मुझमे उतर जाती हो....
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है....कमरे का एकांत है और यादों की बारात है....

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मैं जानता हूँ मेरे लिए मुश्किल होगा तुम्हारे संवाद के बिना जीना...तुम्हारी आवाज़ न सुनू तो लगे जैसे जिंदगी जिया ही नहीं....तुम्हारी आँखों में जो न झाँकू तो समंदर भी सहरा सा लगे है...तुम्हारे बिना न तो कोयल गाती....न ही फूल खिलते हैं....न सागर ठाठें मारता है....और न ही हवाएं बहती हैं.....तुम्हारे बिना मेरी सांसें चलती नहीं बस एक बुझे हुए दिए की लौ की तरह थरथराती है......तुम्हारे बिना मेरी आवाज़ खामोश सी रहती है...दिन जलता हुआ अलाव और रात सर्द बर्फ सी......सूरज पिघल कर टपक जाता और चाँद जम जाता है....तुम नहीं तो जिंदगी थम सी जाती है....पर तुम्हारा ख्याल है की मुझे जिंदा रखता है....तुम्हारी बातों की खुशबु मुझे महकाती है...मैं इस उम्मीद में की तुम वापिस आओगी जिंदा रहूँगा......
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...तुम्हारी यादों के जंगल में मेरी जिंदगी से मुलाकात है...
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आँखें बंद कर लेता हूँ और तुमको छू लेता हूँ....मेरे भीतर एक ओस की बूँद मेरी प्यास को बुझाती सी बिखर जाती है....मेरी आँखें धुन्धलाई सी हैं शायद...तुम्हारी याद पलकों पे ठहर से गए हैं आंसुओं की तरह...ज़ज्ब कर लूँगा इन्हें मैं अपने भीतर.....तुम छत पे चले आना और माहताब सा खिल जाना.....मैं चाँद को आईना दिखाना चाहता हूँ। तुम जब पास होते हो तो शब् के सन्नाटे झरनों सा कल कल निनाद करने लगते हैं...सितारे कृष्ण की गोपियों सी रास रचाते और चन्द्र किरण अमृत घाट से रसवंती हो बह जाती. मैं तृप्त हो जाता उस रसवंती को पी और तुम मेरे कानो में गाती और मैं सो जाता...
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और खिली खिली सी धूप है...मेरी जागती आँखों में बस तुम्हारा ही रूप है...

-नीहार

रविवार, 12 दिसंबर 2010


तुम्हारी याद में ....


टपका जो फर्श पर ,

वो मोती लुटाई आँखों ने....

गूंजी जो सदा वो,

धडकनों में तुम्हारी चाप है ....

लिया जो सांस तो,

खुशबु तुम्हारी जुल्फों की...

महका मेरा जीवन,

क्यूंकि तू मेरे पास है...

तुम ही बताओ मैं कहाँ जाऊं तुम्हे छोड़कर...

खुशियों पे मेरा भी,

कुछ हक है....

जी उठता हूँ मैं तुमसे खुद को जोड़कर...

-नीहार

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वो मुझसे मिल कर घर गया होगा,

