शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

ख्वाब के पत्तों की बजती है झाँझरी.........

यूँ - 
चलता रहा मैं,
चाँद तलक आसमाँ की ओर.....
ये रात उदासी की -
फिर आये कि ना आये ।
ये ख्वाब के पत्तों की ,
बजती है झांझरी -
कोई हौले से ,
मेरे जिस्म को -
फिर पाक़ कर जाये ।
मेरी आँख को ,
बारिश की दुआ -
दे गया है वो....
डर है कि बहते आँसुओं में,
वो ही ना बह जाये ।
उसका मिलना -
पत्तों का हरा होना है,
वो जो जाये तो,
पतझड़ सा -
हमें कर जाये ।
होंठ चुप हैं -
कि आँखें बोलती हैं....
डूब के सुन कि,
क्या वो कह जाये ।
उसकी बाँहों में -
जिन्दगी करवट ले,
उसके सीने से लग के...
वो सोचता है कि मर जाये । 
- नीहार ( चंडीगढ़, २७ सिसंबर की सुबह  )