बुधवार, 8 अप्रैल 2015

अँधेरे की पाँखें ...

मील भर चल कर -
अँधेरें ने पाँखें फैला दी,
और थकी हुई सी जलती बुझती आँखें -
धुँए में लिपट सी गई...
एक सन्नाटे का चुप -
हज़ार झरनों के फुहारों में बज उठा।
अक्सर मैंने -
ख़ुद को अकेले ही से जूझते देखा है...
और जब थक जाता है यह अकेलापन,
तो तूलिकायें बोलने लगती हैं-
रंगों की भाषा बड़ी विचित्र होती है,
उसे समझने के लिये -
ख़ुद रंगहीन होना पड़ता है।
सूखे पत्तों की सरसराहट,
बदलते मौसम का लिबास है... 
तूलिकायें जब सूख जाती हैं,
तब कैनवास पर जो रंग उभरता है -
वह सिर्फ़ बंद आँखों से ही देखा जा सकता...
लकीरों की भाषायें , 
सिर्फ़ फ़क़ीर ही समझ सकते...
इसलिये-
मन लागो मेरो यार फ़क़ीरी में ...
-नीहार

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