और फिर बिस्तर पे गिर गया होगा।

दिल उसका कब से भरा भरा होगा,

उसने रो कर तकिया भिगोया होगा।

ये मुलाकात आखरी मुलाकात हो ,

यह सोच कर वो चुप हो गया होगा ।

वो जानता है की उसके बिन शायद,

ये शख्स बिलकुल ही मर गया होगा।

देखता रहता है रात दिन उसकी तस्वीर,

उसकी जुल्फों में बादल सा हो गया होगा।

उसके होठों पे रख के उँगलियाँ अपनी,

वो खामोशियों में उसको सुन रहा होगा।

उसकी आदत हो चुकी है उसे अब हर पल,

आवारा सा हर जगह उसे ढूंढ रहा होगा ।

हर एक आहट पे अपने दरवाज़े पे आके ,

शब के सन्नाटों में उसको तलाशता होगा।

वो आएगा ,ज़रूर आएगा फिर लौट कर ,

उसने मन ही मन दिल से ये कहा होगा ।

आँखें उफनती सागर सी हैं उसकी और,

उसमे घुल कर वो काजल सा बह गया होगा,

थरथराते लब से उसका नाम लेकर फिर वो ,

खुद ही उसकी प्रतिध्वनि वो सुन रहा होगा ।

वो जानता है की उसके बिन जी नहीं पायेगा,

जीने के वास्ते यादों के फूल वो चुन रहा होगा।

वो शख्श तेरा दीवाना है अपने ही किस्म का ,

अपनी दीवानगी का किस्सा वो बुन रहा होगा।

-नीहार

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गुलों का रंग निखर गया होगा,

वो खुशबु बन कर बिखर गया होगा।

मैं ढूंढ रहा था उसे ना जाने कब से ,

मुझे ढूंढता वो इधर उधर गया होगा।

फूल ही फूल खिले होंगे हर उस राह पे,

वो मुस्कुराता हुआ जिधर गया होगा।

वो बिगड़ा हुआ दिलफेंक आवारा सा ,

उसकी सोहबत में वो सुधर गया होगा।

आज की रात बर्फ ही बर्फ है जमी हुयी ,

आज वो पिघल कर निखर गया होगा।

वो नीहार है रात भर चाँद से ढलकता है,

सुबह फूलों पे टूट वो बिखर गया होगा।

-नीहार

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शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

तुम हो तुम्हारा ख्याल है और .......

तुम हो,तुम्हारा ख्याल है और बर्फीली सी सुबह....
पहाड़ों से उतरती धूप ,
अलसाई हुयी सी है ।
रात की आँखों के आंसू अभी भी फूलों को नहलाये हुए हैं ,
पाखी अपने घोंसलों में दुबके हुए से हैं ।
हर तरफ सिर्फ एक ख़ामोशी है....
सर्द सी ....जर्द दी....बर्फ सी ....भींगी हुयी सी।
दुशाला ओढे हुए तुम्हारी यादों का मैं,
बंद आँखों से तेरी तस्वीर देख रहा ,
मौसम ए मोहब्बत की ताबीर देख रहा।
मंदिर में बजती घंटियों में तुम्हारी पाजेब की रुनझुन सुनाई देती है.....
ऐसा लगता है मुझे ,
की तुम मेरी साँसों के संतूर छेड़ रही।
मैं तुम्हें पूरी तरह महसूस रहा ....
तुम हो...मेरे वजूद में समायी हुयी सी,
मुझमे ही हो....तुम।
तुम हो,तुम्हारा ख्याल है और यमुना का तीर है....
कदम्ब की छांह,बंशी की धुन और मन हुआ फ़कीर है।
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तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...
आकाश की सूनी सड़क,
तारों की रोशन कतारें...
टिमटिमाते जुगनुओं की बारिश,और...
सामने वाले घर के मुंडेर से झांकता,
पीला पीला ज़र्द सा चाँद...
मनो अभी पाक कर तापाक जाएगा।
ख्वाब हैं की आँख में पंख ले चुके......
होठों पे आंसुओं का नमक बिखर सा गया....
एक चिराग कहीं पे जल रहा बुझ रहा...
और मेरे कानो में हवाओं ने,
चुपके से है ये कहा कि,
तुम यहीं हो....यहीं हो तुम,
मेरे पास....मुझमे उतरती हुयी...
मुझमे पिघलती हुयी....
मुझमे तुम्हारी धड़कने रवानगी पाती।
एक नदी है जो मेरे भीतर तुम्हारी तरह मचल रही...
तुम्हारे स्पर्श ने मुझे पारा कर दिया,और...
मैं चुपचाप अपनी आँखों से ढलक कर तुम्हारे होठों पे जज़्ब हो गया।
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और आँखें हैं पुरनम...
तुम्हारा चेहरा है मेरे हाथों में जैसे फूलों पे शबनम।
- नीहार

शनिवार, 20 नवंबर 2010

कुछ खुशबु जैसी बातें....(४)

यूँ तो मुख़्तसर सी बात है....की तू है,तेरा ख्याल है और चाँद रात है....
तेरी आँखों में जो लरजता है,वो कुछ नहीं बस प्यार है....मेरी आँखों में लरजता मेरे जीवन का ही सार है...धडकनें जो गीत गाती हैं रात दिन , उनमे महकती तेरी साँसों की खुशबु का विस्तार है...मैं तो फिरता था आकाश में सरफिरे बादल की तरह...तेरी जुल्फों में उलझ कर मिला मुझे मेरा संसार है...
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तुमने कभी आँखों में नाचते हुए मोर देखें हैं..नहीं न?देखना चाहोगी?...आ जाओ.....आके मेरी आँखों के जंगलों में झांको....उफनते हुए दर्द के बादलों के झमाझम बरस जाते ही ,मेरी आँखों में तुम्हारी यादों के मोर पंख पसारे नाचने लगते हैं...तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है.....मेरा भींगा सा मन है और आँखों से होती बरसात है।
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खिड़की से बहार चाँद ज़र्द सा है, मनो किसी ने सूरज का पीला चादर उसे उढ़ा दिया हो...तारे जुगनू बन कर जल बुझ रहे....दरख्तों पे बर्फ धुनी रुई सा टंग से गए....पत्ते सारे के सारे सिहर कर अपने आप में दुबकी जा रही...झील में तैरता रक्त कमल चन्द्र किरणों से खेल रहा....मेरे भीतर एक सूनापन घर कर जाता है.....मुझे उस रक्त कमल में अपनी प्रियतमा के तप्त अधरों का प्रतिबिम्ब नज़र आता है...मैं बगल में रक्खे तकिये को अपने सीने से लगा लेता हूँ....तुम मुझमे समा जाती हो .....तुम हो,तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है....कमरे का एकांत है और यादों की बारात है....
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बुधवार, 17 नवंबर 2010

