बुधवार, 17 नवंबर 2010

कुछ खुशबु जैसी बातें(३)


मेरे मन का जो हरे तिमिर,जो हरे ताप संताप हमारा,
जिसकी बातें खुशबु जैसी,जीवन में जिससे जश्न ए बहारा,
वो तुम हो, तुम हो , तुम हो, तुम!!!
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तुम हो , तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है....
झील पे ठहरी चांदनी का विस्तार है और उसकी लहरों में घुली तारों की झिलमिल करती रौशनी,कल कल निनाद करती नदी की धर मन के पटल पर जलतरंगों सा बज रही....अपने कमरे की खिड़की से टिका मैं आकाश के चाँद को अपलक निहार रहा ......मुझे उसमे तुम दिख रही....सिर्फ तुम...ख्वाब नींद के दरवाज़े दस्तक दे रही....तुम्हारे आने की आहट आ रही....और मैं आँखों के ताल कटोरों में बंद कर तुम्हे अपने भीतर पाता हूँ । इस तरह मैं जी जाता हूँ।
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...नींद है ,ख्वाब है और तुम्हारा साथ है।
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एक अजनबी सा शहर और मेरी शाम उदास सी....कहीं चिरियोंके कलरव में खोया सा मेरे मन के अन्दर का शोर......आँखों में किसी के इंतज़ार की आहट जलते दिए सी थरथराती हुयी .....दूर मस्जिद से आती हुयी अज़ान की आवाज़ .....सड़क सुनसान और रातें लम्बी....पलकों पे टिकी नींद अपने सिंदूरी ख्वाब के गुलाल उड़ाती .....मुझे तुम्हारा इंतज़ार अच्छा लगता है....पलकें नींद से भारी हो रही....अश्रु की अजश्र धार मेरी आँखों से चुपचाप निकल कर मेरे तप्त होठों तक जाकर काफूर हो जा रही....ये अश्रु मेरे जिंदा होने का एहसास कराती हैं...
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...नींद है,ख्वाब है और ख्वाब में तुमसे मुलाकात है....
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जानती हो जानम,तुम्हारी हर बात मुझे याद रहती है.....जब तुम नहीं होते मेरे पास तो हवाएं उन्हें मेरे कानो में गुनगुनाती है.....तुम्हारी साँसे हैं की देवदार के घने जंगलों से गुज़रती हुयी हवा....तुम्हारी मुस्कराहट जैसे चीड की फुनगियों पे टिकी चांदनी...तुम्हारी आँखें हैं या जादू जगाती समंदर का अथाह विस्तार ....तुम्हारे लब हैं या दहकते हुए पलाश...तुम्हारी आवाज़ से खिल जाते हैं शत दल कमल...तुम्हारी बाहें हैं या लचकती फूलों की डाली , जो मुझे अपने आगोश में ले खुशबु से तर ब तर कर देती हैं...तुम्हारी मुस्कुराहट बहारों का आमंत्रण है ....तुम जो सांस लेती हो तो मेरी धड़कन रवानी पाती है...
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और सरसों सी धूप है ....सोती और जागती आँखों में बस तुम्हारा ही रूप है....
- नीहार