शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

तुम हो तुम्हारा ख्याल है और .......

तुम हो,तुम्हारा ख्याल है और बर्फीली सी सुबह....
पहाड़ों से उतरती धूप ,
अलसाई हुयी सी है ।
रात की आँखों के आंसू अभी भी फूलों को नहलाये हुए हैं ,
पाखी अपने घोंसलों में दुबके हुए से हैं ।
हर तरफ सिर्फ एक ख़ामोशी है....
सर्द सी ....जर्द दी....बर्फ सी ....भींगी हुयी सी।
दुशाला ओढे हुए तुम्हारी यादों का मैं,
बंद आँखों से तेरी तस्वीर देख रहा ,
मौसम ए मोहब्बत की ताबीर देख रहा।
मंदिर में बजती घंटियों में तुम्हारी पाजेब की रुनझुन सुनाई देती है.....
ऐसा लगता है मुझे ,
की तुम मेरी साँसों के संतूर छेड़ रही।
मैं तुम्हें पूरी तरह महसूस रहा ....
तुम हो...मेरे वजूद में समायी हुयी सी,
मुझमे ही हो....तुम।
तुम हो,तुम्हारा ख्याल है और यमुना का तीर है....
कदम्ब की छांह,बंशी की धुन और मन हुआ फ़कीर है।
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तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...
आकाश की सूनी सड़क,
तारों की रोशन कतारें...
टिमटिमाते जुगनुओं की बारिश,और...
सामने वाले घर के मुंडेर से झांकता,
पीला पीला ज़र्द सा चाँद...
मनो अभी पाक कर तापाक जाएगा।
ख्वाब हैं की आँख में पंख ले चुके......
होठों पे आंसुओं का नमक बिखर सा गया....
एक चिराग कहीं पे जल रहा बुझ रहा...
और मेरे कानो में हवाओं ने,
चुपके से है ये कहा कि,
तुम यहीं हो....यहीं हो तुम,
मेरे पास....मुझमे उतरती हुयी...
मुझमे पिघलती हुयी....
मुझमे तुम्हारी धड़कने रवानगी पाती।
एक नदी है जो मेरे भीतर तुम्हारी तरह मचल रही...
तुम्हारे स्पर्श ने मुझे पारा कर दिया,और...
मैं चुपचाप अपनी आँखों से ढलक कर तुम्हारे होठों पे जज़्ब हो गया।
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और आँखें हैं पुरनम...
तुम्हारा चेहरा है मेरे हाथों में जैसे फूलों पे शबनम।
- नीहार