कुछ खुशबु जैसी बातें(३)


मेरे मन का जो हरे तिमिर,जो हरे ताप संताप हमारा,
जिसकी बातें खुशबु जैसी,जीवन में जिससे जश्न ए बहारा,
वो तुम हो, तुम हो , तुम हो, तुम!!!
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तुम हो , तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है....
झील पे ठहरी चांदनी का विस्तार है और उसकी लहरों में घुली तारों की झिलमिल करती रौशनी,कल कल निनाद करती नदी की धर मन के पटल पर जलतरंगों सा बज रही....अपने कमरे की खिड़की से टिका मैं आकाश के चाँद को अपलक निहार रहा ......मुझे उसमे तुम दिख रही....सिर्फ तुम...ख्वाब नींद के दरवाज़े दस्तक दे रही....तुम्हारे आने की आहट आ रही....और मैं आँखों के ताल कटोरों में बंद कर तुम्हे अपने भीतर पाता हूँ । इस तरह मैं जी जाता हूँ।
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...नींद है ,ख्वाब है और तुम्हारा साथ है।
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एक अजनबी सा शहर और मेरी शाम उदास सी....कहीं चिरियोंके कलरव में खोया सा मेरे मन के अन्दर का शोर......आँखों में किसी के इंतज़ार की आहट जलते दिए सी थरथराती हुयी .....दूर मस्जिद से आती हुयी अज़ान की आवाज़ .....सड़क सुनसान और रातें लम्बी....पलकों पे टिकी नींद अपने सिंदूरी ख्वाब के गुलाल उड़ाती .....मुझे तुम्हारा इंतज़ार अच्छा लगता है....पलकें नींद से भारी हो रही....अश्रु की अजश्र धार मेरी आँखों से चुपचाप निकल कर मेरे तप्त होठों तक जाकर काफूर हो जा रही....ये अश्रु मेरे जिंदा होने का एहसास कराती हैं...
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...नींद है,ख्वाब है और ख्वाब में तुमसे मुलाकात है....
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जानती हो जानम,तुम्हारी हर बात मुझे याद रहती है.....जब तुम नहीं होते मेरे पास तो हवाएं उन्हें मेरे कानो में गुनगुनाती है.....तुम्हारी साँसे हैं की देवदार के घने जंगलों से गुज़रती हुयी हवा....तुम्हारी मुस्कराहट जैसे चीड की फुनगियों पे टिकी चांदनी...तुम्हारी आँखें हैं या जादू जगाती समंदर का अथाह विस्तार ....तुम्हारे लब हैं या दहकते हुए पलाश...तुम्हारी आवाज़ से खिल जाते हैं शत दल कमल...तुम्हारी बाहें हैं या लचकती फूलों की डाली , जो मुझे अपने आगोश में ले खुशबु से तर ब तर कर देती हैं...तुम्हारी मुस्कुराहट बहारों का आमंत्रण है ....तुम जो सांस लेती हो तो मेरी धड़कन रवानी पाती है...
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और सरसों सी धूप है ....सोती और जागती आँखों में बस तुम्हारा ही रूप है....
- नीहार

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

कुछ खुशबु जैसी बातें (२)

जानती हो जानम, मेरे कमरे के हर कोने में तुम्हारी खिलखिलाहट बसी हुयी है....गुलदान मुझसे यूँ बातें करते हैं ज्यूं उनमे सजे गुलाब तुम्हारे होंठ बन गए हों....मेरे लिए तुम नगमा हो...गीत हो....संगीत हो....चित्र हो....तस्वीर हो...स्केच हो.....और उन सबमे बिखरा हुआ रंग भी तुम्ही हो...तुम मेरे लिए कुरान की आयत हो...मेरी इबादत हो....मेरी हर खुबसूरत आदत और मुझ पर खुदा की बेइंतहा इनायत हो....तुम मेरे दिल का सुकून हो....मेरा चैन हो और आराम हो ....तुम मेरी जिंदगी का पूर्णविराम हो....तुम हो, तुम्हारा ख्याल है ओर चाँद रात है....

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तुम्हारी आँखें हैं या कमल की नशीली पंखुरियाँतुम्हारी जुल्फें हैं या मेरे चेहरे पर बिखरी धूप को ढंकती हुयी बदली......बाहें हैं या फूलों से लदे झूले...तुम्हारा बदन है जैसे मेरी अराधना का मंदिर और तुम्हारी खनकती आवाज़ है जैसे उस मंदिर में बजती हुयी सुरीली घंटियाँ...मैं तुम्हारा पुजारी, बस तुमही पूजा में तल्लीन...मेरी पूजा स्वीकार करो हे देवी!

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जानती हो जानम,यहाँ एअरपोर्ट पे बैठा हुआ मैं आँखें बंद कर तुम्हे ही देख रहा...धुले केश तकिये के पीछे बिखरे परे हैं और चाँद से चेहरे पे एक ग़ज़ब का मोहक सौंदर्य अपना रंग मुस्कराहट के गुलाल में घोल बिखरा रहा है...गुलाब की नाज़ुक पंखुरिओं से तुम्हारे अधर पर अभी भी मेरे नाम की ओस बूँद नमी पसारे हुए है...तुम्हारे काजल से कारे अंखियों में पिया मिलन की आस द्रवीभूत हो रही.....लगता है आज फिर बरसात होगी....तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...तुम हो तो हर दिन होली और हर रात शब् ए बरात है....

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तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...हवा गुनगुना रही....तेरी याद के हरसिंगार मेरे मानस के पटल पर बिखर कर मुझे अपनी खुशबु से नहला रहे .....कहीं मयूरपंखी ख्वाब आँख के किनारे बस जाना चाह रहे.... कहीं कोई मंद मदिर सी हवा जैसे गुज़ारिश कर रही हो की तुम्हारी जुल्फों में उसे गुम होने दिया जाए।


जानती हो जानम, तुम्हारी खिलखिलाहट कौंधती धनक सी रात की तारीकी को रौशनी का ज़खीरा भेंट करती है....तुम जो दबे पाँव आती हो ख्यालों के चिराग टिमटिमा जाते हैं और जब मैं तुम्हारी बाहों के अमरबेल में जाकर जाता हूँ तो वो जकरन मुझे बंधन मुक्त करती है जिंदगी की हरेक परेशानी से.......तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है....

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तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है....चारों तरफ सुबह का उजाला अपनी छटा बिखेर रहा, नन्ही सुकोमल सूर्य किरने किसी अबोध बच्चे की खिलखिलाहट की तरह पसर रही बिना किसी देश,जाति,धर्म,उम्र,समाज की परवाह किये बगैर....खिड़की के बाहर पक्षियों का शोर सुबह को आमंत्रण देता हुआ.....ऐसे में मेरा मन....ढूंढें तुम्हे जंगल,आकाश,वन....मैं पूछ रहा इस शहर की हर गली से.....की हे गलियां...हे चौबारा...हे मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारा....हे अट्टालिकाएं हे ईमामबारा ....कहीं तुमने देखी मेरी दिलदारा...मेरी जान ऐ अदा....मेरी जहाँआरा...उसके बदन की खुशबु अभी भी यहीं है......उसके सुकोमल क़दमों के निशाँ अब भी यहीं हैं....उसके मन के उदगार अब भी यहीं गुंजायमान हैं.....रुई के फाहों से नाज़ुक मुलायम उसके खयालात अभी भी बादलों सा तीर रहे हैं....तुम वह सब मुझे वापिस दे दो....वह सब मेरा है....सिर्फ मेरा....उसके एहसास मेरे, उसकी व्यथा मेरी,उसकी खिलखिलाहट और दर्द दोनों की कथा मेरी....उसके बदन को छू कर गुजरी हर हवा मेरी.....उसकी सांस मेरी,उसकी आस मेरी....उसके थरथराते होठों के पलाश मेरे,उसकी आँखों के समंदर की तलाश मेरी...उसके दिल में धड़कन मेरी ,उसकी जुल्फों में उलझन मेरी.....वो है तो मैं हूँ जिंदा....उसकी जिंदगी की हर चुभन मेरी...मुझे वो सब लौटा दो जो वो छोड़ गयी थी कुछ साल पहले मेरी ही तलाश में भटकती हुयी यहाँ.....तुम हो ,तुम्हारा ख्याल है और खिली कनेर के फूल सी धुप है....मेरी आँखों में बंद तुम्हारा बस तुम्हारा ही अप्रतिम रूप है....

- नीहार